
Nagaur News : बच्चे दो ही अच्छे या फिर छोटा परिवार-सुखी परिवार की सीख पर दम्पती खरे तो उतर रहे हैं पर नसबंदी के लिहाज से वे पहले की तरह आगे नहीं आ रहे। पिछले पांच साल का आंकड़ा ही देखें तो नसंबदी कराने में पुरुषों की तो छोड़िए महिलाएं तक कम हो रही हैं। वो तब जबकि नसबंदी को लेकर सरकार की विभिन्न योजनाएं चल रही हैं, साथ ही जागरूकता कार्यक्रम भी चल रहे हैं। इसके बावजूद नसबंदी कराने वाली महिलाओं की संख्या तनिक भी नहीं बढ़ रही।
सूत्रों के अनुसार बढ़ती शिक्षा/जागरूकता कहें या फिर परिवार नियोजन के अन्य साधन, सीमित परिवार के प्रति हर कोई सजग है। कहीं-कहीं तो एक बच्चे को ही परिवार का आधार माना जा रहा है। चिकित्सकों की मानें तो दस फीसदी ही दम्पती ऐसे हैं जिनके बच्चे दो से अधिक हैं। कहीं-कहीं तो एकल कन्या के बाद ही अगले बच्चे के बारे में सोचना बंद कर दिया। एकल अथवा दो कन्या के बाद नसबंदी कराने पर राज्य सरकार की ओर से पचास हजार की राशि दी जा रही है। बावजूद इसके नसबंदी कराने में ऐसी महिलाएं भी खासी दिलचस्पी नहीं दिखा रही।
आंकड़ों की बात करें तो वर्ष 2019-20 में नसबंदी कराने वाली महिलाओं की संख्या नागौर (डीडवाना-कुचामन) जिले में 6 हजार 373 थी, वहीं वर्ष 2023-24 में यह संख्या मात्र 5 हजार 181 रह गई। यानी पांच साल में नसबंदी कराने वाली महिलाओं की संख्या में करीब बीस फीसदी की गिरावट हुई है। इन बरसों में पुरुषों की नसबंदी में भी गिरावट हुई। वर्ष 2019-20 में पूरे साल में 27 पुरुषों ने नसबंदी कराई , वहीं वर्ष 2023-24 में इनकी संख्या महज सत्रह ही रह गई। मतलब साफ है कि पुरुष हो या महिला, नसबंदी कराने में किसी ने कोई खासी रुचि नहीं दिखाई।
सूत्र बताते हैं कि बढ़ती शिक्षा/जागरूकता के चलते कई दम्पती नसबंदी के लिए आगे आते भी हैं तो वे कई बार घर वालों के चलते रोक लिए जाते हैं। यहां तक की बाहर वाले भी नसबंदी के बाद होने वाली अनावश्यक परेशानियों का डर बांटते हैं। कहीं-कहीं अंधविश्वास के कारण भी लोग नसबंदी से बच रहे हैं। कहीं शारीरिक कमजोरी तो कहीं मानसिक प्रभाव का हवाला देकर भी इन्हें रोका जाता है।
चिकित्सक बताते हैं कि जागरूकता बढ़ने से नसबंदी के लिए लोग धीरे-धीरे आगे आ रहे हैं। नसबंदी के अलावा बच्चों में अंतराल रखने के अन्य प्रभावी तरीके भी योग्य दम्पती अपना रहे हैं। अंतरा इंजेक्शन, पीपी आईयूसीडी, कॉपर टी, ओरल पिल्स, ई पिल्स, निरोध आदि। एएनएम, आशा, सीएचओ इस सम्बन्ध में लगातार आमजन को जागृत कर रहे हैं । उसके चलते पिछले कुछ सालों में जन्मदर में कमी आई है। बच्चों में तीन साल का अंतराल रखने के लिए प्रोत्साहित करने पर आशा सहयोगिनी को 500 रुपए का भुगतान किया जाता है, जबकि लाभार्थी के लिए प्रोत्साहन राशि अलग से है। बताया जाता है कि ऐसे में भी महिला हो या पुरुष, नसबंदी से बचने लगे हैं।
आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले पांच साल में एक फीसदी भी नसबंदी में इजाफा नहीं हुआ। वर्ष 2019-20 में 6 हजार 373, वर्ष 2020-21 में 5 हजार 385, वर्ष 2021-22 में 5 हजार 890, वर्ष 2022-23 में 6 हजार 383 तो वर्ष 2023-24 में 5 हजार 181 महिलाओं ने नसबंदी कराई। करीब पांच साल में 29 हजार 212 महिलाओं ने नसबंदी कराई, जबकि इसके मुकाबले पुरुषों की संख्या महज 127 रही। इन आंकड़ों से ही मालूम पड़ता है कि नसबंदी में एक फीसदी भी बढ़ोत्तरी नहीं हो पाई है, जबकि सरकार की ओर से तरह-तरह की लाभकारी योजनाएं संचालित हैं।
दम्पती का मूल उद्देश्य परिवार नियोजन रहता है, ऐसे में नसबंदी के बजाय अन्य साधनों के जरिए वो इसमें सफल हो रहे हैं। चिकित्सा विभाग की ओर से जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाते हैं। महिलाओं के साथ पुरुषों को नसबंदी के लिए प्रेरित किया जाता है, जो लक्ष्य निर्धारित करते हैं, उसे पूरा कर लेते हैं।
- डॉ. राकेश कुमावत, सीएमएचओ, नागौर
बढ़ती शिक्षा के चलते विवाहिताएं परिवार नियोजन को लेकर काफी जागरूक हैं। फैमिली प्लानिंग से लेकर बच्चों के गेप, उनके स्वास्थ्य समेत अपने परिवार की जिम्मेदारी के कारण बहुत से निर्णय वे स्वयं लेने लगी हैं। परिवार नियोजन के लिए सिर्फ नसबंदी ही जरूरी नहीं है। अनेक तरह के साधन हर दम्पती के सीमिति परिवार के सपने को साकार कर रहे हैं।
- डॉ दीपिका व्यास, स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ, जेएलएन अस्पताल, नागौर
Updated on:
20 Jun 2024 04:18 pm
Published on:
20 Jun 2024 03:58 pm
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