
देसी डीएनए: जीनोम स्टडी ने छीना कॉकरोच से यूरोप मूल का तमगा, बंगाल की खाड़ी में निकलीं जड़ें (AI जनरेटेड इमेज)
Cockroach DNA Study: सोशल मीडिया पर तेजी से फॉलोवर जुटा रही 'कॉकरोच जनता पार्टी' चर्चा में है। इस बीच यह जानना दिलचस्प है कि 'परमाणु सर्वनाश' से लेकर 'डायनासोरों को खत्म करने वाले उल्कापिंडों' तक को झेल जाने वाले इस जीव के इतिहास की शुरुआत भारत से हुई है जबकि सदियों तक लोग कॉकरोच को यूरोपीय मूल का मानते रहे। 18वीं शताब्दी में स्वीडिश वर्गीकरण-विज्ञानी कार्ल लिनियस ने 1776 में इस जीव का पहली बार वैज्ञानिक नामकरण 'जर्मन कॉकरोच' (ब्लाटेला जर्मेनिका कॉकरोच) किया। मध्य यूरोप के रेकॉर्ड्स में यह जीव पहली बार वहीं देखा गया था, इसलिए इसे स्थानीय मान लिया गया। हालांकि, मई 2024 में 'प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज' जर्नल में प्रकाशित एक स्टडी में वैज्ञानिकों ने 17 देशों और 6 महाद्वीपों से जमा किए गए 281 कॉकरोच के सैंपल्स के डीएनए का विश्लेषण कर बताया कि वास्तव में कॉकरोच का 'होम टाउन' बंगाल की खाड़ी था!
वैज्ञानिकों ने पाया कि 'जर्मन कॉकरोच' वास्तव में पूर्वी भारत, म्यांमार और बंगाल की खाड़ी के इलाकों में पाए जाने वाले कॉकरोच का ही बदला हुआ रूप है। लगभग 2,100 साल पहले भारत और म्यांमार के जंगलों में रहने वाले इन कॉकरोचों ने इंसानी बस्तियों में घुसपैठ शुरू की। खेती और कचरे के कारण उन्हें आसानी से भोजन और गर्माहट मिलने लगी तो आगे चलकर यह जंगल भूल गए और पूरी तरह से 'शहरी प्रजाति' बन गए।
पहली लहर (1,200 साल पहले): यह विस्तार पश्चिम की ओर हुआ। उस दौर में दक्षिण एशिया (भारत) और मध्य पूर्व के बीच बढ़ते व्यापारिक मार्गों और इस्लामिक राजवंशों के व्यावसायिक संपर्कों से यह अरब देशों तक पहुंचे।
दूसरी लहर (390 साल पहले): ईस्ट इंडिया कंपनी जैसी औपनिवेशिक ताकतों के समुद्री जहाजों, लकड़ी के बक्सों और खाद्य सामग्रियों के भीतर छिपकर 'देसी कॉकरोच' यूरोप, अफ्रीका और अमरीका के दौरे पर निकल गए।
इन्हें मिटाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन!
दुनिया के सबसे जिद्दी और लचीले जीवों में से एक कॉकरोच आज दुनिया के सबसे महंगे अपार्टमेंट्स, फाइव-स्टार रेस्टोरेंट्स, अस्पतालों, आलीशान होटलों और न्यूयॉर्क से लेकर दिल्ली मेट्रो तक में राज कर रहा है। इसके डीएनए इतनी तेजी से म्यूटेट होते हैं कि हर कीटनाशक को ये 'बूस्टर डोज' की तरह हजम कर जाते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि आधुनिक वैश्विक व्यापार ने इनके लिए दुनिया भर में ब्रिजहेड यानी 'सुरक्षित ठिकाने' बनाने में मदद की है।
Published on:
23 May 2026 03:00 am
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