
Shashi Tharoor (Photo - ANI)
Shashi tharoor on India Foreign Policy: अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में आज शांति वार्ता होने जा रही है। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस जहां अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे हैं, वहीं ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ईरान की ओर से वार्ता की अगुआई करेंगे। दुनिया भर की निगाहें इस पर टिकी हुई हैं। भारत भी मध्य-पूर्व में शांति की उम्मीद लगाए हुए है। इसी कड़ी में, दोनों देशों की शांति वार्ता में पाकिस्तान की भूमिका पर पार्टी और अपने ही साथी जयराम रमेश के रुख से बिल्कुल विपरीत कांग्रेस सांसद शशि थरूर का बड़ा बयान सामने आया है।
उन्होंने एक कार्यक्रम में कहा, 'इस युद्ध का असर भारतीय रसोई तक पहुंच चुका है। इसलिए हमारी रुचि शांतिपूर्ण समाधान में है। इस युद्ध ने हमारी फैक्ट्रियों को भी प्रभावित किया है। इसलिए कोई भी शांति स्थापित करे, चाहे वह पाकिस्तान ही क्यों न हो, यह हमारे लिए मुद्दा नहीं है। हम शांति चाहते हैं। मुझे खुशी है कि हमारी सरकार, प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री और पेट्रोलियम मंत्री उस क्षेत्र के नेताओं के संपर्क में हैं। हम अलग-थलग रहने का जोखिम नहीं उठा सकते। यह संपर्क हमें प्रासंगिक बनाए रखता है और भविष्य में हमें बड़ी भूमिका निभाने में सक्षम बना सकता है, जो आज हम नहीं कर पा रहे हैं।' वहीं शशि थरूर के विपरित कांग्रेस ने विदेश नीति तो लेकर मोदी सरकार को घेरा है।
कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने ईरान-अमेरिका शांति वार्ता के मद्देनजर मोदी सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाए।जयराम रमेश ने कहा, 'अमेरिका-ईरान की बैठक आज इस्लामाबाद में शुरू हो रही है। भारत सहित पूरी दुनिया यह उम्मीद कर रही है कि यह दोनों देशों के बीच एक स्थायी शांति प्रक्रिया की शुरुआत होगी, बशर्ते कि इजरायल की जारी आक्रामकता इसे पटरी से न उतार दे। लेकिन स्वयंभू ‘विश्वगुरु’ की झप्पी कूटनीति के सार और शैली दोनों को लेकर गंभीर सवाल उठते हैं।'
कांग्रेस सांसद जयराम रमेश यही नहीं रुके, उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘x’ के जरिए मोदी सरकार से चार गंभीर प्रश्न पूछे।
1. अप्रैल 2025 के कायरतापूर्ण पहलगाम आतंकी हमले में अपनी भूमिका और उसके बाद भारत द्वारा उसे अलग-थलग करने के लिए चलाए गए कूटनीतिक प्रयासों के बावजूद, पाकिस्तान ने अपने लिए यह नई भूमिका कैसे बना ली? यह विफलता इसलिए और भी गंभीर है क्योंकि डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने नवंबर 2008 के मुंबई आतंकी हमलों के बाद पाकिस्तान को प्रभावी रूप से अलग-थलग कर दिया था।
2. ‘नमस्ते ट्रंप’, ‘हाउडी मोदी’ और फिर एक बार ट्रंप सरकार’ जैसे अभियानों के बावजूद, भारत ने अमेरिका को पाकिस्तान को यह नई भूमिका देने की अनुमति कैसे दी? भारत ने एक स्पष्ट रूप से एकतरफा व्यापार समझौते पर भी सहमति दी, जिसमें उसने जितना पाया, उससे कहीं अधिक दिया-फिर भी मोदी सरकार अमेरिका के साथ कोई ठोस लाभ हासिल करने में विफल रही।
3. BRICS+ के वर्तमान अध्यक्ष के रूप में भारत ने कोई शांति या मध्यस्थता की पहल क्यों नहीं की, खासकर तब, जब ईरान, यूएई और सऊदी अरब BRICS+ के सदस्य हैं?
4. पिछले अठारह महीनों में चीन के प्रति भारत की संतुलित ‘आत्मसमर्पण’ की नीति से देश को क्या हासिल हुआ—खासकर तब, जब ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के जवाब में पाकिस्तान की भूमिका में चीन की केंद्रीय भूमिका रही है और वह लगातार पाकिस्तान को समर्थन देता रहा है?
पश्चिम एशिया में शांति जल्द से जल्द बहाल होनी चाहिए। होर्मुज जलडमरूमध्य को भी उसी स्थिति में लौटना चाहिए, जो 28 फरवरी को अमेरिका-इज़रायल द्वारा ईरान पर हमले शुरू होने से पहले थी—यानी ठीक दो दिन बाद, जब प्रधानमंत्री मोदी ने इज़रायल की एक बेहद अविवेकपूर्ण और गलत समय पर की गई यात्रा पूरी की थी।
आपको बता दें कि अमेरिका और ईरान के बीच यह वार्ता अविश्वास के माहौल में हो रही है। अमेरिका की ओर से समझौता नहीं होने की स्थिति में हमले की धमकी दी जा रही है, वहीं ईरान ने वाशिंगटन पर वादाखिलाफी और कूटनीतिक विश्वासघात का आरोप लगाया है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दोनों देश इस मसले को किस तरह सुलझाते हैं। दुनिया की निगाहें इस वार्ता पर टिकी हुई हैं।
Updated on:
11 Apr 2026 05:07 pm
Published on:
11 Apr 2026 04:59 pm
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