30 जून 2026,

मंगलवार

Patrika Logo
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

सात फेरे नहीं लेने पर हिंदू विवाह अवैध, गुजरात हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, जज बोले- सर्टिफिकेट का कोई मतलब नहीं

Gujarat High Court: गुजरात हाई कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि हिंदू विवाह में सप्तपदी यानी सात फेरे अनिवार्य हैं। केवल विवाह प्रमाणपत्र से शादी वैध नहीं मानी जाएगी। आवश्यक धार्मिक रस्में पूरी होनी चाहिए।
2 min read
Google source verification
Gujarat High Court Hindu Marriage

हिंदू विवाह पर गुजरात हाई कोर्ट का बड़ा फैसला ( इमेज सोर्स: आईएएनएस)

Gujarat High Court Hindu Marriage: क्या सिर्फ मैरिज सर्टिफिकेट होने से कोई हिंदू विवाह कानूनी रूप से वैध माना जा सकता है? गुजरात हाई कोर्ट ने इस सवाल पर फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा कि अगर हिंदू विवाह की जरूरी धार्मिक रस्में...खासकर सप्तपदी यानी सात फेरे नहीं हुए हैं तो केवल रजिस्ट्रेशन या मैरिज सर्टिफिकेट से शादी वैध नहीं हो जाती।

सात फेरे के बिना शादी वैध नहीं

गुजरात हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने कहा कि 'हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 7' के तहत शादी की जरूरी रस्में पूरी होना अनिवार्य है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण रस्म 'सप्तपदी' मानी जाती है। यानी अग्नि को साक्षी मानकर वर-वधू का सात फेरे लेना। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 8 के तहत होने वाला मैरिज रजिस्ट्रेशन केवल पहले से वैध तरीके से हुई शादी का रिकॉर्ड होता है। यह किसी ऐसी शादी को वैध नहीं बना सकता जिसमें जरूरी धार्मिक रस्में कभी हुई ही नहीं हों।

जस्टिस इलेश जे. वोरा और जस्टिस आर.टी. वच्छानी ने कहा कि यदि शादी ही कानून के मुताबिक नहीं हुई तो उसके आधार पर जारी किया गया मैरिज सर्टिफिकेट भी कोई कानूनी अधिकार नहीं रखता। ऐसे में दोनों पक्षों को पति-पत्नी का कानूनी दर्जा नहीं मिल सकता।

पत्नी के बयान ने बदला पूरा मामला

दरअसल, ये पूरा मामला एक भारतीय मूल के ब्रिटेन निवासी व्यक्ति से जुड़ा है। यानी कि वह यूके में रहता है। उसने कोर्ट में दावा किया कि उसकी कभी विधिवत शादी नहीं हुई। उसके अनुसार, न कोई धार्मिक रस्म हुई और न ही दोनों कभी पति-पत्नी की तरह साथ रहे। उसने यह भी आरोप लगाया कि शादी से जुड़े दस्तावेजों पर उसके हस्ताक्षर धोखे से कराए गए।

मामले की सुनवाई के दौरान पत्नी ने अपने लिखित जवाब में स्वीकार किया कि शादी के समय कोई धार्मिक रस्म या परंपरा पूरी नहीं हुई थी। साथ ही उसने यह भी माना कि दोनों के बीच पति-पत्नी जैसा संबंध नहीं था।

ऐसे में हाई कोर्ट ने कहा कि जब एक पक्ष खुद यह स्वीकार कर रहा है कि विवाह की जरूरी रस्में नहीं हुईं, तो ऐसे मामले में लंबा ट्रायल कराने की जरूरत नहीं है।

इसी आधार पर हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। जिसमें पूरे ट्रायल की बात कही गई थी। अदालत ने कथित शादी को शुरू से ही अमान्य घोषित कर दिया। साथ ही अपीलकर्ता को संबंधित अधिकारी के सामने मैरिज रजिस्ट्रेशन रद्द कराने की प्रक्रिया अपनाने की अनुमति भी दे दी।

सिर्फ शादी का रजिस्ट्रेशन ही कानूनी मान्यता नहीं

कोर्ट ने अपने फैसले में एक बार फिर स्पष्ट कर दिया कि हिंदू विवाह में सप्तपदी केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि कानूनी रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। अगर यह अनिवार्य रस्म पूरी नहीं होती, तो सिर्फ मैरिज सर्टिफिकेट के आधार पर शादी को वैध नहीं माना जा सकता। ऐसे में कोर्ट का यह फैसला उन लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण है। जो मानते हैं कि सिर्फ शादी का रजिस्ट्रेशन ही कानूनी मान्यता के लिए काफी है।