
लिथियम (Representational Photo)
भारत (India) ने भविष्य के ईंधन यानी लिथियम (Lithium) के लिए विदेशों और विशेषकर चीन पर अपनी आयात निर्भरता को कम करने का एक बेहद अनोखा और क्रांतिकारी उपाय निकाल लिया है। अब देश में पुरानी और बेकार हो चुकी बैट्रियों से लिथियम निकालने के लिए पारंपरिक रसायनों का नहीं, बल्कि एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI - Artificial Intelligence) से डिज़ाइन किए गए बैक्टीरिया यानी माइक्रोब्स का इस्तेमाल किया जाएगा। ये बैक्टीरिया पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना बैट्री के कचरे से लिथियम सोख लेंगे। बेंगलूरु की एट्रिया यूनिवर्सिटी इस तकनीक को मिनीमाइन्स क्लीनटेक सॉल्यूशंस स्टार्टअप के साथ मिलकर विकसित कर रही है।
लिथियम को 'व्हाइट गोल्ड' भी कहा जाता है। स्मार्टफोन से लेकर इलेक्ट्रिक कारों तक, कई अहम चीज़ों में लिथियम बैट्री का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में भारत का नया उपाय बेहद उपयोगी साबित हो सकता है।
पारंपरिक रीसाइक्लिंग में इस्तेमाल होने वाले हैवी केमिकल्स से बैट्रियों के कई मूल्यवान तत्व नष्ट हो जाते हैं। समस्या को सुलझाने के लिए वैज्ञानिक सिंथेटिक बायोलॉजी और एआई की जुगलबंदी कर रहे हैं। पारंपरिक जैविक प्रयोगों में सही बैक्टीरिया की पहचान करने में बरसों लग जाते थे। अब एआई चुटकियों में ऐसे 'सुपर माइक्रोब्स' की पहचान और उन्हें डिज़ाइन करने में मदद करेगा, जो बैट्री से लिथियम को अलग कर सकें।
भारत के लिए यह तकनीक गेम-चेंजर हो सकती है। भारत अभी लिथियम आयात के लिए विदेशों पर निर्भर है। खनन के नए प्रोजेक्ट धरातल पर उतारने में सालों लग जाते हैं। ऐसे में पुरानी बैट्रियों को रीसाइकिल करना सबसे तेज़ और सस्ता रास्ता है। यह अनूठा प्रोजेक्ट भारत सरकार की बायोटेक्नोलॉजी आधारित विनिर्माण को बढ़ावा देने वाली नीति 'बायो ई-3' और 'नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन' के उद्देश्यों के साथ सीधे तौर पर मेल खाता है।
शुरुआती चरण में लिथियम आयरन फॉस्फेट (एलएफपी) बैट्रियों को टारगेट किया जाएगा। लिथियम आयरन फॉस्फेट बैट्रियों का इस्तेमाल इलेक्ट्रिक वाहनों और ऊर्जा भंडारण प्रणालियों में सबसे ज़्यादा होता है। इस तकनीक से न सिर्फ शुद्ध लिथियम मिलेगा, बल्कि बहुमूल्य 'हाई-ग्रेड आयरन फॉस्फेट' भी सुरक्षित बच जाएगा, जिससे काफी फायदा होगा।
Updated on:
21 Jul 2026 02:26 am
Published on:
21 Jul 2026 02:26 am
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