
सतना जिला अस्पताल के ब्लड बैंक की जानलेवा लापरवाही- demo pic
ग्राउण्ड रिपोर्ट
नागौर. एचआईवी संक्रमण के लिहाज से नागौर में महिलाएं अछूती नहीं हैं। इनकी संख्या लगभग पुरुषों के बराबर है। रविवार को एड्स दिवस था पर सरकारी स्तर पर इसे लेकर कोई कार्यक्रम नहीं हुआ। जख्म पर नमक छिड़कने जैसा हाल यह है कि सिवाय पालनहार योजना के अधिकांश एचआईवी संक्रमितों को कोई लाभ नहीं मिल रहा। एचआईवी संक्रमण के ठप्पे से पहचान उजागर नहीं हो इसके लिए बहुत से संक्रमित सरकारी फायदे को खुद ही त्याग रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार नागौर एआरटी सेंटर में दर्ज एचआईवी संक्रमितों की बात करें तो 1675 रजिस्टर्ड हैं। इनमें पुरुष 777 तो महिला रोगी 768 हैं। ऐसा नहीं है कि बच्चे संक्रमित नहीं हैं, इनमें लड़के 81 तो लड़कियां 49 हैं। इसके अलावा कुचामन/डीडवाना लिंक सेंटर ही नहीं अन्य जिलों में भी नागौर के एचआईवी संक्रमित पंजीकृत हैं, इनकी संख्या पांच हजार से अधिक बताई जा रही है। करीब बारह-तेरह साल में इतनों की ही मौत हो चुकी हैं। एचआईवी संक्रमण का जब हल्ला मचा था तब पुरुषों की संख्या काफी अधिक थी, जबकि अब नागौर जिले में यह आंकड़ा बराबरी पर आ गया है।
सूत्र बताते हैं कि राज्य सरकार की ओर से एचआईवी संक्रमण के साथ जी रहे लोगों के लिए लम्बे समय से अनेक सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं का संचालन किया रहा है, ताकि वो बेहतर ढंग से जी सकें। इसके बावजूद अभी हालत अच्छी नहीं है, अधिकांश योजनाओं का लाभ इन्हें नहीं मिल रहा, जबकि कुछ अपनी पहचान उजागर हो जाने के डर से इसके लिए आगे नहीं आ रहे। कुछ समय पहले इनके लिए पेंशन योजना शुरू हुई थी, अब उस पर मुश्किल आ गई है। ऑफ लाइन पेंशन मिलने तक तो सब ठीक था जैसे ही इसे ऑन लाइन कर शर्तें निर्धारित की, यह लगभग बंद सी हो गई हैं। एक अनुमान के मुताबिक अभी पचास फीसदी को भी पेंशन नहीं मिल पा रही।
नहीं हो पा रहा सत्यापन, पेंशन मिले कैसे
एचआईवी संक्रमितों को सामाजिक सुरक्षा योजना के तहत विशेष योग्यजन की श्रेणी में लेकर कभी कलक्टर के सहयोग से पेंशन शुरू की गई थी। तब यह सब ऑफ लाइन था। अब ऑनलाइन पेंशन के लिए विशेष योग्यजन की श्रेणी में इनका सत्यापन नहीं हो पा रहा। वो इसलिए कि ये दिव्यांगता का प्रमाण-पत्र कहां से लाएं और इन्हें दे भी कौन। बहुतों की तो चालू ही नहीं हो पा रही और जिन्हें मिल रही है वो बंद होने की कगार पर है।
खाद्य सुरक्षा योजना से भी दूर...
एचआईवी संक्रमितों के लिए कार्य कर रहे एनजीओ के राजू पाराशर व कुलदीप चोटिया ने बताया कि इन्हें खाद्य सुरक्षा योजना का भी लाभ नहीं मिल पा रहा। वर्ष 2014 के बाद से अन्त्योदय अन्न योजना/खाद्य सुरक्षा योजना का लाभ कई बार आवेदन करने के बाद भी नहीं मिल पा रहा। ऑनलाइन एवं ऑफ लाइन प्रक्रिया के बाद भी एचआईवी संक्रमितों को इससे लगभग दूर कर दिया है। एक कारण यह भी है कि एचआईवी संक्रमितों को इसका लाभ लेने के लिए कई बार अपनी गोपनीयता उजागर करनी पड़ती है।
गोपनीयता भंग होने का खतरा, बीस फीसदी लाभ ही नहीं लेना चाहते
सूत्रों का कहना है कि असल में अधिकांश एचआईवी संक्रमित तो सरकारी योजना का लाभ इसलिए भी नहीं लेना चाहते कि कहीं गोपनीयता उजागर ना हो जाए। बस में इनको ग्रीन डायरी दिखाकर करीब 75 फीसदी किराए पर छूट है पर लोगों के सामने पहचान उजागर होने के डर से ये ऐसा नहीं करते। कई लोग तो इसके चलते ग्रीन डायरी तक ही नहीं बनाते। वही हाल अन्य योजनाओं का है, बीस से पच्चीस फीसदी एचआईवी संक्रमित पहचान उजागर होने के डर से इसका लाभ नहीं लेना चाहते। इसके लिए वे अलग से आवेदन तक दे देते हैं।
सरकार नहीं देती कोई विशेष बजट...
बताया जाता है कि एड्स दिवस पर जागरूकता संबंधी कार्यक्रमों के लिए पहले सरकार विशेष बजट आवंटित करती थी। अब ऐसा नहीं है। सरकारी स्तर पर तो एक भी कार्यक्रम नहीं हुआ। एनजीओ की ओर से राजू पाराशर, कुलदीप चोटिया व प्रेमचंद चौधरी की अगुवाई में शनिवार को कैण्डल मार्च निकाला गया , वहीं रविवार को जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करवाए गए। सरकारी स्तर पर एक भी कार्यक्रम नहीं होने से स्पष्ट है कि सरकार को या तो यह लगता है कि अब जागरूकता की आवश्यकता नहीं है या फिर बजट के उपयोग पर ही उसे शंका होने लगी है।
इनका कहना
नागौर में एचआईवी संक्रमितों की तलाश में शिविर लगाए जा रहे हैं, हर व्यक्ति की जांच का दायरा भी बढ़ाया जाएगा। पेंशन समेत कई लाभ लेने में रोगियों को परेशानी आ रही है, इसके लिए उच्च स्तर पर सूचित किया जा चुका है। सरकार की मंशा है कि वर्ष 2030 तक एचआईवी संक्रमित लोगों की पहचान पूरी हो जाए।
-विक्रम सिंह राठौड़, परामर्शदाता, यौन रोग।
जेएलएन अस्पताल, नागौर।
Published on:
01 Dec 2024 09:16 pm
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