
दुनिया की सबसे बड़ी पॉलिटिकल पार्टी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने जिस तरह अपने नए राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष के तौर पर नितिन नबीन और देश के सबसे बड़े सूबे यूपी के प्रदेशाध्यक्ष के तौर पर पंकज चौधरी के नाम की घोषणा की, उससे आकलन यही लगाया जा रहा है कि अब 2014 के एक दशक बाद फिर से एक नई बीजेपी की संरचना होगी। उल्लेखनीय है कि नितिन नबीन की उम्र अभी 45 साल है यानी 2029 में भी वो पचास पार भी नहीं होंगे। बस ये वो आंकड़ा है जिसके आधार पर ये माना जा रहा है कि बीजेपी की नई टीम, जिसके कंधों पर 2029 की जिम्मेदारी होगी, वो इसके इर्द-गिर्द ही होगी। इस विषय पर दशकों से भारतीय राजनीति को समझ रहे कई वरिष्ठ राजनैतिक समीक्षकों का क्या दृष्टिकोण है, आइए ये भी जानते हैं:
पॉलिटिकल कॉमेंटेटर अभिज्ञान प्रकाश कहते हैं कि बीजेपी के बारे में एक पुरानी कहावत है - 'बैठक, भोजन और विश्राम, बीजेपी के तीन ही काम', लेकिन अगर इतिहास पर नजर डालें तो सच्चाई ये है कि इस कहावत के विपरीत पार्टी ने समय, काल और परिस्थिति के मद्देनजर कई बार बड़े और परिवर्तनकारी निर्णय लिए हैं। सबसे बड़ा राजनैतिक परिवर्तन का निर्णय तब लिया जब बाबरी विध्वंस के वक्त लाल कृष्ण आडवाणी को पार्टी ने अपना सबसे बड़ा चेहरा बनाया, पर उस वक्त उत्तर प्रदेश बीजेपी के प्रमुख चेहरे कल्याण सिंह 1993 के चुनाव में बीजेपी की सरकार नहीं ला पाए बल्कि यूपी में जातीय समीकरणों को साथ लाकर मुलायम सिंह यादव व मायवती ने सरकार बनाई। बीजेपी के लिए संदेश साफ था कि अभी सिर्फ हिंदुत्व के आधार पर उनकी सरकार नहीं बन सकती और उन्हें गठबंधन की तरफ सोचना होगा। इसीलिए जब 1995 का साल आया तो बीजेपी ने सबसे बड़ा परिवर्तन दिखाते हुए अपने उदारवादी चेहरे अटल बिहारी बाजपेयी को पीएम चेहरा बनाया, न कि राम मंदिर आंदोलन के हीरो लाल कृष्ण आडवाणी को। उसके बाद अटलजी ने संसद के अपने लोकप्रिय भाषण के जरिए बताया कि बीजेपी को अछूत पार्टी क्यों माना जाता है। ये सबसे बड़ा परिवर्तन का फैसला था, इसके पीछे गहरे कारण थे।
मेरा स्पष्ट तौर पर मानना है कि हर बार मूड ऑफ द नेशन की स्टडी के बाद परिवर्तन करना बीजेपी की प्रथा है, इसलिए मैं इसे कोई नई बात नहीं मानता। 2013 में मोदी को प्रधानमंत्री का चेहरा बनाना और फिर पहली बार बीजेपी की बहुमत की सरकार का आना भी इसी का प्रमाण है। मैंने अपनी किताब 'लखनऊ टू लुटियंस' में एक और बड़े बदलाव का जिक्र किया है कि कैसे बीजेपी ने गुजरात के एक नेता को पार्टी महासचिव बनाकर यूपी का इंचार्ज बनाया, वो थे अमित शाह। उस वक्त राजनीति के पुरोधाओं ने कहा कि ये क्या कर पाएंगे, इनको क्या समझ आएगा यूपी में। पर इस बड़े फैसले का बड़ा प्रभाव उत्तर प्रदेश की राजनीति में देखने को मिला, दस साल तक बीजेपी का यूपी में जलवा रहा। 2014, 2017, 2019, 2022 की जीत इसका प्रमाण है, यहां याद रखने वाली बात ये है कि 2017 में योगी आदित्यनाथ की छवि आज जैसी नहीं थी और न ही वो चुनाव उन्हें सीएम प्रोजेक्ट कर लड़ा गया था।
ऐसे में बीजेपी कई बार परिवर्तन के कड़े और स्पष्ट फैसले लेती आई है। मुझे 1 प्रतिशत भी संशय नहीं है कि 45 साल के नितिन नबीन को पार्टी की कमान सौंपने का ये फैसला भी उसी से जुड़ा एक बड़ा निर्णय है। बीजेपी का कोई भी अध्यक्ष महज पद पर बैठने वाला रबर स्टैम्प नहीं होगा। केंद्रीय नेतृत्व के मार्गदर्शन में वे 2029 में बीजेपी को जीत की तरफ ले जाने के काम में जुटेंगे और उसी तर्ज पर नई कार्यकारिणी बनाएंगे, ऐसा मेरा आकलन है। दो सालों में कई बड़े राज्यों के चुनाव पार्टी के सामने हैं। इसीलिए जैसे पहले हुआ वैसा इस बार भी हुआ। पार्टी अपने साहसिक निर्णयों की किसी को हवा भी नहीं लगने देती है और इस नेतृत्व परिवर्तन को भी बीजेपी अपने हक में भुनाएगी।
भारतीय राजनीति को तीन दशक से करीबी से समझ रहे वरिष्ठ पत्रकार अभिरंजन कुमार कहते हैं कि ये सच है कि अटल- आडवाणी वाली बीजेपी अब काफी बदल गई है। शुचिता से ज्यादा चुनाव जीतना अब पार्टी की प्रायोरिटी है। इसी बात को आगे बढ़ाते हुए मैं बीजेपी के कार्यकारी अध्यक्ष के कम उम्र का होने पर दो बातें कहूंगा, जैसा कि विदित है कि पीएम मोदी ने लालकिले से कहा था कि वे एक लाख युवाओं को राजनीति में लाएंगे, तो अगर इसी कड़ी में नितिन नबीन का चयन किया गया है तो माना जाएगा कि पार्टी Gen Z की ओर जा रही है, पर अगर कार्यकारी प्रेजिडेंट के तौर पर वे सिंबोलिक हैं, तो नई बीजेपी का सृजन जैसा कुछ नहीं दिखेगा। यहां ये भी उल्लेख करना जरूरी है कि युवा नेतृत्व के नाम पर जिन्हें सामने लाया जा रहा है, वे पॉलिटिकल नेताओं की ही अगली पीढ़ी हैं या फिर आम युवा इसका हिस्सा बन रहा है, ये सवाल बहुत ही विचारणीय है। इसी पर ये तय होगा कि पार्टी अब युवा कैडर को प्रमोट कर अपना ढांचा बदलने जा रही है।
राजनीतिक विश्लेषक राजेश बादल बताते हैं कि अटल, आडवाणी, जसवंत सिंह, सिकंदर बख्त, भैरोसिंह शेखावत वाली बीजेपी ने आजादी के बाद के भारत को धीरे-धीरे बनते देखा, उन्होंने नेहरू को शिल्पी के तौर पर देश को गढ़ते देखा। ऐसे में वे लोग गांधी-नेहरू की बहुत ज्यादा आलोचना से बचते थे। 2014 के बाद की बीजेपी ने अपने शिल्पियों की इस नीति को फॉलो नहीं किया। धीरे-धीरे बीजेपी ने अपनी नींव से उलट नीति अपनानी शुरू की है, 2014 वाली बीजेपी ने आपातकाल देखा था और उस आधार पर इस पीढ़ी ने पहली पीढ़ी की अपेक्षा इंदिरा-राजीव की आलोचना में मर्यादाएं तोड़ीं। अब आपके मूल सवाल पर आते हैं तो नए प्रेजिडेंट नितिन की पैदाइश आपातकाल के 5 साल बाद हुई, जिन्होंने वो दौर नहीं देखा, ऐसे में अब ये राजनीति को किस ओर ले जाएंगे ये हालिया बयानों से समझा जा सकता है। ये नई पीढ़ी दीनदयाल उपाध्याय के एकांत मानववाद के मूल सिद्धांत को कितना फॉलो करेगी, ये भी बड़ा सवाल है। लगातार हम देख रहे हैं कि बीजेपी प्रेजिडेंट्स को लेकर जो नया चलन है उसमें निर्वाचन वाला नियम भी फॉलो नहीं हो रहा है। ऐसे में मुझे ये सियासत के मंझे खिलाड़ी नहीं लग रहे हैं।
इसको मैं इस तरह से देख रहा हूं कि अब पार्टी में ही कुछ खास लॉबीज बनाई जा रही हैं। नई पीढ़ी के नेताओं की बात करें तो कई कांग्रेसी और दूसरे दलों से आए हैं और उनका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से लेना-देना नहीं है, ऐसे में इसे बीजेपी के कांग्रेसीकरण के तौर पर देखा जा सकता है। दूसरे दल से आए नेताओं का सरकार में भी बोलबाला है। ऐसे में मेरा आकलन है कि नए प्रयोग के आधार पर आई ये पीढ़ी पार्टी को नए सोपान पर ले जाने में सक्षम नहीं है। मैं स्पष्ट तौर पर कहता हूं कि ट्रांसफॉर्मेशन ऑफ बीजेपी प्रभावहीन होगा क्योंकि ये नेतागण जनाधार वाले नहीं हैं और सिर्फ बीजेपी ही नहीं ये पूरी भारतीय राजनीति का वो दौर है जहां लोकप्रिय युवा नेताओं का अभाव एक बड़ा क्राइसिस है।
Updated on:
03 Jan 2026 06:53 pm
Published on:
03 Jan 2026 11:53 am
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