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Explainer: पॉलीग्राफी टेस्ट क्या है और कैसे होता है? जानिए इसकी शुरुआत और परिणाम

पॉलीग्राफ परीक्षण इस धारणा पर आधारित है कि जब कोई व्यक्ति झूठ बोल रहा होता है तो शारीरिक प्रतिक्रियाएं (दिल की धड़कन, सांस लेने में बदलाव, पसीना आना आदि) शुरू हो जाती हैं।

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What is polygraph test : संसद की सुरक्षा में सेंध लगाने के आरोप में गिरफ्तार लोगों की पॉलीग्राफ जांच की अनुमति दिल्ली सरकार ने अदालत से मांगी है। लाई डिटेक्टर मशीन, जिसे पॉलीग्राफ मशीन के नाम से भी जाना जाता है। बीते काफी समय यह पता लगाने के लिए इस इस्तेमाल से यह पता लगाया जाता है कि कोई व्यक्ति सच बोल रहा है या झूठ। पॉलीग्राफ टेस्ट कैसे होता है, जांच में कैसे मदद करता है और इसका कानूनी पहलू क्या है...एक नजर।


कैसे काम करता है यह टेस्ट

पॉलीग्राफ परीक्षण इस धारणा पर आधारित है कि जब कोई व्यक्ति झूठ बोल रहा होता है तो शारीरिक प्रतिक्रियाएं (दिल की धड़कन, सांस लेने में बदलाव, पसीना आना आदि) शुरू हो जाती हैं। पूछताछ के दौरान कार्डियो-कफ या सेंसेटिव इलेक्ट्रोड जैसे उपकरण व्यक्ति से जुड़े होते हैं और रक्तचाप, नाड़ी, रक्त प्रवाह आदि को मापा जाता है। प्रत्येक प्रतिक्रिया को एक संख्यात्मक मान दिया जाता है कि क्या व्यक्ति सच बोल रहा है, धोखा दे रहा है, या वह अनिश्चित है।

कैसे हुई इस टेस्ट की शुरुआत

ऐसा कहा जाता है कि इस तरह का परीक्षण पहली बार 19वीं शताब्दी में इतालवी अपराधविज्ञानी सेसारे लोम्ब्रोसो द्वारा किया गया था, जिन्होंने पूछताछ के दौरान आपराधिक संदिग्धों के रक्तचाप में परिवर्तन को मापने के लिए एक मशीन का उपयोग किया था। इसी तरह के उपकरण बाद में 1914 में अमेरिकी मनोवैज्ञानिक विलियम मैरस्ट्रॉन और 1921 में कैलिफोर्निया पुलिस अधिकारी जॉन लार्सन द्वारा बनाए गए थे।

क्या ऐसे टेस्ट सटीक हैं?

न तो पॉलीग्राफ परीक्षण और न ही नार्को टेस्ट वैज्ञानिक रूप से 100% सफल साबित हुए हैं। चिकित्सा क्षेत्र में भी यह विवादास्पद बने हुए हैं। हालांकि, जांच एजेंसियों इन्हें प्राथमिकता देती है क्योंकि संदिग्धों से सच्चाई उगलवाने के लिए इन्हें 'थर्ड डिग्री' के 'नरम विकल्प' के रूप में देखा जाता है।

परिणाम माने जाते हैं साक्ष्य?

टेस्ट के परिणामों को 'स्वीकारोक्ति' नहीं माना जा सकता। हालांकि, इस तरह के टेस्ट की मदद से बाद में खोजी गई किसी भी जानकारी या सामग्री को सबूत के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने 'सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य' (2010) मामले में कहा था कि यदि कोई आरोपी टेस्ट के दौरान हत्या के हथियार के स्थान का खुलासा करता है और पुलिस को बाद में उस स्थान पर हथियार मिल जाता है, तो आरोपी का बयान सबूत नहीं होगा लेकिन हथियार होगा।

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किसी का भी किया जा सकता है टेस्ट?

कुछ शर्तों को पूरा करना आवश्यक है। 2010 के मामले में भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन और न्यायमूर्ति आरवी रवींद्रन और जेएम पांचाल की सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने फैसला सुनाया कि 'आरोपी की सहमति के आधार को छोड़कर' कोई भी झूठ पकड़ने वाला परीक्षण नहीं किया जाना चाहिए। इसमें कहा गया है कि 2000 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा प्रकाशित 'अभियुक्त पर पॉलीग्राफ टेस्ट करने के लिए दिशानिर्देश' का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि व्यक्ति की सहमति न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज की जानी चाहिए।

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