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Assam Election 2026: सीमाएं बदली, समीकरण बदले, अल्पसंख्यक वोटर्स का दबदबा घटा, 35 से घटकर 23 सीटों तक सिमटा असर

Assam elections: असम में 2023 परिसीमन के बाद अल्पसंख्यक सीटें घटी हैं, जिससे चुनावी मुकाबला तेज हो गया है। उम्मीदवारों का फेरबदल और मतदाताओं के बदलते रुझान राज्य की राजनीति में नया मोड़ ला रहे हैं।

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भारत

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Ankit Sai

Apr 07, 2026

Assam Elections 2026

Assam Elections 2026 फाइल फोटो-पत्रिका

Assam Delimitation: असम में 2023 के परिसीमन के बाद पहली बार विधानसभा चुनाव हो रहे हैं और इसका सबसे बड़ा असर अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों पर दिख रहा है। पहले जहां लगभग 35 सीटों पर अल्पसंख्यक मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते थे, अब यह संख्या घटकर करीब 23 रह गई है। इस बदलाव ने न केवल सीटों की संरचना बदली है बल्कि उम्मीदवारों की रणनीति और मतदाताओं के व्यवहार में भी बड़ा परिवर्तन लाया है।

अल्पसंख्यक सीटों में आई कमी

परिसीमन के बाद कई विधानसभा क्षेत्रों का पुनर्गठन हुआ है, जिससे अल्पसंख्यक प्रभाव वाली सीटों की संख्या कम हो गई। हैलाकांडी जिले में 3 सीटों को घटाकर 2 कर सीट कर दिया गया और नई सीट अल्गापुर-कटलीचेहरा बनाई गई। इस सीट पर लगभग 80% मुस्लिम मतदाता हैं, जबकि दूसरी सीट पर हिंदू मतदाता बहुमत में हैं। इससे पुराने विधायकों को अपनी सीट बदलनी पड़ी और मुकाबला अधिक प्रतिस्पर्धी हो गया। जिससे राजनीतिक दलों को नई रणनीति अपनानी पड़ रही है।

सीट बदलने से बढ़ी सियासी हलचल

परिसीमन के कारण कई मौजूदा विधायकों को अपनी पारंपरिक सीटें छोड़नी पड़ीं। अल्गापुर-कटलीचेहरा सीट पर तीन मौजूदा विधायक चुनाव लड़ रहे हैं। इसी तरह बारपेटा जिले की नई मंदिया सीट पर भी कई बड़े नेता आमने-सामने हैं। इसके अलावा, कुछ सीटों के आरक्षित होने से भी उम्मीदवारों को स्थान बदलना पड़ा। जैसे गोलपारा और बरपेटा क्षेत्रों में आरक्षण के कारण विधायकों को नई सीटों से चुनाव लड़ना पड़ रहा है। इस फेरबदल ने स्थानीय स्तर पर असंतोष भी पैदा किया है, क्योंकि कई मतदाता नए उम्मीदवारों को बाहरी मान रहे हैं।

अल्पसंख्यक वोट पर बढ़ी सियासत

परिसीमन के बाद अल्पसंख्यक मतदाताओं के बीच भी सोच में बदलाव देखा जा रहा है। कुछ क्षेत्रों में मतदाता सत्तारूढ़ गठबंधन के प्रति झुकाव दिखा रहे हैं। उनका मानना है कि सरकार के साथ रहने से विकास और सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सकता है। NDA के सहयोगी असम गण परिषद (AGP) ने बड़ी संख्या में मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं, जिससे वह अल्पसंख्यक मतदाताओं के बीच एक संतुलित विकल्प के रूप में उभरने की कोशिश कर रही है। दूसरी ओर BJP ने अपनी रणनीति अलग रखी है और अपने उम्मीदवारों की सूची में मुस्लिम चेहरों को शामिल नहीं किया है। पहचान की राजनीति, नागरिकता मुद्दे और परिसीमन जैसे कारकों के चलते अल्पसंख्यक क्षेत्रों में एक नई राजनीतिक धारा बन रही है।