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Views Vs Values: क्या Bold Talks पॉडकास्ट की दुनिया का नया शगल है?

freedom of expression vs regulation: पॉडकास्ट डिजिटल दुनिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनते जा रहे हैं। हालांकि, कई पॉडकास्ट जो कंटेंट परोस रहे हैं, वह चर्चा और बहस का मुद्दा है।

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Bold Podcast

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Bold podcasts controversy: पिछले एक हफ्ते से सोशल मीडिया के कई प्लेटफॉर्म्स पर सेक्स और इंटीमेसी को लेकर की गई बातचीत के कुछ क्लिप्स वायरल हैं। ऐसे में सोसाइटी में उन क्लिप्स को लेकर कई तरह की चर्चाएं होना लाजमी है। लोग कई तरह की फब्तियां भी कस रहे हैं तो एक वर्ग पक्ष में भी खड़ा दिख रहा है, ऐसे में इस मुद्दे पर हमने कोशिश की है कि कई स्टेकहोल्डर्स से बात कर पूरी पड़ताल की जा सके।

ऐसे बोल्ड टॉक्स वाले पॉडकास्ट पर स्त्रीरोग और आईबीएफ विशेषज्ञ डॉ. निहारिका मल्होत्रा बिनी किसी लागलपट के कहती हैं कि Bold Talk अगर एजुकेटिव है तो ठीक है पर अगर इसमें एंटरटेनमेंट का पुट डाला गया है तो ये बेहद रिस्की है। वो स्पष्ट तौर पर बताती हैं कि अवेयरनेस आपको एम्पॉवर करने के लिए है, एम्बैरेस करने के लिए नहीं, ऐसे में पॉडकास्टर और बिंदास खुली बात करने वाले इंटरव्यूअर दोनों को ये समझ होनी चाहिए।

Value खोकर Views पाना सही नहीं

उनका कहना है कि बतौर गायनोलॉजिस्ट हम सेक्सुएलिटी, स्वीकारता, प्लेजर, पेन और टैबूज पर ऐसे पॉडकास्ट्स के शुरू होने से कई साल पहले से बात करते हैं, लेकिन हमेशा सेंसेटिविटी, साइंस और कंटेक्स्ट के दायरे में रहकर। हम अपनी क्लीनिक पर ऐसे विषयों पर लोगों से बात करते हैं पर ये उनको हील करने के लिए होता है न कि उनको चौंकाने के लिए। हम बड़े सलीके से ऐसे विषयों पर शब्द चयन करते हैं क्योंकि लापरवाही से बोली गई एक भी बात लोगों में भय, भ्रान्ति और अप्राकृतिक अपेक्षा ला सकती है और खासतौर पर महिलाओं में, जो कि पहले से ही ऐसे विषयों पर बात करने में संकुचित रहती हैं। ऐसे पॉडकास्ट्स पर मेरा मत है कि अगर इससे समाज में स्टिग्मा टूटकर संवाद होता है तो ये जिम्मेदारी वाली बात है जिससे पब्लिक हेल्थ पर पॉजिटिव असर पड़ेगा पर इससे उलट जब Nuance के नाम पर Sensationalism और एजुकेशन के नाम पर Exaggeration फैलाया जाता है तो ये केयरिंग की जगह हेल्थ को लेकर रिस्क बढ़ाता है। इन ऑल मैं ये समअप करती हूं कि Views मिलना बुरा नहीं, पर Values खो कर नहीं। सेक्सुअल हेल्थ अवेयरनेस की बात सुनने वालों को सजग, सहज और ज्ञान दे ना कि उसके मन में असमंजस, शर्मिंदगी या कोई दबाव उत्पन्न करे। इसे देखने सुनने के बाद ऐसा नहीं लगना चाहिए ये EyeBalls को आकर्षित करने के लिए किया गया है। बोल्ड टॉक्स से दिमाग को सुकून मिलना चाहिए, न कि सोशल मीडिया पर ट्रेंडिंग होना इसका उद्देश्य हो।

बोल्ड पॉडकास्ट को कैसे मॉडरेट करें?

मीडिया विश्लेषक के.जी. सुरेश तपाक से इस मुद्दे पर जवाब देते हैं कि इसमें कोई दो राय नहीं है कि जैसे एक जमाने में टीवी न्यूज चैनल्स पर नाग नागिन चलता था टीआरपी बटोरने के लिए, उसी तर्ज पर अब डिजिटल पर बोल्ड टॉक्स का दौर है, जो पूर्ण तौर पर कॉमर्शियल मोटिवेटेड है। मैं तो साफ तौर पर मानता हूं कि ये एक ऐसा सेगमेंट तैयार किया गया है, जो अडल्ट है और आज के दौर में ये हर किसी को उपलब्ध है क्योंकि यूट्यूब पर कोई सेंसरशिप नहीं है। बॉलिवुड में कम से कम जब इस तरह का अडल्ट कंटेट बनता है तो एक उम्र के बाद ही उसे देखा जा सकता है पर इंटरनेट पर तो कोई सेंसरशिप ही नहीं है। इस तरह की चर्चाएं पहले भी समाज में होती थीं पर ये सब प्राइवेट कन्वर्सेशन का हिस्सा होती थीं, अब समाज में भी बदलाव हो रहा है और इसे उसका रिफ्लेक्शन भी मान सकते हैं। एक तरह से ये डिमांड और सप्लाई का मसला है। ये बात तो किसी से छिपी भी नहीं कि हमारे ही देश में सनी लियोनी गूगल सर्च में नंबर 1 रही हैं। सेक्स अवयेरनेस के नाम पर इसे हम हर उम्र के बच्चे को परोस रहे हैं, मैं चिंतित इसलिए हूं कि स्कूली बच्चे भी अब इन पॉडकास्ट की क्लिप्स देख भ्रमित हो रहे हैं, क्योंकि वे इसका दार्शनिक या यूं कहें कि मर्म पूरी तौर पर समझने के लिए अभी परिपक्व ही नहीं हुए हैं। मैं धुरंधर फिल्म का उदाहरण देकर कहता हूं कि वे एडल्ट मूवी है तो उसे बालिग लोग ही देख सकते हैं ना। 10 साल के बच्चे की तो थियेटर में एंट्री बैन है। ऐसे में इस तरह के बोल्ड पॉडकास्ट को कैसे मॉडरेट करें, ये बड़ा सवाल है। इसमें टेक्निकल चैलेंज भी ही और नैतिकता का भी सवाल है।

वायरल होने का तरीका जानते हैं!

साहित्यकार और ओटीटी सीरीज के लिए स्क्रिप्ट राइटिंग करने वालीं जयंती रंगनाथन खुले तौर पर कहती हैं कि इस प्रोसेस में दोनों ही यानी इंटरव्यूअर और पॉडकास्टर हाइलाइट में आते हैं। कई बार संदेश उस तरीके से उस वर्ग तक नहीं पहुंच पाता है जहां जाना चाहिए। पॉडकास्टर को इसकी अच्छी तरह से समझ होती है कि वायरल क्या होगा, तो वो बहुत ही सलीके से वह सब पूछता है जिसके जवाब लोग जरूर देखेंगे।

सरकार को भी अब सोचना चाहिए

साइकोलॉजिस्ट ज्योति लक्ष्मी त्रिपाठी कहती हैं कि प्राब्लम ये है कि अवेयनेस के नाम पर उतना ही कंटेंट फैल रहा है जो छोटी रील मे होता है, वो सिलेक्टिव नेरिटिव ही बनाता है। लोग ऐसी क्लिप्स को मसखरेपन से भी देखने लगते हैं। 30 सेकंड या 1 मिनट की क्लिप इस विषय पर अवेयरनेस नहीं फैलाती। तो जिस तरह की इंटेंशन से कंटेंट को प्रचारित करते हैं वे गलत हो सकता है। ऐसे पॉडकोस्ट टीनएजर्स को वन हैंड इंफोर्मेशन देंगे तो उनके मन में कई तरह के सवाल और उठते हैं और मेरा मानना है कि 18 साल में भी कोई पूरी तरह मैच्योर नहीं होता, कम से कम ऐसे विषयों पर समझ 24 साल तक ही डेवलप होती है। वैसे भी मैं इसे सेक्स एजुकेशन नहीं कहती, क्योंकि ये सब्जेक्टिव एक्सपीरियंस है। कई बार ऐसे पॉडकास्ट सॉफ्ट पॉर्न की तरह लिए जा रहे हैं। ये मेंशन करना जरूरी है कि नैतिक जिम्मेदारी के तौर पर इस एडल्ट कंटेंट वाले पॉडकास्ट को लेकर सरकार को भी सोचना चाहिए। फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन के नाम पर ये कंटेंट किशोर अवस्था के दिमाग को प्रभावित करता है, ऐसे में कोई न कोई रेगुलेटरी बॉडी बननी चाहिए।

बुराई क्या? जिसे पसंद नहीं, वो ना देखे

सामाजिक विषयों पर पकड़ रखने वालीं पूजा प्रसाद इस विषय को समझाती हुए कहती हैं कि दो चीजें हैं, एक तो पॉपुलर होने का शार्टकट पर जिस पॉडकास्ट की आजकल चर्चा हो रही है, उस गंभीर चर्चा के जरिेए टैबू विषयों पर अवेयरनेस लाने की कोशिश है, इसलिए इसे पॉपुलैरिटी के लिए कहकर खारिज नहीं कर सकते । एक्सपर्ट के तौर पर जो बात की जा रही है, वो सस्ते तरीके से पेश नहीं की गई है। हां पर ऐसे मुद्दों पर हमारे समाज में बतंगड़ बनता रहा है, इस विषय से इतर भी जब आप धर्म, स्त्रीवाद, मेल लोनलीनेस पर खुलकर बात करते हैं, तो भी आप ट्रोलर्स के निशाने पर आते हैं। कई बार तो मशहूर पेंटर्स और आर्टिस्ट की कृतियों को भी इस चर्चा से जोड़ लीजिए, कई इंडिविजुअल्स को तो वो भी डाइजेस्ट नहीं होती हैं। शायद चूंकि यहां वन टू वन बातचीत है इसलिए इतना बवाल हो रहा है, यदि ये पूरे पैनल के साथ होता तो अजीब नहीं लगता, मैं सिंपल तरीके से इसे ऐसे देखती हूं कि यदि किसी वेजिटेरियन घर में अगर कोई उबला अंडा खा ले तो हायतौबा मच जाती है, पर जिस घर में नॉनवेज खाते हैं, वहां अंडा खाना बहुत सहज तरीके से लिया जाता है । चूंकि हिंदी में ऐसे बोल्ड विषयों पर खुली बात कम होती है इसलिए ये सब वायरल हो रहा है। जागरुकता के लिए मैं ऐसी बातचीत को सही मानती हूं, पर कई बार कुछ सेकेंड्स की क्लिप्स के जरिए शायद बात समझ नहीं आती इसलिए पूरा रेफरेंस समझना जरूरी है। ये नजरिए का खेल है, किसको कितना एक्पोजर डाइजेस्ट होता है, ये हर शख्स पर निर्भर करता है, जिसको ये ज्यादा अच्छा नहीं लगता है, वो न देखें, अवॉइड किया जा सकता है, ये किसी तरह मैंडेटिरी तो नहीं है।