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बढ़ा मतदान, चढ़ा सियासी पारा: असम में रिकॉर्ड वोटिंग के क्या हैं मायने?

असम में इस बार वोटिंग प्रतिशत बढ़ा है। असम के मतदाताओं ने इस बार रिकॉर्ड वोटिंग की है। मतदान प्रतिशत बढ़ने से क्या सियासी समीकरण बदल जाएंगे, आइए समझते हैं।

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Voting in Assam

असम चुनाव (Photo- IANS)

Assembly Elections 2026: तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों में जबरदस्त मतदान के बाद अब कयासों का बाजार गर्म है। पूर्वोत्तर के प्रवेश द्वार असम में इस बार मुकाबला बेहद दिलचस्प है। 2016 में पहली बार सरकार बनाने वाली भाजपा जहां हैट्रिक लगाने की दहलीज पर है। वहीं, कांग्रेस 10 साल बाद सत्ता में वापसी की पुरजोर कोशिश कर रही है।

असम में ऐतिहासिक मतदान, 75 साल का रिकॉर्ड टूटा

असम में परिसीमन के बाद 126 सीटों पर करीब ढाई करोड़ मतदाताओं ने 722 उम्मीदवारों की किस्मत का फैसला EVM में कैद कर दिया है। असम के 75 साल के चुनावी इतिहास में इस बार सर्वाधिक 85.96 % मतदान दर्ज किया गया है, जो पिछली बार से लगभग 3.5% अधिक है।

आमतौर पर बढ़ते मतदान को सत्ता विरोधी लहर माना जा रहा है, लेकिन असम के संदर्भ में यह तर्क सटीक नहीं बैठता। इसकी वजह है कि साल 2016 में यहां 8% मतदान बढ़ा और भाजपा ने 60 सीटें जीतकर सरकार बनाई, लेकिन साल 2021 में मतदान 2% गिरा, फिर भी भाजपा अपनी 60 सीटें बचाने में कामयाब रही। इसलिए यह कहना कठिन है कि बढ़ा हुआ वोट किसके पक्ष में जाएगा।

मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण या विभाजन?

केरल राज्य में 34% मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। पिछली बार कांग्रेस और बदरुद्दीन अजमल की एआइयूडीएफ मिलकर लड़े थे, लेकिन इस बार दोनों अलग हैं। मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर 90-95 फीसदी तक मतदान हुआ है। यदि मुस्लिम वोटों का विभाजन होता है, तो इसका सीधा लाभ भाजपा को मिलेगा।

नेतृत्व की साख पर भी लगेगी मुहर

भाजपा का पूरा प्रचार अभियान हिमंता बिस्वा सरमा के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा। कांग्रेस से नेताओं को तोड़कर भाजपा में लाने की उनकी रणनीति कारगर तो रही, लेकिन इससे पार्टी के भीतर कुछ असंतोष भी पनप रहा है। दूसरी ओर, कांग्रेस की कमान गौरव गोगोई के हाथों में है, जिन्होंने अपने पिता तरुण गोगोई की विरासत को बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया है।

मतदान प्रतिशत का हार-जीत पर असर नहीं

मतदान प्रतिशत कम या ज्यादा होने का असर हार-जीत पर नहीं दिख रहा है। उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश में 2017 के चुनाव में राज्य की 403 सीटों के लिए 61% मतदान हुआ और भाजपा 312 सीटें जीतकर सत्ता में आई थी। 2022 के चुनाव में भी मतदान 61% ही रहा, लेकिन सत्तारूढ़ भाजपा की सीटें 312 से घटकर 255 रह गई। इसका मतलब है कि स्थिर मतदान के बावजूद भी पिछले चुनाव के मुकाबले 57 सीटें घट गईं।

महाराष्ट्र में मतदान प्रतिशत बढ़ा, सीटें भी बढ़ीं

उदाहरण के तौर पर महाराष्ट्र में 2019 के विधानसभा चुनाव में 61.44% मतदान हुआ। नतीजों में भाजपा गठबंधन 162 सीटें जीतकर सत्ता में आया। पांच साल बाद 2024 में मतदान 5% बढ़कर 66.57% हो गया। इसके बावजूद सत्तारूढ़ भाजपा गठबंधन की सीटों का आंकड़ा 73 बढ़कर 235 हो गया।