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अमृतसर के जलियांवाला बाग से कमतर नहीं था नागौर का डाबड़ा कांड

निहत्थे किसानों पर जागीरदारों ने चलवाई थी गोलियां, पांच स्वतंत्रता सेनानी हुए थे शहीद

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Dabda case of Nagaur

Dabda case of Nagaur

मौलासर/नागौर. राजस्थान के नागौर जिले की डीडवाना उपखंड में एक छोटा-सा गांव है डाबड़ा। डाबडा कांड भारत में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हुए कांडों में सबसे भयंकर था, जो अमृतसर के जलियांवाला बाग कांड से कमतर नहीं है।
डाबडा के किसानों ने जागीरी जुल्मों से तंग आकर कांग्रेसी नेताओं से आग्रह किया कि वे डाबड़ा गांव में भी कांग्रेस की सभा करें, जिस पर कांग्रेस ने 13 मार्च 1947 को डाबड़ा में सभा का निर्णय लिया। सभी नेता डाबड़ा के चौधरी पन्नाराम लोमरोड़ के घर पहुंचे।

पन्नाराम लोमरोड़ के घर पर सभा हो रही थी, इतने में जागीरदारों के बुलावे पर हजारों की तादाद में ऊंटों व घोड़ों पर सवार फिरंगियों ने धावा बोल दिया और अपनी जमीन के मालिकाना हक के लिए संघर्ष कर रहे किसानों पर गोलियां चलाईं। यह किसानों का अंहिसात्मक आंदोलन था, जिसमें पांच निहत्थे किसान अपने हक की लड़ाई को लड़ते हुए शहीद हो गए। जो इतिहास में डाबड़ा कांड के नाम से प्रसिद्ध हो गया। डाबड़ा कांड में शहीद होने वालों में चौधरी पन्नाराम लोमरोड़, रामूराम लोल, रुघाराम लोल, किशनाराम लोल एवं नंदराम मूंड का नाम शामिल है।

पिता के बाद बेटे ने लड़ी स्वतंत्रता की लड़ाई
मौलासर के डाबड़ा निवासी पन्नाराम लोमरोड़ के पुत्र बोदूराम ने स्वतंत्रता के लिए लड़ाई लड़ी। स्वतंत्रता सेनानी बोदूराम के नाम से अभी तक न तो स्कूल है न ही कोई सडक़ आदि का नामकरण हुआ है। न ही कोई सरकारी सुविधा मिली है, जबकि बोदूराम के पिता पन्नाराम डाबड़ा कांड में शहीद हुए थे। डाबड़ा में शहीद स्मारक में पन्नाराम की मूर्ति लगी हुई है। स्वतंत्रता सेनानी बोदूराम के पुत्र ताराचंद लोमरोड़, जो सेना से रिटायर्ड हैं, उन्होंने पत्रिका से बातचीत में बताया कि डाबड़ा गांव की सरकारी स्कूल का नाम स्वतंत्रता सेनानी बोदूराम लोमरोड़ के नाम करने की फाइल लगाकर सरकार से मांग की थी, लेकिन अब तक फाइल सरकारी ठंडे बस्ते में हैं।

इनके नाम भी हो रहे गुमनाम
मौलासर से स्वतंत्रता सेनानी रूपाराम पुत्र सुरताराम बलारा ने भी आजादी की लड़ाई में अहम योगदान दिया। उनके नाम से मौलासर में कोई भी सरकारी स्कूल व सडक़ का नामकरण नहीं हुआ है। मौलासर के ही स्वतंत्रता सेनानी परशुराम पुत्र गंगाराम बलारा के नाम भी सडक़ या स्कूल का नामकरण नहीं हुआ है। सुदरासन के स्वतंत्रता सेनानी केशरसिंह के नाम पर भी अभी तक किसी सरकारी संस्था का नामकरण नहीं हो पाया है और न ही सरकार से कभी किसी प्रकार की कोई सहायता मिली है। स्वतंत्रता सेनानी के पुत्र रतनसिंह व सवाईसिंह ने बताया कि उन्होंने उनके पिता स्वतंत्रता सेनानी केशरसिंह के नाम से गांव में उनकी याद में किसी सरकारी संस्था का नामकरण कराने के लिए जयपुर जाकर काफी प्रयास किए, लेकिन निराशा ही हाथ लगी।