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अब AI की मदद से मिलेगा पिता बनने का सुख, वैज्ञानिकों ने विकसित की स्टार तकनीक

AI Fertility Technology: कोलंबिया यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने प्रजनन अक्षमता यानी इनफर्टिलिटी से जूझ रहे पुरुषों के लिए उम्मीद की एक नई किरण जगाई है।

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भारत

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Saurabh Mall

May 03, 2026

Male Infertility Solution

इनफर्टिलिटी से जूझ रहे पुरुषों के लिए गुड न्यूज (AI जनरेटेड इमेज)

Male Infertility Solution: चिकित्सा विज्ञान और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) के तालमेल ने प्रजनन अक्षमता यानी इनफर्टिलिटी से जूझ रहे पुरुषों के लिए उम्मीद की एक नई किरण जगाई है। कोलंबिया यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने स्टार यानी स्पर्म ट्रैक एंड रिकवरी नाम की एआइ तकनीक विकसित की है। यह तकनीक उन पुरुषों को भी पिता बनने में मदद कर सकती है जिन्हें मेडिकल जांच में एजोस्पर्मिया यानी शुक्राणुहीनता के कारण पूरी तरह असमर्थ घोषित कर दिया गया था। यह तकनीक छिपे हुए शुक्राणुओं को भी ढूंढ लेती है। इस सफलता के बाद जेनेटिक विकारों के शिकार पुरुषों के लिए भी पिता बनना मुमकिन हो गया है।

कैसे काम करती है यह तकनीक?

कोलंबिया यूनिवर्सिटी फर्टिलिटी सेंटर के निदेशक जेव विलियम्स के अनुसार, आमतौर पर एक स्वस्थ पुरुष के एक मिलीलीटर स्पर्म में करोड़ों शुक्राणु होते हैं। लेकिन एजोस्पर्मिया से पीड़ित पुरुषों में यह संख्या न के बराबर होती है। स्टार तकनीक एआइ का उपयोग वैसे ही करता है जैसे वैज्ञानिक अंतरिक्ष में धुंधले तारों को खोजने के लिए करते हैं। यह सिस्टम एक सेकंड में 300 छवियों को स्कैन करता है और गंदगी या तरल मलबे के बीच छिपे एक अकेले शुक्राणु को भी पहचान लेता है। जैसे ही एआइ किसी शुक्राणु को पहचानता है, एक रोबोटिक सिस्टम मिलीसेकंड के भीतर उसे सुरक्षित बाहर निकाल लेता है।

गंभीर जेनेटिक मामलों में भी प्रभावी

इस तकनीक का सफल परीक्षण एक क्लिनफेल्टर सिंड्रोम से पीड़ित व्यक्ति पर हुआ। इस जेनेटिक बीमारी में पुरुष के शरीर में एक अतिरिक्त एक्स क्रोमोसोम होता है, जिससे शुक्राणु नहीं बनते। डॉक्टरों को उनके पिता बनने की सिर्फ 20% उम्मीद दी थी। लेकिन स्टार तकनीक ने उनके सैंपल से 8 शुक्राणु खोज निकाले, जिनसे अब उनकी पत्नी प्रेग्नेंट हैं और जुलाई में अपने बच्चे का स्वागत करेंगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि एआइ शुक्राणु खोजने के अलावा आइवीएफ के दौरान बेहतर भ्रूण चुनने और हार्मोन की सही खुराक तय करने में भी मदद कर सकता है। हालांकि, वैज्ञानिक अभी और बड़े स्तर पर इसका क्लीनिकल ट्रायल कर रहे हैं।