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1956 से आज तक, आखिर क्यों ‘पत्रिका’ है करोड़ों पाठकों की पहली पसंद? लेखकों की जुबानी-कविता की कहानी

ये कविताएं संदेश देती हैं कि आज के दौर में भी 'पत्रिका' अपने मूल सिद्धांतों-साहस, सत्य और सेवा-पर अडिग है। यह केवल एक समाचार पत्र नहीं, बल्कि पाठकों का 'सौ टका खरा' विश्वास है, जो न दबाव में झुकता है और न प्रभाव में बिकता है।

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Karpoor Chandra Kulish ji

File Photo- श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश जी

Karpoor Chandra Kulish 100th Birth Year: यह कविताएं और विचार 'राजस्थान पत्रिका' के गौरवशाली 70 वर्षों के सफर और इसके संस्थापक कर्पूर चंद्र कुलिश जी के विजन को समर्पित एक भावपूर्ण श्रद्धांजलि हैं। इन लेखों का सार यह है कि पत्रकारिता केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के प्रति एक अटूट संकल्प है।

इन रचनाओं में कर्पूर चंद्र कुलिश जी को एक 'युगदृष्टा' और 'तपस्वी' के रूप में चित्रित किया गया है, जिन्होंने 1956 में अभावों के बीच 'राजस्थान पत्रिका' की नींव रखी। लेखकों ने रेखांकित किया है कि कुलिश जी ने कभी 'हवा-हवाई' पत्रकारिता नहीं की, बल्कि गाँवों और कस्बों की खाक छानकर जनता की नब्ज को पहचाना। उनके संपादकीय केवल शब्द नहीं थे, बल्कि वे सत्ता की गलत नीतियों को आईना दिखाने वाली 'मशाल' थे। विशेष रूप से इमरजेंसी के दौर में उनकी बेबाक लेखनी ने लोकतंत्र की रक्षा में महती भूमिका निभाई।

आज जब पत्रिका समूह अपनी 70वीं वर्षगांठ और कुलिश जी की जन्म शताब्दी मना रहा है, तो पाठकों का यह प्रेम स्पष्ट करता है कि यह अखबार करोड़ों दिलों की धड़कन बन चुका है। 'अमृतम जलम' जैसे सामाजिक सरोकारों और निष्पक्ष समाचारों के दम पर इसने राजस्थान से निकलकर देश के आठ राज्यों तक अपनी पहचान बनाई है।

1. कर्पूरचंद की कलाकृति, गुलाब जी की महक है पत्रिका

कर्पूरचंद की कलाकृति, गुलाब जी की महक है पत्रिका
खबरों में कंजूस नहीं, दिलदार है पत्रिका।
उम्र 70 वर्ष फिर भी, तरुनाई दिखाती है पत्रिका
संघ समाज को संसार प्रवाह से संगम कराती है पत्रिका।
अन्याय अत्याचार पर सत्ता से संग्राम कराती है,
ताजगी और तरावट की पर्याय है पत्रिका।
धर्म का मर्म समझाती, ऋषि मुनियों से सत्संग कराती
रात रात भर जाग कर, सुबह ताजी ताजी आती है पत्रिका।
साहस और सम्मान के साथ प्रकाशित, गौरव संपन्न
खेलों में रोमांच भरती, शब्दों से उमंग पत्रिका।
व्यापार वाणिज्य में सटीक रिपोर्ट से समृद्ध करती
रंग बिरंगे चित्र सजाती, सुबह की रंगोली है पत्रिका।
सच कहने का साहस, न दबाव में न प्रभाव में
जनता को जगाती , लोकतंत्र की मशाल है पत्रिका।
निष्पक्ष निर्विकार गहरी सुरीली जीवन साथी रूप
हजारों लाखों पाठकों की धड़कन बन, पाठकों की जान है पत्रिका।

-अभय कुमार बांठिया, महामंत्री
श्री श्वेतांबर स्थानकवासी जैन महासंघ बैंगलोर

2. पत्रिका समूह की शान है निराली

वाह रे पत्रिका समूह
तेरी भी शान है निराली
1956 में राजस्थान से प्रकाशित होकर
तुमने अनुराग सी सफलता है पा ली
देश प्रदेश शहर के हर स्थान पर
तुमने अपनी जगह है बना ली
समस्त पाठक जन गण मन की
प्रशंसा कर रही भली भली
वाह रे पत्रिका समूह
तेरी भी शान है निराली
जो भी पाठक गण इसको पढ़ते
तारीफ जरूर वह कोठारी जी की करते
आन बान शान रहेगी
अखबार जगत की मतवाली
वह रे पत्रिका समूह
तेरी भी शान है निराली
शानदार सिंह गेहूं वाली का मोनो है इसमें
साथ झलक रही
सत्यमेव जयते की किलकारी
हिंदू मुस्लिम सिख इसाई ने इसमें
एकता की अलख जगा डाली
वह रे पत्रिका समूह
तेरी भी शान है निराली
अमृतम जलम अभियान है इसमें
भगीरथों की पहचान है इसमें
सभी समाचार पत्रों में
सर्वश्रेष्ठ जगह बना डाली
वह रे पत्रिका समूह
तेरी भी शान है निराली
वर वधू के रिश्ते इसमें
प्रकाशित होते रविवार को
बेशुमार
खोज रहे हैं नवयुगल इसमें
जीवनसाथी की अजब बहार
शहर शहर से प्रकाशित होती
यह बात है पता सबको चली
वाह रे पत्रिका समूह
तेरी भी शान है निराली
संपादक मंडल का इसमें काम है निराला
गुलाब जी ने इसमें मोहर लगा डाला
कपूर चन्द्र कुलिश जी की
आधारशिला ने
जगाई नई आशा
पत्रकारों का सहयोग है इसमें पारी पारी
सफलता पूर्वक तैयार हो जाती है
पत्रिका दैनिक हर रोज सारी की सारी
वाह रे पत्रिका समूह
तेरी भी शान है निराली
प्रयास कर रहा हूं सृजन के जरिए
संपर्क करें हॉकर से अभी
दैनिक आएगा घर-घर में पत्रिका
मिलेगी सभी को इसकी गति
मिलेगी सभी को इसकी प्रति

–अनुराग कोरी साई
जबलपुर (मध्य प्रदेश)

3. रेत की धरती, वीरों की शान

रेत की धरती, वीरों की शान,
सत्य की आवाज़ – राजस्थान।
जब अंधेरा चारों ओर छा जाता,
तब एक दीप जगमगाता।
वह दीप है सच्चाई का,
जनता की सच्ची कमाई का।
हर सुबह जो संदेश सुनाए,
राजस्थान पत्रिका कहलाए।
कभी अन्याय से टकराती,
कभी सच की राह दिखाती।
कभी जन-जन की पीड़ा लिखती,
कभी खुशियों की धुन सुनाती।
कलम उठे तो आवाज़ बने,
हर दिल में विश्वास बने।
साहस, सत्य और सेवा की धारा,
पत्रकारिता का अभियान।
हर गाँव, हर शहर की बात,
जनता के दिल की हर सौगात।
जो सच का परचम लहराए,
राजस्थान पत्रिका कहलाए।

-अथर्व पारिक
भीलवाड़ा (राजस्थान)

4. देश-दुनिया की खबर करवाने में

देश-दुनिया की खबर करवाने में
'राजस्थान पत्रिका' सबसे आगे।
निष्पक्ष होकर सच्ची खबरों की झलक दिखाए,
सभी अखबारों में ध्रुव बनकर जगमगाए।
कर्तव्य की राह को कभी न छोड़े,
आज पत्र बहुत बड़ा बनकर खड़ी है।
रोज सुबह आपके साथ का पहला इंतज़ार,
बिना राजस्थान पत्रिका दिन रहता फीका।

-ध्रुव वीर सिंह
श्रीगंगानगर (राजस्थान)

5. आसान नहीं है कुलिश हो जाना

आसान नहीं है
किसी पत्रकार संपादक का कुलिश हो जाना
अखबार प्रारंभ करने से पहले
कुलिश जी पहुंचने लगे थे गांव नगर शहर में
जनता के बीच
वह जानना चाहते थे उनसे कि पेपर में क्या कुछ हो ?
ताकि लगे अखबार उन्हें अपनासा
वह कभी हवा हवाई नहीं रहे
सदा जुड़े रहे लोगों के मन और
उनकी आकांक्षाओं से
सीमित संसाधनों से शुरू की थी राजस्थान पत्रिका
अपने प्रारंभिक काल में पग पग करना पड़ा था
अभावों से संघर्ष
मुश्किल दौर से गुजरते रहे वह
लेकिन संकल्पित कुलिश जी ने फिर देखा नहीं
कभी पीछे मुड़कर
बस अपने लक्ष्य के लिए पूरे समर्पण से
नदी की बहती कल कल धारा की तरह आगे बढ़ते रहे
जनता के मन की खरी-खरी अखबार में छापते रहे
सरकार की गलत नीतियों की
करते रहे बेबाक आलोचना और
प्रशासन को भी गलत निर्णयों पर दिखाते रहे आईना
किसी समस्या पर
पाठकों का ध्यान आकर्षित करने के लिए
पहले पृष्ठ पर प्रकाशित होते रहे
जन मन की आकांक्षा वाले उनके संपादकीय
इमरजेंसी के अप्रिय समय के बाद
कुलिश जी के संपादकीय लेख
पाठकों के दिलों में राज करने लगे थे
जनता पार्टी की लहर को लाने में
उनके संपादकीय का बहुत बड़ा योगदान रहा था
आज भी पत्रिका कुलिश जी के सोच व संकल्प
कि जनहित के विरुद्ध किसी लालच या डर से
विश्वास घाती समझौता नहीं होगा , पर अडिग है
इसलिए आज भी पत्रिका पाठकों का सौ टका खरा
विश्वास प्राप्त किए हुए है
इसी के चलते आज इसका गौरवशाली प्रकाशन
देश के आठ राज्यों से हो रहा है।
करोड़ों पाठक पत्रिका से लाभान्वित हो रहे हैं
पत्रिका प्रकाशन की सत्तर वर्षीय
गौरवशाली तीर्थ यात्रा के बाद भी
अखबार के प्रति कुलिश जी की रीति नीति वाली सोच
आज भी पत्रिका में देखने को मिल रही है ।
सात दशक से संचालित जन जागरण करने वाले
प्रसिद्ध समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका
हिंदी अखबारों की दुनिया में
अपना गौरवशाली स्थान बनाये हुए है
इस श्रेष्ठतम उपलब्धि के लिए
कर्पूर चंद्र कुलिश जी को उनकी जन्म शताब्दी पर
पत्रिका के पाठक की ओर से श्रद्धा से भरा
कोटि कोटि नमन।

-दिनेश विजयवर्गीय
बूंदी (राजस्थान)