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क्या बंगाल के बाद अब ग्रेटर हैदराबाद में भी बनेगी बाबरी मस्जिद ? आखिर क्या है खेल

Babri Masjid: बंगाल के बाद अब तेलंगाना के ग्रेटर हैदराबाद में भी बाबरी मस्जिद बनाने का ऐलान किया गया है।

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भारत

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MI Zahir

Dec 07, 2025

Babri Masjid

बंगाल के मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद के शिलान्यास के लिए लगाया गया बैनर। (फोटो: IANS)

Babri Masjid: बंगाल के मुर्शिदाबाद में हुमायूं कबीर के बाबरी मस्जिद (Babri Masjid) बनाने का ऐलान करने के बाद अब तेलंगाना के ग्रेटर हैदराबाद (Greater Hyderabad) में भी ऐसा ही ऐलान किया गया है। इससे सियासत और गर्मा गई है। ध्यान रहे कि अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद वहां राम मंदिर बनने के बाद मुसलमानों ने इस संबंध में किसी तरह का विरोध दर्ज नहीं कराया और कोर्ट का आदेश ही माना था। राजनीतिक प्रेक्षकों को अब इस तरह के शगूफे छेड़ना धार्मिक के बजाय राजनीतिक खेल अधिक लग रहा है। यह ऐलान एक मुस्लिम संगठन की ओर से किया गया है। बाबरी मस्जिद के मुद्दे से जुड़ी ये घटनाएं अब राजनीतिक तूल पकड़ रही हैं। ऐसी घोषणाएं देश में सांप्रदायिक के साथ राजनीतिक तनाव (Political Tensions) का कारण बन सकती हैं।

मुश्ताक मलिक के बड़े ऐलान का मतलब जानिए

तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में 6 दिसंबर 2025 को बाबरी मस्जिद विध्वंस की 33वीं बरसी पर एक चौंकाने वाला ऐलान हुआ। तहरीक मुस्लिम शब्बन के अध्यक्ष मोहम्मद मुश्ताक मलिक ने ग्रेटर हैदराबाद में बाबरी मस्जिद के नाम पर एक भव्य स्मारक बनाने की घोषणा की। उनके अनुसार, यह सिर्फ मस्जिद नहीं होगी, बल्कि इसके साथ कई कल्याणकारी संस्थान (जैसे अस्पताल, एजुकेशन सेंटर आदि) भी बनाए जाएंगे। यह बात उन्होंने शहर की एक मस्जिद में हुई सभा के दौरान कही।

आखिर मुश्ताक मलिक कौन हैं ?

हैदराबाद के लोगों ने बताया कि मुश्ताक मलिक तहरीक मुस्लिम शब्बन के अध्यक्ष होने के साथ-साथ तेलंगाना मुस्लिम जॉइंट एक्शन कमेटी के संयोजक भी हैं। लंबे समय से वे मुस्लिम समाज के अधिकारों और धार्मिक मामलों के लिए सक्रिय रहे हैं। उनका कहना है कि 2019 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद से ही उनके मन में बाबरी मस्जिद की याद को जिंदा रखने का विचार था।

लोकेशन, डिजाइन और समय-सीमा की जानकारी देंगे मुश्ताक

इस सभा में उन्होंने कहा, “ग्रेटर हैदराबाद में बनने वाली बाबरी मस्जिद के साथ ही वहां कल्याणकारी सुविधाएं भी होंगी। जल्द ही हम लोकेशन, डिजाइन और समय-सीमा की पूरी जानकारी देंगे।” यहां यह बात हास्यास्पद है कि उन्होंने यह भी साफ किया कि “बाबर के नाम” पर होने वाली राजनीति बेकार है। जबकि वे खुद यह काम कर रहे हैं । उनका दावा है कि अयोध्या वाली बाबरी मस्जिद का बाबर से कोई सीधा संबंध नहीं था और सदियों तक वह हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल रही। इसलिए इसके नाम पर स्मारक बनाना किसी को परेशान करने वाला नहीं होना चाहिए।

हुमायूं कबीर: भाजपा से तृणमूल तक का सफर

हुमायूं कबीर पहले भाजपा में थे और मुर्शिदाबाद से लोकसभा चुनाव में पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े थे, बाद में तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए। उनका यह राजनीतिक सफर बताते हुए कुछ लोग यह मानते हैं कि इस समय उनके द्वारा बाबरी मस्जिद के नाम पर मस्जिद बनाने का ऐलान केवल राजनीतिक लाभ हासिल करने का एक प्रयास हो सकता है। बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के लिए विधानसभा चुनाव से पहले इस तरह के बयान एक रणनीति हो सकते हैं, जिसमें सांप्रदायिक विभाजन को बढ़ा कर वोट बैंक प्रभावित किया जा सकता है। ध्यान रहे कि हुमायूं कबीर ने असदुद्दीन ओवैसी के साथ चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। सियासी गलियारों में ओवैसी को भाजपा की 'बी टीम' माना जाता है।

राजनीतिक लाभ और सांप्रदायिकता का खेल

बंगाल के मुर्शिदाबाद में 6 दिसंबर 2025 को हुमायूं कबीर ने जिस तरह बाबरी मस्जिद का शिलान्यास किया , उसे लेकर कुछ हिंदू संगठनों ने विरोध किया और इसके जवाब में गीता पाठ का आयोजन किया गया। आम लोगों का विचार है कि यह सब राजनीति और सांप्रदायिकता के बीच की जंग का हिस्सा है, जो चुनावों को देखते हुए खास तौर पर बढ़ाया जाता है। राजनीतिक प्रेक्षकों का ​मानना है कि भाजपा और तृणमूल कांग्रेस जैसे राजनीतिक दलों के लिए यह मुद्दा चुनावी फायदे का जरिया बन सकता है।

सांप्रदायिकता का मुकाबला: क्या तरीका है सही ?

देश के उदार लोग मानते हैं कि सांप्रदायिकता का मुकाबला सांप्रदायिकता से ही किया जा सकता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि सांप्रदायिकता का मुकाबला केवल धर्मनिरपेक्षता से किया जा सकता है। इस समय देश में फैल रही नफरत और सांप्रदायिकता को हराने के लिए सभी धर्मों के धर्मनिरपेक्ष लोग एकजुट हो सकते हैं। और यही एकमात्र तरीका है जिससे देश में धर्म के नाम पर राजनीति करने वाले लोगों को रोकने में सफलता मिल सकती है।

सांप्रदायिकता और राजनीति: दोनों का गहरा रिश्ता

वरिष्ठ पत्रकार शकील हसन शम्सी के अनुसार,बाबरी मस्जिद को फिर से बनाने का मुद्दा मुसलमानों के दर्द और गुस्से को भड़काने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। वे मानते हैं कि यह मुद्दा केवल राजनीतिक फायदे के लिए उठाया जा रहा है। इस तरह के विवादों को तूल देने से सिर्फ राजनीतिक पार्टियां ही लाभ उठाती हैं। इस प्रकार के शगूफे कहीं न कहीं भारतीय जनता पार्टी को भी फायदा पहुंचाते हैं। शम्सी का यह कहना है कि इस तरह के मुद्दे सांप्रदायिक भावनाओं को और बढ़ावा देते हैं, और राजनीतिक पार्टियां इनका इस्तेमाल अपने चुनावी लाभ के लिए करती हैं।

धर्म और राजनीति: इतिहास से एक पाठ

राजनीतिज्ञों के लिए धर्म के नाम पर राजनीति करने का तरीका कोई नया नहीं है। यह तरीका भारतीय इतिहास में सदियों से प्रचलित रहा है। बाबर ने भारत पर हमला करते समय जिहाद का नारा दिया था, और उसी नारे के कारण कई मुस्लिम सैनिक बाबर के पक्ष में आ गए थे। शेरशाह सूरी की मुस्लिम सेना ने बाबर के बेटे हुमायूं को दिल्ली से बाहर किया था। ये घटनाएं इस बात को दर्शाती हैं कि धर्म के नाम पर राजनीति करने से केवल सियासी लाभ ही उठाया जाता है, जबकि इससे समाज में तनाव और नफरत फैलती है।

बाबर के बहाने सियासत चमकाने का खेल

इस्लामिक आलिमों के अनुसार धर्म का बाबर से कोई संबंध नहीं है,मगर राजनीति से गहरा संबंध हो गया लगता है। इस नाम से राजनीति चमकने और चमकाने का रास्ता निकाला गया है। हुमायूं कबीर और मुश्ताक मलिक सामयिक तौर पर अपनी सियासत भले ही चमका लें, हकीकत यह है कि धर्म के पैमाने पर उनकी नीयत शक के घेरे में ही रहेगी और देश में वैमनस्य फैलने के हालात पैदा होने की भी आशंका रहेगी।

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