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Bihar Politics: शिवराज सिंह कैसे बने ‘किंगमेकर’ और सम्राट चौधरी को क्यों बनाया मुख्यमंत्री ? जानिए इनसाइड स्टोरी

Samrat Choudhary Bihar CM: बिहार की राजनीति में ऐतिहासिक बदलाव हुआ है। नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद सम्राट चौधरी नए मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं, जानिए शिवराज सिंह चौहान के 'किंगमेकर' बनने की पूरी इनसाइड स्टोरी।

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पटना

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MI Zahir

Apr 14, 2026

Samrat Choudhary Bihar CM

शिवराजसिंह चौहान व सम्राट चौधरी । ( फोटो: ANI)

Bihar new CM : बिहार की राजनीति में 14 अप्रेल 2026 का दिन एक ऐतिहासिक बदलाव और नए युग की शुरुआत के रूप में दर्ज हो गया है। दो दशकों से ज्यादा समय तक सत्ता के केंद्र रहे नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे और राज्यसभा का रुख करने के बाद, राज्य में पहली बार पूर्ण रूप से भाजपा का मुख्यमंत्री बनने जा रहा है। इस पूरी राजनीतिक पटकथा के केंद्र में दो अहम चेहरे हैं- 'किंगमेकर' की भूमिका निभाने वाले मध्यप्रदेश की राजनीति के चाणक्य केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान और बिहार के नए मुख्यमंत्री, सम्राट चौधरी। जानिए इस पूरे एपिसोड से संबंधित इनसाइड स्टोरी।

चाणक्य मामा और उनकी लंबी राजनीतिक बिसात

शिवराज सिंह चौहान का मध्य प्रदेश का अनुभव बेहद व्यापक और ऐतिहासिक है। वे मध्य प्रदेश के इतिहास में सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले मुख्यमंत्री रहे हैं। उनके पास मध्य प्रदेश में सियासत का लंबा अनुभव है। उन्होंने चार अलग-अलग कार्यकालों (2005-2008, 2008-2013, 2013-2018, और 2020-2023) में मध्य प्रदेश की सत्ता संभाली। उनके पास 16 साल से अधिक समय तक एक बड़े हिंदी भाषी राज्य की सरकार चलाने का निर्विवाद प्रशासनिक अनुभव है। मुख्यमंत्री बनने से पहले वे भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे और पांच बार विदिशा से सांसद चुने गए। बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं से लेकर आम जनता के बीच उनकी बहुत गहरी और सीधी पकड़ है। वे संगठन को साथ लेकर चलने और पार्टी के भीतर की महत्वाकांक्षाओं (गुटबाजी) को साधने में माहिर माने जाते हैं।

'मामा' की छवि और कल्याणकारी योजनाएं

मध्य प्रदेश में उन्होंने अपनी छवि एक सख्त प्रशासक से ज्यादा परिवार के सदस्य (मामा और भैया) के रूप में बनाई। 'लाड़ली लक्ष्मी योजना', 'तीर्थ दर्शन योजना' और 'लाड़ली बहना योजना' जैसी उनकी योजनाओं ने न सिर्फ राज्य की राजनीति की दिशा बदली, बल्कि पूरे देश में एक मॉडल के रूप में अपनाई गईं।

वे संकटमोचक की भूमिका निभाते रहे हैं

2018 में मामूली अंतर से सत्ता गंवाने के बाद, जब 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में कांग्रेस विधायकों ने बगावत की, तब शिवराज सिंह ने बेहद कुशलता से उस पूरे राजनीतिक संकट (Crisis Management) को संभाला और दोबारा भाजपा की स्थिर सरकार बनाई।

मध्यप्रदेश में कृषि क्षेत्र का कायाकल्प किया

शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में मध्य प्रदेश को "बीमारू राज्य" की श्रेणी से बाहर निकालकर एक कृषि प्रधान पावरहाउस बनाया गया। उनके नेतृत्व में राज्य ने लगातार कई वर्षों तक केंद्र सरकार का 'कृषि कर्मण पुरस्कार' जीता। यही लंबा जमीनी, प्रशासनिक और संकट-प्रबंधन का अनुभव उन्हें भाजपा के सबसे अनुभवी और 'सहमति बनाने वाले' नेताओं में से एक बनाता है। इसी तजुर्बे के कारण केंद्रीय नेतृत्व उन्हें अन्य राज्यों में जटिल राजनीतिक समीकरणों को सुलझाने की जिम्मेदारी सौंपता है।

शिवराज सिंह चौहान को 'किंगमेकर' (केंद्रीय पर्यवेक्षक) क्यों बनाया गया?

भाजपा आलाकमान ने 12 अप्रेल को केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान को बिहार में विधायक दल के नए नेता के चुनाव के लिए केंद्रीय पर्यवेक्षक नियुक्त किया था। इस अहम जिम्मेदारी के लिए उन्हें चुनने के पीछे दिल्ली की खास रणनीति थी।

चौहान को सत्ता हस्तांतरण का तजुर्बा

शिवराज सिंह चौहान खुद चार बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और जमीनी राजनीति से लेकर सत्ता हस्तांतरण की बारीकियों को बखूबी समझते हैं।

गुटबाजी पर नियंत्रण पाने में माहिर

जब राज्य में पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री बन रहा हो, तो पार्टी के भीतर कई महत्वाकांक्षाएं हिलोरे मारती हैं। शिवराज की छवि एक बेहद शांत, सर्वमान्य और 'सहमति बनाने वाले' सर्वसम्मति निर्माता नेता की है। उनकी मौजूदगी ने यह सुनिश्चित किया कि 14 अप्रेल की विधायक दल की बैठक में बिना किसी विरोध या क्रॉस-वोटिंग के सर्वसम्मति बन सके।

केंद्रीय नेतृत्व का साफ संदेश

शिवराज सिंह जैसे कद्दावर नेता को पटना भेजकर आलाकमान ने साफ संदेश दिया कि यह नेतृत्व परिवर्तन पूरी तरह से प्रधानमंत्री और केंद्रीय नेतृत्व की सीधी निगरानी में हो रहा है, जिसमें किसी भी प्रकार की गुटबाजी के लिए कोई जगह नहीं है। इन सब कारणों से भाजपा आलाकमान ने चौहान को बिहार में सत्ता हस्तांतरण की जिम्मेदारी सौंपी है।

सम्राट चौधरी कैसे और क्यों बने मुख्यमंत्री ?

सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचना कोई रातों-रात हुआ चमत्कार नहीं है, बल्कि यह भाजपा के एक लंबे राजनीतिक निवेश का परिणाम है।

'लव-कुश' समीकरण को साधना अहम मकसद

बिहार की राजनीति में कुर्मी और कोइरी (कुशवाहा) समाज का 'लव-कुश' वोट बैंक पारंपरिक रूप से नीतीश कुमार की ताकत रहा है। सम्राट चौधरी कुशवाहा समाज के बड़े चेहरे हैं। 2018 में उनके भाजपा में शामिल होने के बाद से ही पार्टी ने उन्हें इस मजबूत वोट बैंक में सेंधमारी के लिए प्रोजेक्ट किया।

आक्रामक और युवा नेतृत्व चुनना था

उन्हें 2023 में प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपी गई। उनके नेतृत्व में पार्टी ने बेहद आक्रामक तेवर अपनाए। 2025 के विधानसभा चुनाव में भाजपा 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। इसके बाद तारापुर से विधायक चुने गए सम्राट चौधरी का कद पार्टी में सबसे बड़ा हो गया।

डिप्टी सीएम से सीएम : स्वाभाविक प्रमोशन

सन 2024 की शुरुआत में जब नीतीश कुमार एनडीए में लौटे थे और फिर 2025 के विधानसभा चुनावों के बाद, सम्राट चौधरी ने उपमुख्यमंत्री के रूप में काम किया। उन्होंने प्रशासन और सरकार चलाने का जरूरी अनुभव हासिल कर लिया था।

सत्ता के इस हस्तांतरण की असली वजह: अंदर की बात

जानकारी के मुताबिक, 2025 के विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद ही यह 'स्क्रिप्ट' तय हो गई थी कि भाजपा अब 'बड़े भाई' की भूमिका से आगे बढ़कर 'ड्राइविंग सीट' पर बैठेगी और नीतीश कुमार सम्मानजनक विदाई लेंगे। 10 अप्रेल 2026 को नीतीश कुमार के राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ लेने के साथ ही यह रास्ता साफ हो गया था।

अगले एक दशक तक बिहार में पार्टी का चेहरा

बहरहाल, भाजपा को एक ऐसे नेता की तलाश थी जो न सिर्फ एक मजबूत जातीय आधार (OBC) रखता हो, बल्कि जो अगले एक दशक तक बिहार में पार्टी का चेहरा बन सके। सम्राट चौधरी इन सभी पैमानों पर सटीक बैठे। 14 अप्रेल को विधायक दल की बैठक में शिवराज सिंह चौहान की मौजूदगी में उनके नाम पर मुहर लगी। बिहार की राजनीति में जो भाजपा हमेशा 'सहयोगी' बनकर रही, वह अब सम्राट चौधरी की ताजपोशी ( संभावित 15 अप्रैल सुबह 11 बजे) के साथ अपना नया और स्वतंत्र अध्याय लिखने जा रही है।