
लोकसभा (File Photo)
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने पिछले 12 वर्षों (2014-15 से 2025-26) के दौरान बड़े उद्योगों और सेवा क्षेत्र के करीब 7.75 लाख करोड़ रुपए के कर्ज बट्टे खाते (राइट-ऑफ) में डाल दिए। इनमें से अब तक करीब 3.10 लाख करोड़ रुपए की ही वास्तविक वसूली हो सकी है। यानी राइट-ऑफ की गई राशि का लगभग 40% ही वापस आया, जबकि शेष राशि की वसूली अभी भी जारी है। यह जानकारी वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने लोकसभा में आरएलपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल के प्रश्न के लिखित उत्तर में दी।
सरकार ने यह भी बताया कि 31 मार्च 2026 तक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में 100 करोड़ रुपए या उससे ज़्यादा के राइट-ऑफ वाले 1,249 बड़े उधारकर्ता हैं, जिनकी कुल राइट-ऑफ राशि 4.19 लाख करोड़ है। हालांकि इन कंपनियों के नाम सार्वजनिक करने से सरकार ने इनकार कर दिया। सरकार का कहना है कि आरबीआई अधिनियम की धारा 45 ई के तहत उधारकर्ता-वार जानकारी गोपनीय होती है और उसका खुलासा नहीं किया जा सकता।
सरकार ने स्पष्ट किया कि राइट-ऑफ का मतलब कर्ज माफ करना नहीं है। यह सिर्फ बैंकिंग लेखांकन की प्रक्रिया है, जिससे खराब ऋणों को बैलेंस शीट से हटाया जाता है। उधारकर्ता पर कर्ज चुकाने की ज़िम्मेदारी बनी रहती है और बैंक विभिन्न कानूनी माध्यमों से वसूली जारी रखते हैं।
सरकार के अनुसार बड़े डिफॉल्टरों से वसूली तेज़ करने के लिए दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, सरफेसी कानून, डीआरटी, तनावग्रस्त परिसंपत्ति प्रबंधन प्रकोष्ठ, अर्ली वॉर्निंग सिस्टम समेत कई सुधार लागू किए गए हैं जिससे खराब ऋणों की समयबद्ध वसूली सुनिश्चित की जा सके।
इस बारे में बेनीवाल ने कहा, "एक तरफ किसान, युवा, छोटे व्यापारी और मध्यम वर्ग मामूली ऋण नहीं चुका पाने पर नोटिस, कुर्की और कानूनी कार्रवाई का सामना करते हैं, जबकि दूसरी ओर बड़े कॉरपोरेट घरानों के लाखों करोड़ रुपए के ऋण बट्टे खाते में डाल दिए जाते हैं। सरकार किसान कर्ज माफी पर बात तक करने को तैयार नहीं है। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि जनता की मेहनत की कमाई जिन बैंकों में जमा है, उन्हीं बैंकों के हजारों करोड़ रुपए डूबने के बावजूद सरकार पारदर्शिता बरतने को तैयार नहीं है।"
Updated on:
21 Jul 2026 04:04 am
Published on:
21 Jul 2026 04:04 am
