
लोकसभा (Photo - ANI)
विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक (FCRA Amendment Bill) 2026 को लेकर बढ़ती आपत्तियों के बीच केंद्र सरकार इसे संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को भेज सकती है। उच्च स्तरीय सरकारी सूत्रों के अनुसार सरकार इस पर हर प्रकार की शंकाओं को दूर करने और उनका निस्तारण करने के लिए तैयार है। सूत्रों के अनुसार बिल के प्रावधान किसी के भी विरोध में नहीं है बल्कि संशोधनों का उद्देश्य विदेशी अंशदान व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना है।
सूत्रों ने स्पष्ट किया है कि प्रस्तावित कानून विदेशी फंडिंग पर प्रतिबंध नहीं लगाता। इसका उद्देश्य विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम, 2010 में संशोधन कर गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) और विदेशी फंडिंग पर कड़ी निगरानी सुनिश्चित करना है। फिर भी इसे व्यापक विचार-विमर्श के लिए जेपीसी गठित कर उसे सौपें जाने के विकल्प पर मंथन चल रहा है। उल्लेखनीय है कि संसद के मानसून सत्र की शुरुआत से ही सरकार की ओर से लोकसभा में 25 मार्च को पेश विधेयक को इस सत्र में पारित करवाने के संकेत दिए गए हैं। संसद के दोनों सदनों में हंगामे के चलते सदन की कार्यवाही ठप पड़ी है।
विपक्ष का आरोप है कि यह विधेयक केंद्र सरकार को व्यापक शक्तियाँ दे सकता है जिससे अल्पसंख्यक संगठनों, विशेष तौर पर ईसाई एनजीओ और शैक्षणिक-चिकित्सकीय संस्थानों को प्रभावित कर सकते हैं। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके और वाम दल विधेयक को पूरी तरह वापस लेने की मांग कर रहे हैं। मिज़ोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा (Lalduhoma) और चर्च संगठनों ने गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) से मुलाकात कर जेपीसी जांच की मांग की थी। तमिलनाडु विधानसभा ने मंगलवार को प्रस्ताव पारित कर विधेयक को मौजूदा स्वरूप में वापस लेने और राज्यों तथा हितधारकों से व्यापक चर्चा की मांग की।
सरकार का कहना है कि विधेयक किसी समुदाय के खिलाफ नहीं है, बल्कि पारदर्शिता बढ़ाने और विदेशी फंडिंग के दुरुपयोग को रोकने के लिए है। इसमें सज़ा की अधिकतम अवधि 5 साल से घटाकर 1 साल करने का प्रावधान भी है। संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त को समाप्त हो रहा है, इसलिए विधेयक इस सत्र में पारित होना संभव नहीं लगता। जेपीसी में भेजने से विस्तृत चर्चा और हितधारकों से परामर्श का मौका मिलेगा।
Updated on:
12 Aug 2026 04:03 am
Published on:
12 Aug 2026 04:01 am
