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कपड़ा उद्योग की पसन्द बनी कुचेरा की कपास पर मजदूरों की कमी से उत्पादन प्रभावित

बीज, खाद व रसायनों की बढ़ती महंगाई व मजदूरों की कमी से प्रभावित हो रहा कपास फसल उत्पादन- बीज, खाद व रसायनों की बढ़ते दाम भी बढ़ा रहे परेशानी - मौसम की मार ने किया गुणवत्ता को कम

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 कपड़ा उद्योग की पसन्द बनी कुचेरा की कपास पर मजदूरों की कमी से उत्पादन प्रभावित

कुचेरा. कपड़ा उद्योग में भेजने के लिए फैक्ट्री में तैयार कोटन।

कुचेरा. नागौर जिले के कुचेरा क्षेत्र में उत्पादित कपास कपड़ा उद्योग की पहली पसंद बना हुआ है, वहीं दूसरी ओर बीज, खाद व रसायनों के बढ़ते भाव और मजदूरों की कमी से कपास फसल का उत्पादन प्रभावित हो रहा है। बुवाई व फसल उत्पादन में आ रहे खर्च के मुकाबले कपास के भाव व आय में वृद्धि नहीं होने से किसानों को नुकसान का उठाना पड़ रहा है। विभिन्न प्रकार के कीट, रोगों के प्रकोप एवं मौसमी अनियमितताओं के चलते कपास की गुणवत्ता को घुण लगने से कीमत भी कम हुई है।
25 से 30 प्रतिशत कम हैं भाव
गत वर्ष के मुकाबले इस वर्ष कपास की फसल के भावों में में 25 से 30 प्रतिशत तक गिरावट आई हुई है। गत वर्ष कपास के भाव करीब 10 हजार रुपए प्रति क्विंटल थे। जबकि इस वर्ष 7500 से 7800 रुपए प्रति क्विंटल तक भाव चल रहे हैं।

15 से 18 हजार प्रति बीघा आ रहा खर्च

कपास फसल बुवाई के लिए खेत तैयार करने से लेकर लुणाई तक किसानों को करीब 15 से 18 हजार रुपए प्रतिबीघा खर्च आ जाता है। खेत को बुवाई के लिए तैयार करने में रोटावेटर, तैई, हल आदि चलाने के लिए ट्रेक्टर के 1500 से 2000 रुपए, बीज के 1500 से 2000 रुपए, तोपाई मजदूरी 1500 से 1800 रुपए, निराई गुड़ाई 1500 से 1800 रुपए, कीटनाशक रसायन व स्प्रे 2000 से 2500 रुपए, घास आदि खरपतवार नाशक स्प्रे 2000 से 2500 रुपए, बिनाई 2000 से 2200 रुपए प्रतिबीघा खर्च आता है।
मजदूरों की कमी से खलल
किसानों के अनुसार कपास बिनाई के सीजन में मजदूरों की कमी परेशानी का सबब बन रही है। क्षेत्र में मूंग, बाजरा, ज्वार, ग्वार आदि फसलों की कटाई व कपास की बिनाई साथ आने ने से मजदूर नहीं मिल पा रहे हैं। हनुमानगढ़, गंगानगर, चूरू, कोटा आदि जिलों से कपास लुणाई के लिए आने वाले मजदूर भी इस बार मूंग, बाजरा, ग्वार आदि फसलों की कटाई में अधिक मजदूरी मिलने के कारम उधर चले जाने से कपास बिनाई के लिए पर्याप्त मजदूर नहीं मिल रहे । लुणाई नहीं होने से डोडे झड़ने से भी किसानों को नुकसान झेलना पड़ रहा है।

देश के कई हिस्सों में पहुंच रहा कुचेरा का कोटन

कुचेरा क्षेत्र में कपास की जिनिंग के बाद तैयार कोटन देश के कई शहरों के कपड़ा उद्योग में सप्लाई हो रहा है। भीलवाड़ा सहित मध्यप्रदेश, गुजरात, पंजाब के कपड़ा उद्योग के लिए यहां तैयार हुई कॉटन जा रही है। इसका उपयोग रेशे, धागे, कपड़े, बिस्तर, गद्दे, सोफे आदि बनाने में किया जाता है।
इनका कहना है
कपास की फसल में बुवाई, निराई - गुड़ाई, स्प्रे व लुणाई आदि में 15 से 18 हजार रुपए प्रतिबीघा खर्च आ जाता है। इस बार 25 प्रतिशत तक कम उत्पादन व भाव कम रहने से 20 से 21 हजार रुपए प्रतिबीघा ही आय हो रही है। इससे चार महीने की दौड़भाग भी पूरी नहीं हो पा रही है।

सोहनलाल तांडी, किसान
कपास की फसल में मौसमी अनियमितता के कारण इस बार उत्पादन कम है और गुणवत्ता में भी फर्क है। भाव भी 25 प्रतिशत तक कम है। कुचेरा क्षेत्र की कपास से जिनिंग के बाद तैयार कॉटन भीलवाड़ा, एम पी, पंजाब व हरियाणा के कपड़ा उद्योग को भेजा जाता है। जबकि बिनोला से खल व तेल निकालकर जिले में ही बेचा जाता है।
शैतानराम टाक, कॉटन मिल कुचेरा