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नागौर में अंतरराष्ट्रीय कवि बोले – गरीबी को मिटाना था, गरीब को मिटा दिया

नागौर स्थापना दिवस पर कांकरिया स्कूल मैदान में नगर परिषद की ओर से कवि सम्मेलन का आयोजन- देशभर के कवियों ने हास्य, व्यंग्य और वीर रस की कविताएं पेश कर श्रोताओं को बांधे रखा

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Kavi Sammelan organized on Nagaur Foundation Day

नागौर. नागौर स्थापना दिवस व आखातीज के अवसर पर कांकरिया स्कूल मैदान में आयोजित कवि सम्मेलन में देश के अलग-अलग हिस्सों से आए हास्य रस के कवियों ने अपनी कविताओं से श्रोताओं को गुदगुदाया, वहीं वीर रस के कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से महंगाई, कन्या भ्रूण हत्या, देशभक्ति, पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव से तार-तार हो रहे रिश्तों सहित ज्वलंत मुद्दों को उठाकर श्रोताओं के रोंगटे खड़े कर दिए। हास्य-व्यंग्य के कवि ने अपनी कविताओं से शहरवासियों को सोचने पर मजबूर कर दिया।

देवास से आए कवि शशिकांत यादव ने देश में दिनों-दिन बढ़ रही महंगाई पर चोट करते हुए अपनी कविता के माध्यम से कहा, 'कैसा सूरज उगाया आपने विकास का, कि झोपड़ी का टिमटिमाता दीप भी बुझा दिया, बढ़ी रोज महंगाई, कैसी योजना बनाई, गरीबी को मिटाना था, गरीब को मिटा दिया।' इसी प्रकार उज्जैन से आए वीररस के कवि डॉ. अजीत जैन ने देशभक्ति और सामाजिक विषमता पर कविताएं पढ़ते हुए बेटे और बेटी के बीच किए जा रहे भेदभाव पर प्रहार किया। जैन ने 'बेटी कम है बेटे से साबित यह झूठ कथन है, कल्पना, किरण और टेरेसा किस बेटे से कम है, घर का आंगन महका दे बेटी वो अनमोल रत्न है' तथा चाचा, ताऊ, मामा, फूफा रिश्ते में सब अंकल कहलाते हैं, इसीलिए अंग्रेजी के रिश्ते अपनी समझ में नहीं आते हैं' कविताएं पेश की।

सब व्यर्थ है यदि चरित्र नहीं है...

कवि सम्मेलन में जयपुर से आए कवि प्रह्लाद चांडक ने 'चेतना में शील का यदि चित्र नहीं है, सब व्यर्थ है यदि चरित्र नहीं है, सात समंदर से भी गहरा है ये आंखों में जो पानी वाला पहरा है ये' कविता के माध्यम से रिश्तों में हो रहे हृास पर चिंता व्यक्त की। भीलवाड़ा से आए हास्य कवि दीपक पारीक ने 'अपने भविष्य के अक्षर हाथों काले मत करो, बच्चों को संस्कार दो कम उम्र में मोबाइल के हवाले मत करो' कविता पेश कर न केवल अभिभावकों को उनके कर्त्तव्य का भान करवाया, बल्कि बच्चों को कम उम्र में मोबाइल देने पर भी सवाल खड़े किए। कोटा से आए मारूतिनंदन 'पिता के आशीर्वाद से जीवन ही अपने आप में एक पुरस्कार है, पिता के ऋण से मैं कभी उऋण हो नहीं सकता और पिता के रहते मैं दुनिया में कुछ खो नहीं सकता' तथा 'भारत मां के चरण कमल को सिंधु नीर से धो देगा, पाकिस्तान तेरी गोरी को मोदी फोर कर देगा' कविताएं पेश की।

घर को स्वर्ग बनाना जानती हूं...
ग्वालियर से डॉ. मनोरमा जैन ने 'त्याग, ममता, बलिदान का हर रिश्ता निभाना जानती हूं, हां मैं नारी हूं, घर को स्वर्ग बनाना जानती हूं' तथा पूछ रही हूं उनसे जो कन्या के हत्यारे हैं, लड़की भाती नहीं जिन्हें लड़के प्यारे-प्यारे हैं, वो मुझको बस इतना बतला दे, बिन लड़की के परिवार चला ले' सरीखी कविताएं पेश की। इसी प्रकार कोटा से आए हास्य व्यंग्य कवि अर्जुन अल्हड़ ने 'धर्म श्रेष्ठ है सत्य सनातन, ना कोई दूजा आएगा, सोच है जिसकी जैसी, उसको वैसा बुझा जाएगा, ताजमहल बनाया जिसने वो हर हाथ कटा डाला, बना रहा है जो राम महल, हर हाथ वो पूजा जाएगा' कविता पेश की।