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video—हजारों साल पुरानी बही भाट परम्परा आज भी कायम

-कोर्ट कचहरी में साक्ष्य के रूप में मान्य-हिन्दुओं में रावजी तो मुस्लिम समुदाय में भाट राजा के नाम से हैं इनकी पहचान -पीढी दर पीढी दर्ज होता है रिकॉर्ड

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हजारों साल पुरानी बही भाट परम्परा आज भी कायम

Thousands of years old Bahi Bhaat tradition still persists

राजवीर रोज

खजवाना (नागौर) आधुनिक दौर में बच्चे अपने पूर्वजों की तीसरी पीढी तक के नाम नहीं जानते, वहीं एक समुदाय पूर्वजों की कई पीढियों का लिखित रिकॉर्ड संजोए हुए हैं। इन्हें हिन्दू समुदाय रावजी तो मुस्लिम समुदाय भाट राजा के नाम से पुकारते हैं।

पूर्वजों ने ऐसी व्यवस्था की थी, ताकि हमारा इतिहास आने वाली पीढियों को मालूम रहे। पौराणिक समय में यह रिकॉर्ड न्याय का ठोस आधार भी हुआ करता था। आधुनिक दौर में भी इस रिकॉर्ड का महत्व कोर्ट-कचहरी तक बरकरार है। रावजी और भाट राजा समय-समय पर गांवों में आते हैं और रिकॉर्ड को अद्यतन करते हैं।

क्षेत्र के रूण गांव में इनदिनों मुस्लिम समाज के भाट राजा आए हुए हैं। यहां कई परिवारों में बही वाचन करवाकर बच्चों को पूर्वजों के नामकरण सहित अन्य जानकारी से अवगत करवाया जा रहा है। परिवारों को इन बहियों में लिखे विवरण से यह जानकारी भी मिलती हैं कि उनके पूर्वज देश या प्रदेश के किस स्थान से आकर इस गांव में बसे थे और उनके गोत्र के अन्य सदस्य वर्तमान में अब देश में कहां-कहां बसे हुए हैं। इससे वर्षों पुराने बिछड़े परिवारों के मिलने में भी भाट की बहीं सहायक सिद्ध होती है।

बही वाचन के दौरान यजमान बही लिखने वाले भाट को नए सदस्यों के नाम, पद, उपाधि सहित अन्य विवरण लिखवाकर दान दक्षिणा,ईनाम,भेंट और कपड़ों के साथ भोज भी देते हैं और फूल माला पहनाकर घरों से विदा करते हैं।
चांदारूण के अशोक रावजी व डीडवाना के भाट राजा मोहम्मद फुरकान और मइनुद्दीन ने बताया कि इन बहियों में आज भी स्याही वाले पेन से ही लिखने को प्राथमिकता दी जाती है, ताकि लिखावट वर्षों तक रहें। बहियों में कोई भी गलत जानकारी नहीं लिखी जाती हैं।

क्या है बही भाट

सैकड़ों वर्षों से चली आ रही इस परंपरा के तहत हर जाति, संप्रदाय और धर्म के अलग-अलग बही भाट होते हैं । इन्हें कई लोग रावजी तो कोई भाट राजा के नाम से संबोधित करते हैं, लेकिन इनकी कार्यशैली एक जैसी ही हैं। यह बहियां 30 से 50 किलो वजनी, वर्षों पुरानी और दुर्लभ होती हैं। जिनको लेकर भाट यजमान के घर पहुंचते हैं और पूर्वजों के नाम और व्यवसाय से संबंधित लेखा-जोखा बहियों से सुनाते हैं और नए रिकॉर्ड दर्ज किए जाते हैं। बोड़वा के ग्रामीण दरियाव चौधरी व रूण के फखरुद्दीन खोखर ने बताया इस परंपरा की आज भी ग्रामीण क्षेत्र में मान्यता है।
कोर्ट कचहरी में साक्ष्य के तौर पर मान्य

कोर्ट कचहरी, राज काज या सामाजिक कार्यों व गोदनामा में जब भी कोई विवाद होता है तो साक्ष्य के तौर पर बही को मान्यता दी जाती है, वहीं पीढियों का रिकॉर्ड रहने से बच्चों को पूर्वजों के नाम सहित कार्यों का विवरण देखने को मिल जाता है।