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Analysis on Assam Elections Result 2026: असम में हिमंत बिस्वा सरमा ने कैसे चुनाव को एकतरफा बना दिया?

Assam Elections Result 2026: असम विधानसभा चुनाव में हिमंत बिस्वा सरकार का जादू एक बार फिर जनता के सिर चढ़कर बोल रहा है। आखिर ऐसा फिर से कैसे मुमकिन हुआ, चलिए जानते हैं।

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Assam Elections Result 2026

Assam Elections Result 2026 (सोर्स- पत्रिका)

Assam Elections Result 2026: असम में भाजपा की वापसी हुई है और इसमें चौंकाने जैसा कुछ नहीं है। चुनावी सभाओं में जिस तरह का प्यार और अपनापन जनता में हिमंत बिस्वा सरमा के प्रति देखने को मिला, उससे परिमाण का अंदाजा हो गया था। एग्जिट पोल्स भी बीजेपी की हैट्रिक की तरफ इशारा कर रहे थे। हालांकि, कांग्रेस की स्थिति इतनी ज्यादा खराब हो जाएगी, यह शायद किसी ने नहीं सोचा था। इस बार के चुनाव में कांग्रेस के पास कई मुद्दे थे।

अल्पसंख्यकों को लेकर मुख्यमंत्री के बयान, भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और राहुल गांधी की सभा में जुटी भीड़ - ऐसा लग रहा था कि भले ही कांग्रेस सरकार बनाने की स्थिति में न आए, लेकिन उसका प्रदर्शन जरूर बेहतर होगा। मगर नतीजे बता रहे हैं कि कांग्रेस आगे बढ़ने के बजाए और पीछे चली गई है। आइए समझते हैं कि कैसे हिमंत बिस्वा सरमा ने इस चुनाव को एकतरफा बना दिया।

जनता से जुड़ाव (Assam Elections Result 2026)

हिमंत बिस्वा सरमा खुद को जन-नायक के तौर पर पेश करने में कामयाब रहे। लोगों के बीच जाना, उनकी परेशानी समझना और उसे हल भी करना - अपनी इस कार्यशैली से सरमा ने जनता के साथ एक रिश्ता कायम किया। जब नेता और मतदाता के बीच रिश्ते की डोर बंध जाती है, तो मुद्दों की आंधी भी उसे तोड़ नहीं पाती। और असम में भी यही हुआ। कांग्रेस ने हिमंत बिस्वा सरमा को लेकर लाख शोर मचाया, मगर जनता ने इस शोर को सुनने के बजाए मुख्यमंत्री के साथ रिश्ते को तवज्जो दी।

नतीतजन बीजेपी के पक्ष में बंपर वोट पड़े। इसके अलावा, सरमा अपनी वर्किंग स्टाइल से भी जनता को प्रभावित करने में सफल रहे। पीएम मोदी की तरह आधी रात को सरकारी योजनाओं का मुआयना करने पहुंचना, शिकायतों पर तुरंत एक्शन लेना और जनता को यह विश्वास दिलाना कि सरकार 24X7 उसके लिए उपलब्ध है - सरमा के पक्ष में गया।

असमिया पहचान (Assam Elections Result 2026)

हिमंत बिस्वा सरमा ने खुद को असमिया पहचान के संरक्षक के रूप में पेश किया। उन्होंने लोगों को समझाया कि हिन्दुत्व वाली सरकार क्यों जरूरी है और सेक्युलरिज्म के नाम पर समुदाय विशेष की तरफ झुकाव रखने वाली पार्टी के सत्ता में आने से क्या नुकसान हो सकते हैं। लव जिहाद और लैंड जिहाद जैसे मुद्दों को उन्होंने असम की पहचान के लिए खतरा बताया। बांग्लादेशी घुसपैठियों को बाहर करने के लिए उन्होंने स्थानीय लोगों की एकजुटता पर जोर दिया।

इससे उन हिन्दू मतदाताओं का वोट भी भाजपा की तरफ शिफ्ट हो गया, जिसके कांग्रेस की तरफ जाने की संभावना बन सकती थी। कांग्रेस सरमा की इस रणनीति की काट नहीं खोज पाई। उसने जब जब सेक्युलरिज्म की बात कही, हिमंत बिस्वा सरमा ने उसे मुस्लिम तुष्टीकरण का नाम दे डाला। असम में 2011 की जनगणना के अनुसार मुस्लिम आबादी 34.2% है, जबकि सरमा कई मौकों पर इसे 40 प्रतिशत बताते रहे। यह भी हिन्दू मतों को खींचने की उनकी रणनीति का एक हिस्सा रहा।

चाय बागान पर पकड़

माना जाता है कि असम की सत्ता तक पहुंचने के लिए चाय बागान के मजदूरों के दिल में उतरना पड़ता है और हिमंत बिस्वा सरमा इसमें कामयाब रहे। मुख्यमंत्री के तौर पर उन्होंने कई ऐसे काम किए, जिससे इन मजदूरों के वोट बीजेपी के पक्ष में पड़े। उदाहरण के तौर पर असम फिक्सेशन ऑफ सीलिंग ऑन लैंड होल्डिंग्स (संशोधन) कानून 2025। यह कानून उन मजदूरों को जमीन का अधिकार देने के लिए बनाया गया है, जो पिछले 200 सालों से चाय बागानों में काम कर रहे हैं।

राज्य सरकार मजदूरों को उस जमीन का मालिकाना हक देने की प्रक्रिया भी शुरू कर चुकी है, जिस पर चाय बागान में उनके घर हैं और जो जमीन बागान मालिकों को राज्य सरकार ने पट्टे पर दी है। इस एक कानून ने चाय बागान मजदूरों के दिल में बीजेपी के प्रति सॉफ्ट कॉर्नर पैदा किया। कांग्रेस ने इस कानून को लेकर कई आशंकाएं व्यक्त कीं, लेकिन मजदूरों की उम्मीद इन आशंकाओं पर भारी पड़ी।

कांग्रेस की खामियां

कांग्रेस ने गौरव गोगोई को सामने रख चुनाव लड़ा। गोगोई की छवि अपेक्षाकृत साफ है, लेकिन वह खुद को हिमंत बिस्वा सरमा की तरह जमीनी नेता के तौर पर पेश नहीं कर पाए। इसके अलावा, कांग्रेस नेता पवन खेड़ा द्वारा सरमा की पत्नी पर लगाए गए आरोपों ने भी हवा का रुख कांग्रेस के खिलाफ कर दिया। आरोप लगाने के बाद गिरफ़्तारी से बचने के लिए खेड़ा का अदालत दर अदालत भागना, आरोपों की सच्चाई पर गंभीर सवाल खड़ा कर गया।

यदि खेड़ा मजबूती के साथ डटे रहते, गौरव गोगोई सहित सभी नेता उनका बराबर से साथ देते तो शायद सरमा के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती थी। कांग्रेस का पूरा चुनावी कैम्पेन हिमंत बिस्वा सरमा तक सीमित था। राहुल गांधी से लेकर लगभग हर नेता के भाषण का केंद्र सरमा ही रहे, ऐसे में जनता को यह समझ नहीं आया कि सत्ता में आने पर कांग्रेस राज्य का विकास करेगी या सरमा से व्यक्तिगत दुश्मनी निभाएगी। जाहिर है ऐसे में उसने कांग्रेस को विकल्प मानने से इनकार कर दिया