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हिमाचल: CM सुखविंदर सिंह सुक्खू की राह नहीं आसान, सामने हैं ये बड़ी चुनौतियां

सुखविंदर सिंह सुक्खू हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए है, लेकिन उनके सामने चुनौतियां बढ़ने वाली हैं। सरकार से लेकर संगठन तक में उन्हें कई दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। पहली बाधा मंत्रिमंडल का गठन होगी। उन्हें पार्टी में प्रतिस्पर्धी समूहों के दबाव से निपटना होगा। महत्वाकांक्षी चुनावी वादों को पूरा करने सहित कई बड़ी चुनौतियां है।

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Sukhwinder Singh Sukhu

Sukhwinder Singh Sukhu

हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव परिणाम में कांग्रेस को 68 सीटों में 40 सीटों पर जीत मिली थी। कांग्रेस पार्टी ने बड़ा फेरबदल करते हुए सुखविंदर सिंह सुक्खू को मुख्यमंत्री बनाया है। वहीं मुकेश अग्निहोत्री को राज्य का डिप्टी सीएम की शपथ ली है। सीएम पद की रेस में कइयों के नाम आगे चल रहे थे, लेकिन सुक्खू को अगले मुख्यमंत्री के रूप में चुना गया। हिमाचल में नए नेतृत्व को लेकर निर्णायक कदम उठाने के बावजूद राज्य में कांग्रेस पार्टी के लिए अभी काम खत्म नहीं हुआ है। प्रदेश में कांग्रेस सरकार तो बन गई, लेकिन अब सुखविंदर सुक्खू के सामने गुटबाजी को दूर रखने और महत्वाकांक्षी चुनावी वादों को पूरा करने सहित कई बड़ी चुनौतियां है।


हिमाचल प्रदेश में सुखविंदर सिंह सुक्खू के सामने सभी 40 विधायकों को एकजुट रखने की बड़ी चुनौती होगी। प्रतिभा सिंह भी खुद को सीएम की रेस में होने का संकेत देती रही थीं। उनको ना तो सीएम की कुर्सी मिली ना ही उनके बेटे विक्रमादित्य को डिप्टी सीएम बनाया गया। कैबिनेट में जरूर कोई बड़ा पद दिया जा सकता है। यदि आने वाले सालों में प्रतिभा सिंह के गुट के कुछ विधायक विवाद पैदा करते हैं तो सुक्खू सरकार के लिए परेशानी का सबब हो सकता है। बता दें कि छत्तीसगढ़, राजस्थान जैसे राज्यों में मुख्यमंत्रियों और अन्य नेताओं के बीच टकराव देखने को मिल चुका है।

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सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू के सामने कांग्रेस के किए गए वादों को पूरा भी एक बड़ी चुनौती है। अपने घोषणा पत्र को कांग्रेस ने प्रतिज्ञा पत्र बताते हुए 300 यूनिट फ्री बिजली, पुरानी पेंशन बहाली सहित दस गारंटियां दी थीं। युवाओं को पांच लाख रोजगार, स्टार्टअप के लिए करोड़ों रुपये का फंड, हर गांव में मुफ्त इलाज समेत कई वादे किए गए थे। इनमें से ओल्ड पेंशन स्कीम की बहाली करना बड़ा वादा माना गया था। अब सीएम सुक्खू पर इन वादों को पूरा करने की भी चुनौती होगी।

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हिमाचल की वित्तीय स्थिति पहले से ही खराब चल रही है। भारतीय नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य सरकार ने कर्ज ली गई धनराशि का 74.11 प्रतिशत पिछले कर्ज (मूलधन) के पुनर्भुगतान के लिए और 25.89 प्रतिशत पूंजीगत व्यय के लिए उपयोग किया है। राज्य विधानसभा में बीते साल पेश की गई कैग की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 39 प्रतिशत ऋण (लगभग 25,000 करोड़ रुपये) अगले दो से पांच सालों म में चुकाना होगा।


हिमाचल के लिए 2022-23 में राजस्व घाटा 3,903.49 करोड़ रुपये था। कांग्रेस के राज में राजकोषीय घाटा 9,602.36 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। पार्टी को राज्य की सत्ता में लाने में मदद करने वाला सबसे बड़े वादे पुरानी पेंशन योजना की बहाली भी एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। बीजेपी के राज्य में सत्ता गंवाने के बावजूद पीएम मोदी ने आश्वासन दिया है कि हिमाचल प्रदेश के विकास में कोई बाधा नहीं आएगी।

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