
Revenue of the government is causing a loss of billions of rupees
शरद शुक्ला/नागौर. मूंग की ऑनलाइन नीलामी सरकार की ओर से खरीदी गई दर से कम करने के कारण सरकार के राजस्व में अरबों रुपए का नुकसान होने लगा है, वहीं काश्तकारों को भी अब तक हजारों रुपए का चूना लग चुका है। ऑनलाइन नीलामी की दर काफी कम होने के कारण कृषि उपज मंडी में भी मूंग के भाव जमीन पर आने से काश्तकारों की हालत पतली है। समर्थन मूल्य घोषित होने के बाद अब तक सरकारी खरीद शुरू नहीं होने से काश्तकारों को न्यूनतम स्तर पर अपनी उपज मंडी में बेचनी पड़ रही है। गत अगस्त माह से नई मूंग कीआवक होने के साथ मंडी में प्रति क्विंटल भाव 4500 से पांच हजार प्रति क्विंटल तक पहुंच गया था। इस दौरान मूंग की सरकारी दर पर नीलामी की प्रक्रिया शुरू होने से मूंग तकरीबन चार हजार रुपए प्रति क्विंटल की दर पर मिलने लगा। ऑनलाइन नीलामी में अच्छी गुणवत्ता की मूंग महज चार हजार प्रति क्विंटल की दर पर मिलने के कारण मंडी में अब किसानों को वर्तमान में 4100 से 4500 प्रति क्विंटल की दर पर अपनी मूंग बेचनी पड़ रही है।
असमय ऑनलाइन नीलामी से बढ़ा घाटा
वर्ष 2016 में समर्थन मूल्य 5255 रुपए प्रति क्विंटल की दर पर मूंग की खरीद हुई थी। जबकि वर्तमान में गत अगस्त माह के आखरी सप्ताह से शुरू हुई मूंग की सरकारी नीलामी में प्रति क्विंटल की दर अधिकतम 4100 रुपए ही रही। समर्थन मूल्य पर मूंग की खरीद के साथ ही कट्टों में भरने के बाद परिवहन कर गोदामों में रखे जाने तक की दर औसतन लगभग छह हजार पहुंच जाती है। अब इसकी नीलामी महज चार हजार रुपए में होने से प्रति क्विंटल तकरीबन दो हजार रुपए का सरकारी घाटा होने लगा है। बताया जाता है कि अब तक सरकारी दर पर हुई नीलामी में लगभग पांच लाख क्विंटल मूंग की बिक्री हो चुकी है, अभी 20 लाख क्विंटल मूंग की बिक्री की जानी है। इसका विश्लेषण करने पर घाटे का यह आंकड़ा अरबों में पहुंचता है।
1500 से 2000 बोरियों की आवक
कृषि उपजमंडी में रोजाना मूंग की तकरीबन 1500-2000 बोरियों की आवक होती है। रोजाना तकरीबन एक से डेढ़ करोड़ का कारोबार हो जाता है, लेकिन यह आंकड़ा भी सरकारी स्तर पर मूंग की न्यूनतम नीलामी की दर से गिर रहा है।
इनका कहना है...
सरकारी स्तर पर मूंग की नीलामी गत वर्ष खरीदे गए समर्थन मूल्य से तकरीबन दो हजार से कम की दर पर होने से ना केवल मंडी में इसके भाव में भारी कमी आई है, बल्कि यह राजस्व घाटा अरबों में पहुंच गया है। इससे न तो व्यापारियों को मुनाफा है, और न ही किसानों को। सरकार अब यह घाटा कहां से पूरा करेगी, सोच का विषय है।
भोजराज सारस्वत, अध्यक्ष कृषि मंडी व्यापार मंडल, नागौर
Published on:
23 Sept 2017 12:00 pm
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