
धर्मेंद्र प्रधान (File Photo: Patrika)
Modi Government: नीट-यूजी 2026 पेपर लीक विवाद और उससे जुड़े देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मोदी सरकार के लिए एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम माना जा रहा है। वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद यह बेहद दुर्लभ मौका है, जब लगातार सार्वजनिक दबाव के बीच किसी केंद्रीय मंत्री ने पद छोड़ा है। इससे पहले 2018 में एम. जे. अकबर ने #MeToo आरोपों के बीच केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा दिया था।
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन में धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा प्रमुख मांग बना हुआ था। सरकार ने प्रदर्शनकारियों की कई अन्य मांगें मानने का आश्वासन दिया था। इनमें नीट पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजा और संसद मार्च में शामिल छात्रों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं करने जैसे मुद्दे शामिल थे। हालांकि प्रदर्शनकारी शिक्षा मंत्री के इस्तीफे से पहले बातचीत के लिए तैयार नहीं थे। सीजेपी ने साफ कहा था कि सरकार के साथ तीसरे दौर की वार्ता तभी होगी, जब धर्मेंद्र प्रधान पद छोड़ेंगे। निर्धारित वार्ता से कुछ घंटे पहले ही उनका इस्तीफा सामने आ गया और बाद में बातचीत भी हुई।
57 वर्षीय धर्मेंद्र प्रधान ने अपने इस्तीफे में नीट पेपर लीक की पूरी जिम्मेदारी लेते हुए कहा कि उन्होंने कभी इस स्थिति से मुंह नहीं मोड़ा। हालांकि उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जिम्मेदार पदों पर बैठे कुछ लोगों ने बाधाएं पैदा कीं और छात्रों को गुमराह करने की कोशिश की। उन्होंने लिखा कि जंतर-मंतर और देशभर की परिस्थितियों को देखते हुए, राष्ट्रविरोधी ताकतों को इसका फायदा उठाने से रोकने, राष्ट्रीय एकता बनाए रखने, किसी भी छात्र के भविष्य को कानूनी उलझनों में फंसने से बचाने और छात्रों को पढ़ाई पर ध्यान देने का अवसर देने के उद्देश्य से उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना इस्तीफा सौंप दिया है।
विपक्ष लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि नरेंद्र मोदी सरकार में विवादों के बावजूद मंत्रियों से इस्तीफा नहीं लिया जाता। इस आरोप को 2015 में उस समय और बल मिला था, जब तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि 'यह एनडीए सरकार है, यहां इस्तीफे नहीं होते।
धर्मेंद्र प्रधान से पहले मोदी सरकार में सबसे चर्चित इस्तीफा अक्टूबर 2018 में आया था, जब विदेश राज्य मंत्री एम. जे. अकबर ने #MeToo अभियान के दौरान कई महिलाओं द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों के बाद पद छोड़ दिया था। अकबर 2016 से विदेश राज्य मंत्री थे। आरोप लगाने वाली कई महिलाएं उनके साथ उस समय काम कर चुकी थीं, जब वह विभिन्न अखबारों के संपादक थे। उस समय भी विरोध हुआ था, लेकिन वह धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ हुए आंदोलन जितना व्यापक नहीं था।
उस दौर की मीडिया रिपोर्टों में कहा गया था कि इस्तीफा अकबर का व्यक्तिगत फैसला था और वह भाजपा में बने रहेंगे। भाजपा नेताओं के हवाले से यह भी कहा गया था कि इसे भविष्य के लिए मिसाल नहीं माना जाना चाहिए।
धर्मेंद्र प्रधान का मामला इसलिए भी अलग माना जा रहा है क्योंकि पिछले वर्षों में कई केंद्रीय मंत्रियों पर विवाद होने के बावजूद उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया।
2021 में उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी कांड के बाद केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय कुमार मिश्रा 'टेनी' के इस्तीफे की विपक्ष ने जोरदार मांग की थी। एक एसयूवी, जो उनके नाम पर रजिस्टर्ड थी, किसानों और एक पत्रकार पर चढ़ गई थी। इस मामले में उनके बेटे पर वाहन चलाने का आरोप लगा था। इसके बावजूद मिश्रा अपने पद पर बने रहे और 2024 के लोकसभा चुनाव में हारने के बाद ही मंत्री नहीं रहे।
इसी तरह अगस्त 2017 में लगातार दो रेल दुर्घटनाओं के बाद तत्कालीन रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफे की पेशकश की थी। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तत्काल उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया। बाद में कैबिनेट फेरबदल में उन्हें रेल मंत्रालय से हटाकर वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय की जिम्मेदारी दे दी गई।
Updated on:
25 Jul 2026 11:40 pm
Published on:
25 Jul 2026 11:40 pm
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