
सुप्रीम कोर्ट की साख को लेकर बहस काफी पुरानी है।
सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा जगत में काम करने वाले तीन विशेषज्ञों पर ताउम्र पाबंदी लगा दी। ये हैं प्रोफेसर मिशेल डेनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्न कुमार। कोर्ट के मुताबिक इन्हें भारतीय न्यायपालिका के बारे में या तो पर्याप्त जानकारी नहीं है या इन्होंने जान-बूझ कर आठवीं क्लास के बच्चों की नजर में न्यायपालिका की छवि खराब करने के लिए तथ्यों को गलत तरीके से पेश किया। या फिर, ये दोनों बातें भी हो सकती हैं। कोर्ट ने कहा कि सरकारी पैसा पाने वाला देश का कोई भी संस्थान भविष्य में इनसे काम नहीं करवाए।
प्रोफेससर डेनिनो एनसीईआरटी की उस टेक्स्टबुक डेवलपमेंट टीम (टीडीटी) के प्रमुख थे, जिसने आठवीं की सोशल साइंस की किताब में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ नाम से एक टाइटल प्रकाशित किया था। सुपर्णा और आलोक इस टीम के सदस्य थे। अदालत ने इस बात का स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई की और इसे न्यायपालिका की छवि खराब बताने वाली हरकत बता कर सख्त आदेश सुनाया।
इससे पहले एनसीईआरटी ने किताब वापस ले ली और माफी भी मांग ली थी। लेकिन, अदालत ने इसे नाकाफी माना।
बता दें कि टीडीटी में शामिल आलोक कानून के जानकार भी हैं। उन्होंने 2008 में कानून की डिग्री ली। वह विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी के को-फाउंडर भी रहे हैं। वह अपने कई लेखों में न्यायपालिका की खामियों की बारे में बता चुके हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किताब में लिखीं बातों से न्यायपालिका की छवि खराब होती है। लेकिन, उसके फैसले से एक सवाल खड़ा हुआ है कि इससे न्यायपालिका की साख बची है, बढ़ी है या और कम हुई है?
एक महीना भी नहीं हुआ है। 17 फरवरी 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले को खारिज कर दिया। हाई कोर्ट के जज ने 17 फरवरी 2025 को दिए फैसले में कहा था कि किसी महिला की छाती दबोचना और सलवार का नाड़ा खोलना रेप की कोशिश के दायरे में नहीं आता, बल्कि रेप करने की तैयारी माना जाएगा। इस दलील के आधार पर आरोपी पर लगाए गए आरोप की गंभीरता कम कर दी गई थे।
एक साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को दोषपूर्ण बताते हुए खारिज किया और आरोपी पर बरती गई नरमी भी खत्म की। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा कि यह फैसला देने वाले हाई कोर्ट के जज को आगे से कोई केस नहीं दिया जाए। तो किताब के मामले में संबंधित विशेषज्ञों पर बैन लगाने के आदेश (जो एक महीने से भी कम समय में आ गया) देकर क्या न्यायपालिका ने खुद अपने ऊपर पक्षपात का आरोप लगाने का मौका नहीं दे दिया? इससे न्यायपालिका की साख मजबूत होगी या कमजोर?
गुजरात में 20 रुपया घूस लेने के आरोप में एक सिपाही 30 साल जेल में रहा। 4 फरवरी, 2026 को हाई कोर्ट ने उसे निर्दोष करार दिया। उसे दोषी ठहराकर सजा देने वाली निचली अदालत के जज पर यहां भी किसी कार्रवाई का आदेश नहीं दिया गया।
64 साल की उम्र में दोषमुक्त होने के अगले ही दिन सिपाही की मौत हो गई। विदेशी मीडिया में भी हेडलाइन बनी। गल्फ न्यूज ने लिखा, 'देरी से न्याय मिलने, और कभी-कभी नहीं भी मिलने, का यह अकेला मामला नहीं है। सालों से जेल में बंद अनेक कैदियों को इंसाफ का इंतजार है। कई तो बिना गुनाह साबित हुए ही लंबे समय से जेलों में बंद हैं। भारतीय जेलों और अदालतों की रिपोर्टिंग के क्रम में यह प्रमुखता से उठाया जाने वाला मुद्दा रहा है।'
उदाहरण गिनाए जाएं तो लिस्ट खत्म ही नहीं होगी। यही नहीं, न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की बातें भी खूब होती हैं। यह अलग बात है कि दबी जुबान में होती हैं। दस साल में जजों के खिलाफ 8600 से ज्यादा शिकायतें आ चुकी हैं और एक सर्वे में 77 फीसदी लोगों ने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की बात मानी थी।
तो एनसीईआरटी किताब के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला सच से मुंह चुराने जैसा नहीं है? और मुंह चुराने से सच छुप जाएगा? छुप भी गया तो इससे छवि मजबूत हो जाएगी? हो भी जाए तो क्या इस तरह छवि मजबूत करने से न्यायपालिका लोगों को इंसाफ देने का मूल काम कर पाएगा? और नहीं तो जनता का उस पर भरोसा रह जाएगा? इन सवालों पर सुप्रीम कोर्ट सोचेगा?
| न्यायालय | लंबित मामले (Backlog) | जजों के खाली पद (Vacancies) | कुल स्वीकृत पद (Judges) |
| सुप्रीम कोर्ट (SC) | 92,002 | 0 | 34 |
| उच्च न्यायालय (HC) | 63,63,400 | 297 | 1,114 |
| निचली और जिला अदालतें | 4,84,57,300 | 4,855 | 25,500+ |
| कुल (अनुमानित) | 5,49,12,700+ | 5,152+ | 26,648+ |
Updated on:
12 Mar 2026 04:37 pm
Published on:
12 Mar 2026 02:53 pm
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