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एआई नेस्तम और अमीरा से बदली सरकारी स्कूलों की तस्वीर, गैजेट्स ने दिव्यांगों को दी नई उम्मीद

एआई नेस्तम और अमीरा जैसे शिक्षा मॉडल से लेकर पैरा स्पीक, वेवी और आरोग्य एआई एप जैसे गैजेट्स तक, एआई अब सीधे आम लोगों की जिंदगी बदल रहा है।

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भारत

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Himadri Joshi

Feb 18, 2026

India AI Impact Summit 2026

इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 (फोटो- PIB India एक्स पोस्ट)

देश में सरकारी स्कूलों की पढ़ाई को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदल रही है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में शुरू हुआ एक खास प्रयोग और दिल्ली के स्कूलों में अपनाई गई नई तकनीक ने दिखा दिया है कि एआई सिर्फ बड़ी कंपनियों के लिए नहीं, बल्कि बच्चों और आम लोगों के लिए भी है। खास बात यह है कि इन पहलों ने कम लागत में बड़ा असर दिखाया है और अब ये मॉडल देशभर के लिए मिसाल बन रहे हैं।

एआई नेस्तम से बच्चे सिखेंगे कोडिंग और मशीन लर्निंग

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के सरकारी स्कूलों में ‘एआई नेस्तम’ नाम का प्रोग्राम कक्षा 3 से 9 तक के छात्रों के लिए लागू किया गया। इस प्रोग्राम के जरिए बच्चों को एआई, कोडिंग और मशीन लर्निंग जैसे कॉन्सेप्ट बहुत आसान तरीके से सिखाए गए। सालाना खर्च सिर्फ 500 रुपये प्रति छात्र आया, जो किसी भी एडटेक मॉडल के मुकाबले बेहद कम है। सबसे दिलचस्प बदलाव यह रहा कि जिन बच्चों को पहले गणित से डर लगता था, वही अब एल्गोरिदम और लॉजिक की बातें कर रहे हैं। टीचर्स का कहना है कि बच्चों में कॉन्फिडेंस बढ़ा है और वे टेक्नोलॉजी को लेकर ज्यादा उत्साहित दिख रहे हैं।

उच्चारण को ठीक करेगा एआई ‘अमीरा’

दिल्ली नगर निगम के स्कूलों में अक्सर एक शिक्षक पर 40 से 50 बच्चों की जिम्मेदारी होती है। ऐसे में हर बच्चे का उच्चारण ठीक कर पाना मुश्किल था। इसी चुनौती को देखते हुए एआई आधारित रीडिंग असिस्टेंट ‘अमीरा’ को लाया गया। जब बच्चा जोर से पढ़ता है, तो एआई उसकी आवाज सुनती है। जहां बच्चा अटकता है या गलत उच्चारण करता है, अमीरा वहीं टोकती है और सही तरीका बताती है। सिर्फ 5 महीने के पायलट प्रोजेक्ट में बच्चों की पढ़ने की क्षमता में 10 महीने के बराबर सुधार दर्ज किया गया। इससे साफ है कि एआई टीचर की मदद कर सकता है, उसकी जगह नहीं लेता।

सिर्फ 2000 रुपये में बोलने की परेशानी से छुटकारा

नई दिल्ली में आयोजित इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 के दूसरे दिन युवा एआई यूथ चैलेंज में कई अनोखे समाधान सामने आए। यहां स्कूली छात्र प्रनेत खेतान द्वारा बनाया गया ‘पैरा स्पीक’ नाम का डिवाइस पेश किया गया, जो स्ट्रोक, लकवा, पार्किंसंस, दिमागी चोट या बढ़ती उम्र के कारण बोलने में दिक्कत झेल रहे लोगों की आवाज बनता है। यह गले में पहना जाने वाला डिवाइस अस्पष्ट शब्दों को पहचानकर सही शब्दों में दोहराता है। अभी तक ऐसे डिवाइस विदेशी अंग्रेजी स्टाइल पर आधारित थे, लेकिन यह भारतीय जरूरतों के मुताबिक बनाया गया है। प्रनेत इसे जनवरी 2027 तक करीब 2000 रुपये में उपलब्ध कराने की योजना पर काम कर रहे हैं।

ब्रेल लिपि पढ़ने में मदद करेगा ‘वेवी’

दृष्टिहीनों के लिए आदित्य भंडारी और मान्या चतुर्वेदी ने ‘वेवी’ नाम के खास दस्ताने बनाए हैं। ये ब्रेल लिपि को पढ़ने में मदद करते हैं। दस्तानों में लगे सेंसर उंगलियों की हरकत को पहचानते हैं और एआई उसे शब्दों में बदलकर सुनाता है। देश में 1.5 करोड़ दृष्टिहीन लोगों के लिए यह बड़ी राहत बन सकता है। वहीं अनिकेत कार्खेलिकर और निखिल हेगड़े ने ‘आरोग्य एआई एप’ तैयार किया है। देश में 800 लोगों पर एक डॉक्टर और 3000 लोगों पर एक विशेषज्ञ डॉक्टर है। ऐसे में यह एप जूनियर डॉक्टरों को मरीज से स्थानीय भाषा में बात करने, मेडिकल रिकॉर्ड समझने और विशेषज्ञ को बेहतर सुझाव देने में मदद करता है। आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन में दर्ज 80 करोड़ हेल्थ आईडी, 67 करोड़ मेडिकल रिकॉर्ड और 4.18 लाख संस्थानों का डेटा इस दिशा में बड़ा अवसर दे रहा है।