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चौसला. सरकार के करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद भी गांवों में करीब 20 प्रतिशत से अधिक घरों में महिलाएं चूल्हे पर लकड़ी से भोजन पकाती है। ग्रामीण इलाकों में गरीब तबके के लोग गैस सिलेंडर की रिफलिंग नहीं करा पा रहे हैं। 8 0 फीसदी घरों में गैस सिलेंडर होने के बावजूद भी गांवों की कई महिलाएं या तो उसे बंद कर रखे है या रसूखदारों को बेच दिए है। सरकार द्वारा चलाई गई उज्ज्वला योजना के तहत हर घर में महिलाओं को धुएं से मुक्त ईंधन से भोजन पकाने के लिए नि:शुल्क गैस कनेक्शन की सौगात दी है, लेकिन फिर भी महिलाएं चूल्हे पर भोजन पका रही है। सरकार की ओर से दिए गए उज्ज्वला योजना के तहत गैस कनेक्शन कई लोगों के घरों में महज शोभा बढ़ा रहे है। लोगों का कहना है कि महंगाई के दौर में पहले ही घर का खर्च चलाना मुश्किल बनता जा रहा है। सरकार ने घरेलू उपयोग में आने वाली वस्तुओं को कंट्रोल रेट पर कर देनी चाहिए। लोगों का कहना कि अधिकतर महिलाओं की आदत गैस चूल्हे पर भोजन पकाने की हो गई है, लेकिन सिलेण्डर की राशि सुनते ही रिफिल करवाने से मना करना पड़ता है। पत्रिका संवाददाता ने गुरुवार को चौसला, कुणी, बनगढ़, बावना का बेरा, लाखनपुरा, भाटीपुरा, लूणवां में जाकर उन लोगों से जानना चाहा जिनके घरों में गैस सिलेंडर होने के बाद भी महिलाएं चूल्हे पर लकड़ी से भोजन पकाती मिली। उन लोगों ने बताया कि जैसे-तैसे मजदूरी कर अपना जीवन यापन चलाते है, मजदूरी में उन्हें उतना अधिक पैसा नहीं मिल पाता है कि घरेलू सामान और गैस का खर्च निर्वहन कर सके। उन लोगों ने बताया कि उससे तो अच्छा है कि वे चूल्हे से ही काम चला लेते है। रामेश्वरी देवी ने बताया कि मुझे गैस मिली थी तब बहुत खुशी हुई थी, की अब चूल्हे का उपयोग नहीं करना पड़ेगा, लेकिन उन्हें खुशी तब तक ही मिली जब तक सिलेंडर में गैस रही। उसके बाद चूल्हा ही फंूकना पड़ रहा है।
Updated on:
07 Nov 2019 07:13 pm
Published on:
07 Nov 2019 06:51 pm
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