
कर्नाटक हाईकोर्ट (File Photo)
कर्नाटक हाईकोर्ट (Karnataka High Court) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि अगर बुज़ुर्ग सास-ससुर अपने ही घर के शांतिपूर्ण इस्तेमाल और कब्ज़े से वंचित हो गए हैं, तो वो 'माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम' के तहत अपनी बहू से घर का कब्ज़ा वापस पाने की मांग कर सकते हैं। जस्टिस सचिन शंकर मगदुम ने हाल ही में सुनाए एक आदेश में कहा कि 'घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम' के तहत साझा आवास (शेयर्ड हाउसहोल्ड) का अधिकार वरिष्ठ नागरिकों (इस मामले में सास-ससुर) के वैधानिक अधिकारों को पूरी तरह निष्प्रभावी नहीं कर सकता।
कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा कि 'माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम' सिर्फ भरण-पोषण तक सीमित नहीं है। यह अधिनियम बुज़ुर्गों की गरिमा, सुरक्षा, स्वायत्तता और अपने घर में सम्मानपूर्वक रहने के अधिकार की भी रक्षा करता है। ऐसे मामलों में 'माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम' और 'घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम', दोनों कानूनों के बीच संतुलन बनाना ज़रूरी है।
जस्टिस मगदुम ने यह भी कहा कि किसी घर के मालिकाना हक को सिर्फ कागज़ी अधिकार तक सीमित नहीं किया जा सकता, जिसमें कब्ज़ा और इस्तेमाल का अधिकार न हो। उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि न ही बुज़ुर्गों को ऐसी स्थिति में धकेला जा सकता है जहाँ अपना घर होने के बावजूद उन्हें कहीं और शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़े।
संबंधित मामले में हाईकोर्ट ने श्रीदेवी नाम की महिला की याचिका खारिज करते हुए 8 सप्ताह में उस घर को खाली करने का निर्देश दिया जो कि सास अनसूया की स्वयं अर्जित संपत्ति है और बहू का वहाँ निवास सिर्फ वैवाहिक संबंध के कारण था। कोर्ट ने कहा कि जबबुज़ुर्ग प्रतिकूल परिस्थितियों में अपना घर छोड़ने को मजबूर हों, तब 'माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम' को प्राथमिकता मिलेगी। कोर्ट ने 2025 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि 'घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम' के तहत निवास का अधिकार हर परिस्थिति में स्थायी या असीमित नहीं माना जा सकता।
Updated on:
09 Jul 2026 01:04 am
Published on:
09 Jul 2026 01:04 am
