
नागौर में हार ने छुड़ाए पसीने तो कभी जीत-हार के अंतर ने चौंकाया
पिछले चुनाव में टूटा हार जीत के अंतर का रिकॉर्ड , आजादी के बाद कई बार हुए रोमांचक मुकाबले
धर्मेन्द्र गौड़ @ नागौर. कभी कांटे की टक्कर ने प्रत्याशियों की सांसें थाम दी और कभी जीत हार के अंतर ने हर किसी को चौंका दिया। आजादी के बाद हुए विधानसभा चुनावों में कई बार ऐसे मौके आए जब जीत हार का अंतर बेहद रोमांचक रहा। जिले के अधिकांश विधानसभा चुनाव में कभी भाजपा तो कभी कांग्रेस का ही वर्चस्व रहा। वर्ष1952 के बाद से कुछ चुनावों में भाजपा के बजाय अन्य पार्टियों में मुकाबला रहा। कुछ विधानसभा क्षेत्रों से निर्दलीय भी हावी रहे। पिछले विधानसभा चुनाव के नतीजों तथा हार जीत केअंतर पर नजर डालें तो नावां से 2013 के चुनाव में भाजपा के विजय सिंह ने कांगे्रस के महेन्द्र चौधरी को 29 हजार 619 वोट से शिकस्त दी। हार-जीत का यह अंतर पिछले अन्य चुनावों में सर्वाधिक रहा। जबकि दस हजार से कम मतों से हार-जीत का अंतर बहुत कम देखा गया।
हर बार बदले समीकरण
निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार जिले में 1957 के चुनाव में डीडवाना से मोतीलाल ने 19905 वोट लेकर भंवरसिंह (9718) को 10187, 1962 में नागौर सीट से रामनिवास मिर्धा (17031) ने सम्पतलाल (5037) को 11994 व 1972 में परबतसर सीट से जेठमल (27472) ने पदमाराम (9503) को 17969 वोट से शिकस्त दी। इसी प्रकार 1972 में डेगाना विस क्षेत्र से कांग्रेस के रामरघुनाथ चौधरी (35700) ने एसडब्ल्यूए के मदन सिंह (15008) को 20692 मतों से, जबकि मेड़ता से रामलाल (29404) ने रामचन्द्र (29404) को 10858 वोटों से हराया।
जब अब्दुल अजीज ने दी गौरी पूनिया को शिकस्त
लाडनूं सीट से 1977 में हरजीराम (28084) ने दीपांकर (13021) को 15063 हराया तो 1985 में मकराना पर सबकी निगाह रही। यहां एलकेडी के अब्दुल अजीज (39996) ने कांग्रेस की गौरी पूनिया (29154) को 10842 वोट से शिकस्त दी। इसी चुनाव में परबतसर से मोहनलाल (35722) ने जेठमल (21817) को 13905, डेगाना से कल्याण सिंह (48216) ने रामवल्लभ तापडिय़ा (24363) को 23 हजार 853 से जबकि मेड़ता से नाथूराम मिर्धा (50261) ने बाबूखान वारसी (27862) को 22 हजार 399 वोट से हराया। डेगाना से 1990 में रिछपालसिंह मिर्धा (53034) ने रामरघुनाथ (30705) को 22 हजार 329 से शिकस्त दी।
कभी कम तो ज्यादा रही लीड
विस चुनावों में जहां हार-जीत का अंतर 29 हजार तक रहा वहीं कुछ सीटों पर 50 से भी कम मतों के अंतर से उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की। 1993 में जायल विधानसभा सीट से मोहनलाल (28795) ने परशुराम (18342) को 10453, डीडवाना से चेनाराम (38711) भंवर सिंह (22456) को 16255 वोट से शिकस्त देकर विधानसभा पहुंचे। नावां से रामेश्वर लाल (45997) ने हरीश (34581) को 11416 वोट से हराया। डेगाना से 1993 में रिछपाल सिंह मिर्धा (46891) ने मोहन सिंह (28111) को 18780 तथा 1998 में नागौर से हरेन्द्र मिर्धा (42053) ने गजेन्द्र सिंह (23183) को 18870 वोट से हराया। 1980 में मकराना से कांग्रेस आई के अब्दुल रहमान चौधरी ने 18181 वोट लेकर कांग्रेस यू के अब्दुल अजीज (18148) को महज 33 वोट से शिकस्त दी। इसके अलावा 1993 में भाजपा के राकेश मेघवाल ने कांग्रेस के मोहनलाल चौहान को 42 वोट से हराकर चौहान के विधानसभा में पहुंचने का रास्ता रोक दिया।
बड़ी पार्टियों का रहा वर्चस्व
मकराना से 1998 के चुनाव में कांग्रेस के अब्दुल अजीज (44863) ने भाजपा के रूपाराम (24912) को 19951, परबतसर से कांग्रेस के मोहनलाल चौहान (55504) ने भाजपा के राकेश मेघवाल (42175)को 12789, 2003 में डेगाना से कांग्रेस के रिछपाल सिंह मिर्धा (56352) ने भाजपा के दिलीप सिंह (45059) को 11293 तथा इसी चुनाव में मेड़ता से भाजपा के भंवर सिंह (59470) ने कांग्रेस के मांगीलाल डांगा (42028) को 17442 वोट से हराया । इन चुनावों में कभी भाजपा तो कभी कांग्रस हावी रही। 2008 के चुनाव में 5 भाजपा, 4 कांगे्रस व एक सीट निर्दलीय के खाते में गई वहीं 2013 के चुनाव में दस में से नौ सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की जबकि एक सीट पर निर्दलीय हनुमान बेनीवाल विजयी रहे।
पिछले दो चुनावों में बढ़ा हार-जीत का अंतर
नावां से 2008 में महेन्द्र चौधरी ने हरीशचंद को 21855 से हराया जबकि 2013 में लाडनूं से मनोहर सिंह ने हरजीराम बुरडक़ को 23007, डीडवाना से यूनुस खान ने चेतन चौधरी को 11559, जायल से डॉ.मंजू बाघमार ने मंजू देवी को 12763, जबकि खींवसर से निर्दलीय हनुमान बेनीवाल ने बसपा के दुर्गसिंह को 22776 वोट से हराया। डेगाना से अजय सिंह किलक ने रिछपाल सिंह को 14303, श्रीराम भींचर ने जाकिर हुसैन गैसावत को 11563, परबतसर से मानसिंह किनसरिया ने लच्छाराम बडाडरा को 16212, नावां से विजय सिंह ने महेन्द्र चौधरी को 29619 वोट से शिकस्त दी।
Published on:
18 Oct 2018 07:51 pm
