-राष्ट्रीय स्तर के वास्तु विशेषज्ञ अनिल आसवानी ने कार्यशाला में बताए उपाय, सवालों के दिए जबाव
नर्मदापुरम. शहर के कोठीबाजार स्थित आरसीसी मॉल में गुरुवार दोपहर में वास्तु ज्ञान कार्यशाला हुई। इसमें राष्ट्रीय स्तर के वास्तु विशेषज्ञ अनिल आसवानी ने घर-दुकान, संस्थान आदि निर्माण कराते समय वास्तु का विशेष ध्यान रखने एवं पूर्व से बने हुए निर्माणों में वास्तुदोष को दूर करने के उपाय बताए। आसवानी ने बताया कि जरा से उपाय से दोष का निवारण होकर घर-परिवार में सुख-समृद्धि और आरोग्यता आती है। आज के समय में जीवन में वास्तु का बहुत महत्व बढ़ गया है। उन्होंने कार्य, धर्न अर्जन, घर-ऑफिस में सकारात्मक ऊर्जा बनाए रखने, कर्ज से मुक्ति. बच्चों के कैरियर, विवाद की अड़चन, जॉब-कैरियर में तरक्की, पति-पत्नी परिवार में मधुर संबंध सहित बीपी-शुगर, कैंसर, दमा, कान, पेट व त्वचा संबंधी रोगों को वास्तु से दूर करने के उपाय भी बताए। पूर्वोत्तर, पूर्व, उत्तर, केंद्र, दक्षिण-पूर्व, दक्षिण, दक्षिण-पश्चिम, पश्चिम, उत्तर-पश्चिम दिशाओं में भवन में घर-मकान में कहां क्या चीजें होनी चाहिए, इसके बारे में भी जानकारियां प्रयोग कर बताई। न्यूमेरोलॉजी सहित इच्छापूर्ति मेडिटेशन भी सिखाया। इस मौके पर रिवर लेंड विल्डकॉन ग्रुप के डायरेक्टर रजत मिश्रा, मैनेजिंग डायरेक्टर आनंद पारे सहित हरिओम शिवहरे, संबेश सिंगोरिया, सहित विभिन्न कार्यक्षेत्र के लोग मौजूद रहे।
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दी रोचक जानकारी
वास्तु विशेषज्ञ आसवानी ने बताया कि वास्तु संवृत्ति का कार्य 10 दिक्पालों से शासित होता है। दो महाप्रबंधक आकाश और पृथ्वी सहित 8 प्रबंधक हमारी उन्नति-प्रगृति व अस्तित्व को नियंत्रित करते हैं। 8 दिशाएं उत्तर-पूर्व, पूर्व, दक्षिण-पूर्व, दक्षिण, दक्षिण-पश्चिम, पश्चिम, उत्तर-पूर्व एवं उत्तर पर ही वास्तु संबंधी जिम्मेदारियां होती है। संपूर्ण ब्रम्हांड 14 लोकों से बना है। प्रगति-उन्नति के लिए सभी लोकों का आशीर्वाद जरुरी है। पंचतत्वों का विश्व, अणु-परमाणु लोक व 8 अंतक्रियात्मक विश्व के साथ संबंध में समरसता, सुंदरता की कला ही वास्तु है।
मकान-भवन में ये है जरूरी
वास्तु विशेषज्ञ आसवानी ने बताया कि लाभकारी ऊर्जा के लिए उत्तर एवं पूर्व में हल्का या खुला रखते हुए भवन एवं स्थिति दक्षिण-पश्चिम में होनी चाहिए। दक्षिण के बजाए उत्तर व पश्चिम के बजाए पूर्व दिशा में खुला स्थान छोड़ें। पश्चिम भाग उठा हुआ व पूर्व तरफ ढलान भौतिक सुख-समृद्धि में वृद्धि करता है। दक्षिण भाग उठा हुआ उत्तर की तरफ ढलान धन-संपत्ति, ख्याति लाता है। पूर्वी भाग उठा हुआ पश्चिम की तरफ ढलान संपत्ति के लिए हानिकारक होता है। पूर्वोत्तर भाग उठा दक्षिण -पश्चिम की तरफ ढलान बुरा होता है। दक्षिण-पूर्व भाग उठा हुआ उत्तर-पश्चिम की तरफ ढलान ठीक रहता है। उत्तर-पूर्व ढलान श्रेष्ठ है। पश्चिम तथा उत्तर-पश्चिम नीचा ढलान उचित नहीं है। दक्षिण व दक्षिण पूर्व (अग्नि) भाग उठा उत्तर व उत्तर-पश्चिम (वायव्य) नीचा होना श्रेष्ठ है। इससे सभी गतिविधियों में नाम व सम्मान मिलता है।
कुल-आयु वृद्धि के लिए उपाय
ेपुत्र-पौत्र, प्रपोत्र आदि की कुल-आयु वृद्धि के लिए दक्षिण पश्चिम व दक्षिण भाग उठा एवं उत्तरी और उत्तर पूर्व नीचा होना चाहिए। जो श्रेष्ठ रहता है और ऐसे घर-मकान में रहने वाले वृद्धि को प्राप्त होते हैं।
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मकान-भवन में ये नहीं हो चाहिए
पश्चिम और उत्तर-पश्चिम भाग ऊंचा उत्तर पूर्व और दक्षिण-पूर्व नीचा नहीं होना चाहिए। इससे उत्तेजना, विद्वेष का माहौल बनता है। लड़ाई-झगड़े, हाय-धाय हो हल्ला करते जीवन बीतता है। दक्षिण , दक्षिण पूर्व नीचा होने से बीमारियां घेरती है।
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