
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान। (फोटो: X Handle/ Satyajeet Mishra)
Assurance: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC Caste Discrimination Rules 2026) की ओर से शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए लागू किए गए नए नियमों पर देशभर में घमासान मचा हुआ है। इस विवाद के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान (Dharmendra Pradhan Statement UGC) ने अपनी पहली प्रतिक्रिया देते हुए स्थिति स्पष्ट की है। उन्होंने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि इन नियमों का मकसद किसी का उत्पीड़न करना नहीं है और किसी को भी इनके दुरुपयोग की अनुमति नहीं दी जाएगी। धर्मेंद्र प्रधान ने सार्वजनिक रूप से आश्वस्त किया कि यूजीसी (Higher Education Reforms India) के ये नियम किसी के खिलाफ हथियार के तौर पर इस्तेमाल नहीं होने दिए जाएंगे। उन्होंने साफ कहा, "मैं यह भरोसा दिलाना चाहता हूं कि किसी का उत्पीड़न नहीं होगा और न ही किसी के साथ कोई भेदभाव (Campus Equality Guidelines) किया जाएगा।" मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि भेदभाव रोकने के नाम पर किसी को भी नियमों के साथ खिलवाड़ करने का अधिकार नहीं मिलेगा।
संविधान और सुप्रीम कोर्ट के दायरे में नियम विवाद को शांत करने की कोशिश करते हुए शिक्षा मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि ये नए नियम संविधान की मर्यादा को ध्यान में रख कर बनाए गए हैं। साथ ही, इनका क्रियान्वयन और निगरानी सीधे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत की जा रही है। सरकार का तर्क है कि ये नियम कैम्पस को अधिक सुरक्षित और समावेशी बनाने के लिए हैं, न कि किसी विशेष वर्ग को निशाना बनाने के लिए हैं।
ध्यान रहे कि यूजीसी ने 13 जनवरी को कॉलेज और यूनिवर्सिटीज में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए एक विस्तृत गाइडलाइन जारी की थी। इन नियमों के आते ही देशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। विशेषकर सवर्ण संगठनों ने इसे लेकर गहरी नाराजगी जताई है। उनका दावा है कि इन नियमों की आड़ में सामान्य वर्ग के छात्रों को झूठे मामलों में फंसाया जा सकता है और उनके लिए उच्च शिक्षा संस्थानों में पढ़ाई करना कठिन हो जाएगा।
इस मुद्दे ने न केवल सामाजिक बल्कि राजनीतिक रूप ले लिया है। बीजेपी के अंदर भी इसे लेकर मतभेद उभर रहे हैं और कुछ नेताओं के इस्तीफे की खबरें भी सामने आई हैं। बिगड़ते हालात को देखते हुए केंद्र सरकार अब 'डैमेज कंट्रोल' मोड में आ गई है। सरकारी सूत्रों का कहना है कि नियमों को लेकर समाज में भ्रांतियां फैलाई जा रही हैं, जिन्हें दूर करने के लिए जल्द ही एक आधिकारिक तथ्य-पत्र (Fact Sheet) जारी किया जा सकता है।
इस बयान पर सवर्ण संगठनों का कहना है कि केवल मौखिक आश्वासन काफी नहीं है, नियमों में संशोधन की जरूरत है ताकि दुरुपयोग की गुंजाइश खत्म हो सके। वहीं, दलित और पिछड़े वर्ग के छात्र संगठनों ने शिक्षा मंत्री के बयान का स्वागत किया है, लेकिन नियमों को बिना किसी बदलाव के सख्ती से लागू करने की मांग की है।
आने वाले दिनों में शिक्षा मंत्रालय यूजीसी के अधिकारियों के साथ एक उच्च स्तरीय बैठक कर सकता है। इस बैठक में विरोध प्रदर्शनों के मुख्य बिंदुओं पर चर्चा होगी और यह तय किया जाएगा कि छात्रों के बीच पैदा हुए भ्रम को कैसे दूर किया जाए। यूनिवर्सिटी परिसरों में जागरूकता अभियान चलाने की भी योजना है।
बहरहाल, इस पूरे विवाद का एक कानूनी पहलू भी है। कई सवर्ण संगठनों ने इन नियमों की वैधानिकता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी शुरू कर दी है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नियमों की व्याख्या में स्पष्टता नहीं लाई गई, तो यह मामला लंबे समय तक अदालती गलियारों में खिंच सकता है, जिससे शैक्षणिक सत्र भी प्रभावित होने की आशंका है।
Updated on:
27 Jan 2026 05:08 pm
Published on:
27 Jan 2026 05:04 pm
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