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अजित डोवाल पर IB की नजर- क्यों मीडिया में खूब छपी थी ऐसी खबर?

करीब 12 साल से एनएसए अजीत डोवाल को नरेंद्र मोदी ने पहली बार 17 साल पहले एक काम के लिए गुजरात बुलाया था।

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भारत

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Vijay Kumar Jha

Jan 20, 2026

NSA Ajit Doval, Modi-Doval Relation

नरेंद्र मोदी ने अजीत डोवाल को लगातार एनएसए बनाए रखा है। (फोटो सोर्स: आईएएनएस)

20 जनवरी 2026 को 80 साल के हुए अजीत डोवाल करीब 12 साल से लगातार भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद वह देश के दूसरे सबसे शक्तिशाली शख्स (The Most Powerful Person) माने जाते हैं। ब्लूमबर्ग ने 2016 की एक रिपोर्ट में उनके लिए ऐसा ही कहा था। और, यूं ही नहीं कहा था। पीएम मोदी ने उन्हें एनएसए बनाया है और बनाए ही रखा है। वह पीएम मोदी के अलावा किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हैं। उनके पास जितनी जिम्मेदारियां हैं, उतनी शायद पीएम के अलावा किसी के पास नहीं होंगी। उनके करीबी अनौपचारिक बातचीत में बताते हैं कि हर मंत्रालय पर उनका असर रहता है। बतौर एनएसए उनके जितना लंबा कार्यकाल किसी का नहीं रहा और न ही उनके जैसे रुतबे वाला कोई अफसर है।

…लेकिन इन्हीं अजीत डोवाल के बारे में कभी खबर चली थी कि आईबी (Intelligence Bureau या खुफिया ब्यूरो) उन पर नजर रख रही है। वही आईबी, जिसमें उन्होंने वर्षों नौकरी की और जिसके चीफ तक बने। क्या सच में उन पर आईबी की नजर थी? यह सवाल डोवाल के सामने भी रखा गया था। उनका जवाब था- मुझे जानकारी नहीं है और अगर ऐसा है तो आईबी अपनी ड्यूटी कर रहा है। पर, यह सवाल उठा ही क्यों था? जानने के लिए हमें थोड़ा पीछे चलना होगा।

VIF Seminar Black Money: वीआईएफ के निदेशक डोवाल और काला धन पर सेमिनार

विवेकानंद इंटेरनेशनल फाउंडेशन (वीआईएफ) नाम की एक संस्था (थिंक टैंक) है। इसकी शुरुआत 2009 में विवेकानंद केंद्र की ओर से की गई। विवेकानंद केंद्र की स्थापना 1970 के दशक में आरएसएस नेताओं द्वारा की गई थी। हालांकि वीआईएफ का आरएसएस से कोई संबंध नहीं बताया जाता है। इसकी वेबसाइट पर विजन और मिशन सेक्शन में लिखा है- वीआईएफ एक स्वतंत्र, निष्पक्ष संस्था है, जो बढ़िया शोध और गहराई से अध्ययन किए जाने को बढ़ावा देती है। साथ ही, संवाद करने और विवाद सुलझाने के लिए मंच मुहैया कराती है।

अजित डोवाल इस संस्था के संस्थापक निदेशक बनाए गए। घोषित तौर पर ‘स्वतंत्र-निष्पक्ष’ होने का दावा करने के बावजूद संस्था पर आरएसएस समर्थक होने के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे आरोप पर डोवाल का जवाब भी पूछा गया था। उन्होंने बीजेपी-आरएसएस से संस्था का कोई संबंध होने से साफ मना किया था। हम इस बहस में पड़े बिना आगे बढ़ते हैं।

UPA Government Crisis: सेमिनार और सरकार विरोधी आंदोलन का कनेक्शन?

अप्रैल, 2011 की बात है। वीआईएफ ने काला धन पर दो दिन का सेमिनार आयोजित किया था। इसमें डोवाल के अलावा, एस. गुरुमूर्ति, बाबा रामदेव, अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल, सुब्रमण्यन स्वामी, किरण बेदी, केएन गोविंदाचार्य आदि लोगों ने शिरकत की थी। इसके कुछ समय बाद ही अन्ना का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और रामलीला मैदान में अनशन शुरू हुआ था। रामदेव ने भी भ्रष्टाचार के विरोध में अनशन शुरू किया था। इस आंदोलन ने तब की यूपीए सरकार के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी की थी। सरकार ने किसी तरह आंदोलन पर काबू तो पा लिया, लेकिन उसके बाद के चुनाव (2014) में बुरी तरह हार गई थी। उसी चुनाव में पहली बार नरेंद्र मोदी की बतौर ताजपोशी हुई।

बाबा रामदेव के अनशन के पीछे डोवाल और टीम का हाथ?

जब यह सब चल रहा था, तभी मीडिया में ऐसी खबरें छपने लगी थीं कि डोवाल पर आईबी की नजर है। इंडिया टुडे (अंग्रेजी) पत्रिका के 3 सितंबर, 2012 के अंक में भी यह छपा। इसमें लिखा गया कि वीआईएफ और इसके निदेशक अजित डोवाल पर आईबी नजर रख रही है, क्योंकि सरकार का मानना है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, खास कर बाबा रामदेव के अनशन के पीछे डोवाल और उनकी टीम का ही हाथ है। डोवाल ने इंडियन एक्सप्रेस से आंदोलन में वीआईएफ का हाथ होने से साफ इंकार किया था और यह भी कहा था कि वीआईएफ का आरएसएस से कोई संबंध नहीं है।

सवाल पर डोवाल का ये था जवाब | IB Surveillance पर प्रतिक्रिया

आउटलुक पत्रिका ने उन दिनों डोवाल से इंटरव्यू में इन मसलों पर सवाल भी किया था। आईबी द्वारा नजर रखे जाने संबंधी सवाल पर डोवाल ने कहा था कि उन्हें इस बारे में कुछ पता नहीं है और अगर ‘आईबी मुझ पर नजर रख रहा है, तो वह अपना काम कर रहा है। आईबी सरकार की आंख-कान होता है।’

Ajit Doval IPS Career: नौकरी के शुरुआती सालों से ही चलने लगा था डोवाल का सिक्का

डोवाल उत्तराखंड के गढ़वाल के घिड़ी गांव में 1945 में पैदा हुए थे। उनके पिता सेना में अफसर थे। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता हेमवती नंदन बहुगुणा रिश्ते में उनके मामा लगते थे। डोवाल ने राजस्थान के अजमेर मिलिट्री स्कूल में पढ़ाई की और आगरा यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में डिग्री ली। 1968 में केरल काडर के आईपीएस अफसर के तौर पर उनका करीयर शुरू हुआ। वह कोट्टायम में ट्रेनी अफसर बने और कुछ ही दिन में थलस्सेरी में बतौर एएसपी तैनात हुए। उनके रहते वहां भीषण दंगा हुआ था, जिसे काबू करने में उनके रोल की काफी तारीफ हुई। यह बात 1971 की है। इसके अगले ही साल डोवाल खुफिया ब्यूरो (आईबी) में चले गए। फिर लंबे समय तक आईबी में ही रहे और 2005 में रिटायर होने से कुछ महीने पहले आईबी के निदेशक भी बने।

1972 में डोवाल को पूर्वोत्तर (मिजोरम) में पोस्टिंग मिली। नौकरी के छठे साल (1974) में ही उन्होंने अपने काम के दम पर पुलिस मेडल हासिल कर लिया था। अमूमन 12 साल की सेवा से पहले बिरले ही कोई अफसर यह सम्मान हासिल कर पाता था।

मिजो कमांडर्स के लिए घर पर पत्नी से बनवाया पोर्क

उन दिनों मिजोरम में मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) का आतंक था। पत्रकार सैकत दत्ता ने एमएनएफ कमांडर लालडेंगा के एक इंटरव्यू के हवाले से एक लेख में लिखा है कि उसने माना था कि उसके अंदर में सात कमांडर थे, डोवाल ने जाते-जाते इनमें से छह को उससे दूर कर दिया था। ऐसे में उसके पास शांति वार्ता के लिए राजी होने के अलावा और कोई चारा ही नहीं रह गया था।

डोवाल ने 2006 में दिए एक इंटरव्यू में बताया था कि उन्होंने Mizo National Front (MNF) विद्रोहियों को एक बार आइजोल में अपने घर बुलाया था। वे सब हथियारों से लैस होकर आए थे, लेकिन उन्हें कोई खतरा नहीं पहुंचाने का वादा दिया गया था। डोवाल की पत्नी ने उन सबके लिए पोर्क पकाया, जबकि वह पोर्क नहीं पकाती थीं।

Ajit Doval - Modi Connection: गुजरात से मोदी का बुलावा

डोवाल के बारे में कहा जाता है कि 2008 के करीब उन्हें गुजरात में रक्षा शक्ति यूनिवर्सिटी शुरू करने के लिए बुलाया गया। तब नरेंद्र मोदी वहां के मुख्यमंत्री थे। इस यूनिवर्सिटी में ‘पुलिस विज्ञान और आंतरिक सुरक्षा’ की पढ़ाई होनी थी। अब यह केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा पा गया है।

इसके अगले साल ही उन्हें वीआईएफ का संस्थापक निदेशक बनाया गया। उसी वक्त के आसपास डोवाल के बेटे शौर्य ने भी भारत वापसी की। वह विदेश में इनवेस्टमेंट बैंकर के रूप में काम कर रहे थे। यहां आने के बाद उन्होंने भी ‘इंडिया फाउंडेशन’ नाम से अपना एक थिंक टैंक बनाया और इसके निदेशक बने। आजकल वह इस थिंक टैंक की गवर्निंग काउंसिल में हैं और इसके निदेशक आरएसएस नेता राम माधव हैं।

NSA के बारे में जानिए | National Security Advisor Role

आधिकारिक पदनामराष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (National Security Advisor)
स्थापना/आधार19 नवंबर 1998; तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकारी आदेश (Executive Order) द्वारा।
संवैधानिक स्थितियह एक गैर-सांविधिक (Non-Statutory) पद है (संविधान या संसद के कानून द्वारा नहीं, बल्कि सरकार के आदेश से बना)।
प्रोटोकॉल/दर्जाजून 2019 से इन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त है।
मुख्य भूमिकाप्रधानमंत्री को आंतरिक और बाहरी सुरक्षा, सैन्य मामलों और विदेशी खुफिया जानकारी पर सलाह देना।
NSC में स्थानराष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (NSC) के सचिव और रणनीतिक नीति समूह (SPG) के अध्यक्ष।
खुफिया समन्वयRAW, IB और NTRO जैसी एजेंसियों के बीच मुख्य कड़ी। सभी महत्वपूर्ण खुफिया इनपुट NSA के जरिए PM तक पहुँचते हैं।
राजनयिक कार्यचीन के साथ सीमा विवाद के लिए विशेष प्रतिनिधि (Special Representative) और संवेदनशील मुद्दों पर 'बैक-चैनल' वार्ताकार।
परमाणु नियंत्रणभारत की 'परमाणु कमान प्राधिकरण' (Nuclear Command Authority) की कार्यकारी परिषद के सदस्य के रूप में कार्य।
कार्यकालप्रधानमंत्री के प्रसादपर्यंत (आमतौर पर सरकार के कार्यकाल के साथ)।
Table: Role of National Security Advisor.