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रामदेव पशु मेला : यहां केवल पशु ही खरीदे-बेचे नहीं जाते…पढिए पूरी रिपोर्ट

कला, संस्कृति, पशुपालन और पर्यटन की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है माही मेला- सैकड़ों लोगों को रोजगार देता है नागौर का पशु मेला

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पशु मेला का बाजार

पशु मेला का बाजार

नागौर. राजस्थान भर में करीब 250 से अधिक पशु मेलों का आयोजन प्रतिवर्ष किया जाता है। इनमें कुछ राज्य स्तरीय पशु मेले हैं तो कुछ स्थानीय स्तर पर आयोजित होते हैं। नागौर जिले में तीन पशु मेलों (श्री रामदेव पशु मेला- नागौर, श्री वीर तेजाजी पशु मेला - परबतसर व श्री बलदेव पशु मेला- मेड़ता सिटी) को राज्य स्तरीय मेलों की श्रेणी में शामिल किया हुआ है, जबकि डीडवाना व कुचामन के पशु मेले भी काफी बड़े स्तर पर आयोजित किए जाते थे, जो अब धीरे-धीरे सिमट रहे हैं। अन्य मेलों की तरह नागौर का श्री रामदेव पशु मेले में केवल पशुओं की खरीद-फरोख्त ही नहीं होती, बल्कि यह मेला कला, संस्कृति, पशुपालन और पर्यटन की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। देश-विदेश के हजारों पशुपालक एवं पर्यटक इसके माध्यम से लोक कला एवं ग्रामीण संस्कृति से रूबरू होते हैं। खास बात यह है कि सरकार की ओर से मेले में समय-समय पर प्रदर्शनी और अन्य ज्ञानवर्धक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाता है।
करीब 80 पुराने इस मेले का स्वरूप पिछले 50-60 सालों में कितना बदला है, इसके क्या कारण रहे, क्या इस मेले को वापस पुराना रूप दिया जा सकता है, आदि प्रश्नों के जवाब जानने के लिए मेले में पशुपालकों एवं दुकानदारों से बात की तो कई ऐसी जानकारियां सामने आईं, जिनसे आज के युवा अनभिज्ञ हैं।

पशु बिकेंगे नहीं तो पालेंगे क्यों?

मेले में लगी कृषि औजारों की दुकान पर सुखवासी से खरीदारी करने आए 70 वर्षीय किसान खेराजराम ने बताया कि वे पिछले 50-55 साल से मेले में आ रहे हैं। यहां आने का मुख्य कारण कृषि में काम आने वाले औजार खरीदना है। खेराजराम ने बताया कि 40-50 साल पहले मेले में इतने पशु आते थे कि मैदान छोटा पड़ता था। पश्चिम में जाजोलाई नाडी तक तो उत्तर में मानासर फाटक के बाहर तक पशुपालक बैठते थे। नागौर का मेला बैलों की खरीद-फरोख्त के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से बिक्री कम हो गई। जब पशु बिकेंगे नहीं तो पशुपालक पालेंगे क्यों? पहले गाय पालते थे तो उसका बछड़ा बिक जाता था, बड़ा होता बैल बन जाता, जिसे खेती में भी काम ले लेते और मेले में भी बिक जाता। अब तो भैंस पालते हैं, ताकी दूध बेच सकें। खेराजराम ने बताया कि पहले मेले में जगह-जगह चाय व खाने की होटलें लगती थी, जिससे कई लोग कमाकर खा लेते थे।


बिक्री में अंतर आ गया
सडक़ किनारे जैई की दुकान लगाकर बैठे पालड़ी जोधा निवासी बुजुर्ग कारीगर रामरतन जांगीड़ ने बताया कि वे पिछले 40 साल से मेले में आ रहे हैं। पहले और अब जैई की बिक्री में बहुत अंतर आ गया। उन्होंने कहा कि पहले किसानों के बैल बिकते थे तो घर जाते समय जैई खरीदकर ले जाते थे, अब उनका आना कम हो गया। अब तो ज्यादातर जैई की मरम्मत करवाने आते हैं। जांगीड़ ने बताया कि अलग-अलग सींगों की जैई के अलग-अलग कीमत है। 10 सींगों की जैई 800 से एक हजार रुपए तक, 8 सींगों की 400-500 तक, 6 सींगों की 400-450 तक, 4 सींगों की 350-500 तक तथा 2 सींगों की 300 रुपए तक बिकती है। जांगीड़ के साथ दो कारीगर और भी दुकान लगाकर बैठे हैं, जो जैई तैयार करते हैं और खाल से बांधने के लिए एक वाल्मीकि परिवार भी उनके पास बैठा है, जो 100 रुपए में जैई को हाथों-हाथ बांधकर देता है। आजकल पंबाज-हरियाणा का ढांगो भी चलन में है, जो मूंग, मोठ व चारे को ट्रॉली से खाली करने में काम आता है।
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यहां आज भी बिकता है चाटू और मिर्यो
पशुपालन विभाग की ओर से बनाए गए बाजार में साढ़े चार हजार में एक दुकान किराए पर लेकर बैठे नागौर शहर के करणी कॉलोनी निवासी ओमप्रकाश लुहार ने बताया कि वे पिछले सात साल से दुकान लगा रहे हैं। पहले उसके पिता घर में तैयार होने औजारों की दुकान लगाते थे, लेकिन समय के साथ आए बदलाव के चलते उन्होंने भी कुछ औजार बाहर से मंगवाने शुरू किए, जिसकी खरीदारी पशुपालक और किसान करते हैं। ओमप्रकाश ने बताया कि उनकी दुकान पर मिर्यो (पळो), टीपरी (मिरकली), संडासी (हंडासी), चिमटा, सिंखला (बिलोने में काम आने वाला), धूपेड़ा, दातला, दंतीला, झेरना, खुरपी, कुल्हाड़ी, कत्तनी, चाटू /डोई (लकड़ी का चम्मच), छाऽला (झाजला), कुड़ची आदि औजार आज भी लोग खरीदकर ले जाते हैं। इनके साथ अब हार्डवेयर का सामान ज्यादा बिकने लगा है। उन्होंने लकड़ी के साथ स्टील की जैई भी बेचनी शुरू कर दी है, जो खुद बनाते हैं और कीमत 600 रुपए है। ओमप्रकाश ने बताया कि उनकी दुकान पर ज्यादातर खरीदारी बीकानेर व चूरू से आने वाले ऊंट पशुपालक ज्यादा करते हैं।

पहले गन्ने खाते थे, अब रस पीने लगे
पिछले कुछ वर्षों से मेले के दौरान गन्ने का रस निकालने की दुकानें ज्यादा लग रही हैं। इसको लेकर मेले में आए पशुपालक रामकुंवार से बात की तो उन्होंने बताया कि पहले गांव जाते समय गन्ने ले जाते थे और 10-15 दिन तक बच्चे छील-छीलकर खाते थे, लेकिन अब न तो दांत इतने मजबूत हैं और न ही खाने वाले। इसलिए गन्ने का रस पी लेते हैं।


गर्मियों में कातते थे सूत
मेले के बाजार में पहले की तुलना में अब सूत की दुकानें भी कम लगती है। पहले किसान गांव से मेले में अन्य सामान के साथ आठ-दस किलो सूत खरीदकर ले जाते और गर्मियों में दिनों में जब खेती का काम नहीं होता था, तब सूत साफकर ढेरे से कातते थे और फिर उससे खाट, रस्सी, रस्सा आदि बनाते थे। मेले में आए किसान रामचंद्र ने बताया कि पहले सूत को रंगकर खाट बनाने और उसमें फूल-पत्तियों के साथ मोर, तोता आदि के चित्र भी खाट बनाने वाला अपनी कला से बना देता था। शादी में बेटी को सूत की खाट दी जाती थी। अब पलंग का जमाना आ गया है। कई घरों में तो ढूंढ़े से सूत की खाट नहीं मिलती। इसलिए मेले में भी सूत की दुकानों की जगह अब निवार व तिरपाल की दुकानें ज्यादा लग रही हैं।


‘छिणम्या काळ’ से हुई माही मेले की शुरुआत
नागौरी नस्ल के बैलों को राजकीय संरक्षण देने के लिए जोधपुर रियासत के तत्कालीन नरेश उम्मेदसिंह ने नागौर शहर से सटे मानासर में श्रीरामदेव पशुमेला भराने की शुरुआत सन 1940 में की। विक्रम संवत 1996 में पड़े भीषण अकाल (विक्रम सम्वत 1996 होने के कारण इसे ‘छिणम्या काळ’ कहा जाता है) में किसानों एवं पशुपालकों को राहत दिलाने के लिए मेले की शुरुआत की। माघ मास में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के दिन से मेला लगने के कारण कालान्तर में यह माघ मेला के नाम से विख्यात हुआ। बाद में अपभ्रंश होकर माही मेला के नाम से आमजन से लोकप्रिय हो गया।

एक दशक बाद मिला स्वरूप
देश की आजादी से सात वर्ष पहले शुरू हुए रामदेव पशु मेले को राज्य सरकार ने राज्य स्तरीय मेले के रूप में 1957 में मान्यता दी और उसी वर्ष इस राज्य स्तरीय मेले का आयोजन पशुपालन विभाग के जिम्मे सौंपा। मेले के दौरान किसानों व पशुपालकों को सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए जिला कलक्टर की अध्यक्षता में संचालन समिति बनाई गई। समिति के सदस्य जिले के प्रशासनिक अधिकारी विभिन्न व्यवस्थाओं का जिम्मा संभालते हैं। इसके बाद से ही जिला प्रशासन ही मेले की व्यवस्थाएं देखता है।

यह भी है मान्यता
इस मेले के बारे में प्रारंभ में प्रचलित मान्यता है कि मानासर गांव के समुद्र भू-भाग पर रामदेव जी की मूर्ति स्वत: ही अद्भुत हुई। श्रद्धालुओं ने यहां एक छोटा सा मंदिर बनवा दिया है और मेले में आने वाला पशुपालक इस मंदिर में जाकर अपने पशुओं के स्वास्थ्य की मनौती मांग ही खरीद फरोख्त किया करते हैं।

मेलों के लिए बिछाई थी रेल लाइनें
जिले में पशु मेलों की महत्ता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पशुओं का परिवहन करने के लिए सरकार ने परबतसर, मेड़ता, नागौर एवं डीडवाना में अलग से रेलवे ट्रेक तक बिछाए थे। परबतसर व मेड़ता में जनप्रतिनिधियों के प्रयास कर वर्षों बाद रेलवे लाइन चालू हो गई है, लेकिन नागौर के मानासर स्थित पशु मेला क्षेत्र में रेलवे पटरियों के सहारे पशुओं को मालगाड़ी में लोड करने के लिए बनाया गया प्लेटफार्म आज पूरी तरह उपेक्षित है। हजारों लोगों को रोजगार देने वाले परबतसर, मेड़ता एवं नागौर के राज्य स्तरीय पशु मेलों से जिले की देश ही नहीं विदेशों में भी विशेष पहचान है।

‘नागौरी’ नस्ल का साहित्य में उल्लेख
साहित्यकार बाबू देवकीनन्दन खत्री ने सवा सौ वर्ष पहले लिखे अपने चर्चित उपन्यास ‘चन्द्रकान्ता सन्तति’ में तेज गति से चलकर कम समय में अधिक दूरी तय करने के लिए नागौरी नस्ल के बैलों का उल्लेख किया था।