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नागौर. भागमभाग में जब अपनों को संभालने की फुर्सत कम होती जा रही हो। इलाज के बदले दवा तो इंसान को मिले पर संवेदनाएं ‘गुम’ हो गई। घर और अस्पताल के बीच का फासला रोगी के परिजन को दूर लगने लगा। हाल पूछना औपचारिकता हो गया हो तो बहुत कुछ बदलने की जरूरत महसूस होने लगी है। इन सबके बीच बीमार-अपंग व घायल गाय की देखभाल- सेवा के लिए इस अस्पताल में सब कुछ है, संवेदना के साथ कर्तव्य परायणता और वो भी बिना किसी ‘शुल्क’ के।
जिला मुख्यालय से पांच किलोमीटर दूर नागौर-जोधपुर सडक़ मार्ग पर संचालित गो चिकित्सालय जैसी सुविधा देश में और कहीं नहीं देखने को नहीं मिलेगा। गोशालाएं तो पूरे भारत में संचालित की जाती हैं, लेकिन यहां केवल उन्हीं गायों को रखा और प्रवेश दिया जाता है, जो अपंग-जख्मी और बीमार है।
श्री कृष्ण गोपाल गौ सेवा समिति द्वारा संचालित यह एक एेसा गो चिकित्सालय है, जहां एक भी गाय एेसी नहीं है जो दूध देती हो। गो चिकित्सालय के मुख्य प्रबंधक महामंडलेश्वर कुशालगिरी के अनुसार स्वस्थ गाय की यहां एंट्री नहीं है। बीमार गायें जब स्वस्थ हो जाती हैं तो उन्हें घायल एवं बीमार गायों के बदले वापस दे दिया जाता है, जिससे व्यवस्था बनी रहे।
यह है गौ चिकित्सालय की खासियत
छह राज्यों की 800 गोशालाओं से बीमार व घायल गाय लाई जाती हंै।
ये छह राज्य पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, गुजराज और राजस्थान हैं, जहां की गोशालाओं के साथ घरेलू बीमार व घायल गोवंश भी आता है।
बेस्ट क्वालिटी का चारा
गायों को ज्वार की कूतर (गायों) गायों को खिलाई जाती है। चारा छानने के लिए मशीन खुद स्वामी कुशालगिरी ने तैयार की है। हर वार्ड के हिसाब से अलग-अलग चारा तैयार किया जाता है। कौनसी गाय को क्या चारा देना है, इसका विशेष ख्याल रखा जाता है।
गायों के लिए आरओ प्लांट का पानी
नागौर जिले के लोग भले शुद्ध पानी के लिए तरसते हों। कुछ गांव एेसे भी हैं जहां लोगों को फ्लोराइड युक्त पानी पीना पड़ता है। वहीं गो चिकित्सालय में गायों को आरओ का शुद्ध पानी पिलाया जाता है। स्वामी का कहना है कि चिकित्सालय में सब गायें बीमार या घायल हैं, जिनके लिए शुद्ध पानी की उपलब्ध आवश्यक है। वन्य जीवों का भी उपचारवन विभाग अपने आप को असहाय महसूस करते हुए यहां घायल वन्य जीवों को लाता है और उपचार होने के बाद वापस सौंप दिया जाता है। यहां मोर, हरिण, नील गाय आदि प्रमुखता से आते हैं।
झूले में झूलते हैं अनाथ बछड़े
गो चिकित्सालय में कई अनाथ बछड़ों को भी पाला जाता है, जिनकी मां जन्म लेते या किसी अन्य कारण से मर गई। बछड़ों के लिए यहां शानदार झूले भी लगाए गए हैं, जिनमें बछड़ों को झुलाया जाता है और वहीं दूध व पानी की व्यवस्था की गई है। गो चिकित्सालय में आने वाले पर्यटक एवं गो भक्त बछड़ों को झूला झुलाकर अपने आप को धन्य महसूस करते हैं। यहां गायों के लिए इंसानों जैसी लापसी तैयार की जाती है, जिसमें काजू, बादाम आदि डाले जाते हैं।
अब बन गया है गौ तीर्थ
राष्ट्रीय राजमार्ग ६५ पर स्थित गो चिकित्सालय अब गो तीर्थ बन गया है। स्वामी ने गो चिकित्सालय को हैरिटेज रूप भी दिया है, ताकि यहां आने वाले देसी-विदेशी पर्यटकों को लुभाया जा सके और ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सके। गो चिकित्सालय में ऊन कातने का चरखा, मूसल, हल, घटी, बैल गाड़ी (रेंकळिया) आदि रखे गए हैं।
गौ चिकित्सालय का आधुनिक कंट्रोल रूम
राजस्थान सहित बाहरी राज्यों से आने वाले फोन कॉल अटेंड करने से लेकर एम्बुलेंस को घटनास्थल पर भेजने सहित अन्य रिकॉर्ड संधारित करने के लिए गो चिकित्सालय में कंट्रोल रूम स्थापित किया हुआ है, जहां से पूरा चिकित्यालय कंट्रोल होता है। स्वामी कुशालगिरी का दावा है कि जिले के पुलिस अधीक्षक को अपने कर्मचारियों को बुलाने एक मिनट का समय लग सकता है, लेकिन वे यदि कंट्रोल रूम से एक आवाज दे दे तो ३० सेकंड में सारे कर्मचारी एक जगह एकत्र हो जाते हैं। कंट्रोल रूम में दो फोन हमेशा चालू रहते हैं। कंट्रोल में पूरा रिकॉर्ड रखा जाता है, कहां से गाय आई, किस राज्य, जिले से, किस गोशाला से आई आदि। गौ चिकित्सालय में आने और जाने वाली हर गाय का रिकॉर्ड संधारित किया जाता है। गोशाला के कर्मचारियों के लिए काम के अनुसार डे्रस कोड बना हुआ है।
पशुओं का सबसे बड़ा आईसीयू
गो चिकित्सालय में देश का सबसे बड़ा आईसीयू संचालित होता है, जहां पशुओं का उपचार किया जा रहा है। इस चिकित्सालय में 500 गायें एेसी हैं, जो अपने पैरों पर खड़े नहीं पाती, उन्हें पैरों पर खड़ा करने के लिए गो चिकित्सालय प्रबंधन दूध तक पिलाता है और विभिन्न चिकित्सीय उपकरणों का सहारा देकर खड़ा करता है।
यहां होता है हर प्रकार की बीमारी का उपचार
गो चिकित्सालय में गायों की हर प्रकार की बीमारी का उपचार किया जाता है। लोगों द्वारा जख्मी गायों के उपचार से लेकर गायों के पेट से ऑपरेशन कर प्लास्टिक व गांठ निकालना, कैंसर पीडि़त गायों की प्रतिदिन पट्टी करना, दवा लगाना, गायों के चारे के साथ फिटकरी रखना, ताकि बीमारी आगे नहीं बढ़े।
पीड़ा ने खड़ा कर दिया अस्पताल
जिला मुख्यालय पर हर वर्ष आयोजित होने वाले राज्य स्तरीय श्री रामदेव पशु मेले में लावारिस छोड़े जाने वाले बछड़ों को ट्रेन से कटने एवं बीमारियों से बचाने के लिए स्वामी कुशालगिरी ने गो चिकित्सालय की शुरुआत की। स्वामी कहते हैं कि उन्होंने छोटे से पौधे के रूप में गो चिकित्सालय की शुरुआत की, जो आज वट वृक्ष का रूप ले चुका है। स्वामी का कहना है कि गोचर पर अतिक्रमण होने से अब गायों का ठिकाना सडक़ें रह गई हैं, जहां आए दिन वाहनों की टक्कर से गायें घायल हो रही हैं, काल कलवित हो रही हैं।
Published on:
28 Aug 2017 11:38 am
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