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यात्रियों को नहीं मिली आरक्षित सीट, रेलवे पर लगा 10 गुना जुर्माना, कंज्यूमर कोर्ट ने सुनाया फैसला

Indian Railway: भोजपुर कंज्यूमर कोर्ट ने यात्रियों को आरक्षित सीट न देने पर भारतीय रेलवे पर जुर्माना लगाया है। यात्रा के दौरान अपनी कन्फर्म सीट से वंचित रहने और खड़े होकर सफर करने वाले चार यात्रियों को कोर्ट ने 20,000 रुपए का मुआवजा, टिकट राशि ब्याज सहित और कानूनी खर्च लौटाने का आदेश दिया है। पढ़ें पूरी खबर।
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भारत

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Satya Brat Tripathi

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Updated: 29 May 2026, 8:26 AM IST

Indian Railways

Consumer Court on Railway: कंज्यूमर कोर्ट ने यात्रियों को आरक्षित बर्थ उपलब्ध न कराने के लिए भारतीय रेलवे को जिम्मेदार ठहराया है। भोजपुर कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन ने रेलवे को उन चार यात्रियों को 20,000 रुपए का मुआवजा देने का निर्देश दिया है, जिन्हें पूरी यात्रा खड़े होकर करनी पड़ी। 'बार एंड बेंच' की रिपोर्ट के मुताबिक, यह शिकायत तब सामने आई जब विंध्याचल (मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश) से आरा (भोजपुर, बिहार) जा रहे एलटीटी-पटना एक्सप्रेस के चार यात्रियों ने ट्रेन में चढ़ते समय पाया कि उनकी आरक्षित सीटों (बर्थ) पर रेलवे के कर्मचारी बैठे हुए थे। यात्रियों ने कर्मचारियों से अपनी आरक्षित बर्थ खाली करने का अनुरोध किया, लेकिन उन्होंने सीट खाली नहीं की।

कृष्णा प्रताप सिंह (अध्यक्ष) और कमल किशोर सिंह (सदस्य) की पीठ ने पाया कि रेलवे की सेवा में कमी (खामियों) के कारण यात्रियों को मानसिक, शारीरिक और आर्थिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। पीठ ने उत्तर मध्य रेलवे और रेल मंत्रालय को आदेश दिया है कि वे टिकट बुकिंग की राशि 1,876.80 रुपए को 8% वार्षिक ब्याज के साथ वापस करें। साथ ही, 60 दिनों के भीतर मुआवजे के रूप में 20,000 रुपए और कानूनी खर्च के तौर पर 15,000 रुपए का भुगतान करें।

शिकायत के बावजूद नहीं हुई कार्रवाई

यात्रियों ने पहले रेलवे हेल्पलाइन, 'रेलवे सेवा' और रेल मंत्रालय सहित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों के माध्यम से शिकायत दर्ज कराने का प्रयास किया था। एसएमएस (SMS) के माध्यम से शिकायत संदर्भ संख्या (कम्प्लेंट रेफरेंस नंबर) मिलने के बावजूद यात्रियों का आरोप है कि यात्रा के दौरान कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। यात्रियों ने यह भी बताया कि जब बक्सर स्टेशन पर एक टीटीई (TTE) आया, तब उन्होंने फिर से इस मुद्दे को उठाया, लेकिन कथित तौर पर उन्हें ट्रेन में भारी भीड़ का हवाला देकर खुद ही मामला संभालने को कह दिया गया।

रेलवे का तर्क

कंज्यूमर कोर्ट के समक्ष रेलवे ने तर्क दिया कि कानून-व्यवस्था से संबंधित विवाद रेलवे पुलिस (GRP) के अधिकार क्षेत्र में आता है। रिपोर्टों के अनुसार, रेलवे ने सेवा में किसी भी तरह की कमी से इनकार किया और दावा किया कि शिकायत पर उचित कार्रवाई पहले ही की जा चुकी थी। हालांकि, यात्रियों द्वारा प्रस्तुत किए गए टिकटों, शिकायत रिकॉर्ड, टेक्स्ट संदेशों और तस्वीरों की समीक्षा करने के बाद कंज्यूमर कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि रेलवे अधिकारी अपनी तय सेवा प्रदान करने में पूरी तरह विफल रहे। इस लापरवाही के कारण यात्रियों को उनकी आरक्षित सीटों से वंचित होना पड़ा। उन्हें मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न झेलना पड़ा।