
ज्योति बसु, पश्चिम बंगाल के पूर्व सीएम (फोटोःANI)
पश्चिम बंगाल चुनाव की दहलीज पर खड़ा है। राज्य में आगामी महीनों में विधानसभा चुनाव होना है। सियासी पैंतरे चले जा रहे हैं। SIR का मुद्दा गरम है। बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार होने के कारण भी सामाजिक स्तर ध्रुवीकरण की कोशिश की जा रही है। पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी दिल्ली कूचकर केंद्र की मोदी सरकार से लोहा ले रही हैं। पहली बार कोई मुख्यमंत्री सुप्रीम कोर्ट की चौखट लांघकर कोर्टरूम पहुंचा। सीएम ममता ने SIR पर CJI गवई के सामने दलील दी।
वहीं, एक समय ऐसा भी था जब पश्चिम बंगाल की सत्ता पर एक बैरिस्टर काबिज था। बैरिस्टर ज्योति बसु पश्चिम बंगाल में सबसे लंबे समय तक सीएम रहे। वह करीब 23 सालों तक मुख्यमंत्री रही। इस दौरान एक समय ऐसा भी आया, जब उन्हें प्रधानमंत्री बनाने की पेशकश की गई, लेकिन पार्टी आतंरिक फैसलों के कारण वह पीएम नहीं बन पाए। जिसे वाममोर्चा का 'ऐतिहासिक भूल' करार दिया गया।
दरअसल, ज्योति बसु का जन्म 8 जुलाई 1914 को कोलकाता में हुआ था। उनके पिता डॉक्टर थे। बेटे को बैरिस्टर बनाने के लिए उन्होंने साल 1935 में बसु को लंदन भेजा। लंदन में वकालत की पढ़ाई के दौरान ज्योति बसु मार्क्स और लास्की की दलीलों में इतना रम गए कि 1940 में भारत लौटने के बाद अगले 60 सालों तक देश के सबसे बड़े वामपंथी चेहरों में से एक रहे। बसु 1946-47 में वह रेलवे कर्मचारियों के प्रतिनिधि के रूप में बंगाल विधानसभा में चुने गए। 1947 में भारत के आजाद होने पर बंगाल विधानसभा का सदस्य बने। 1964 में CPI के विभाजन के बाद वह CPM के संस्थापक सदस्य बने और 2008 तक CPM की हाईएस्ट बॉडी पॉलित ब्यूरो के सदस्य रहे।
साल 1977 भारतीय लोकतंत्र के इतिहास के लिए महत्वपूर्ण साल रहा है। तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी खत्म की। केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बनी, एक चुनाव बंगाल में भी हुआ। इस चुनाव में सिर्फ बंगाल की सियासत नहीं बदली, बल्कि एक युग बदल गया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जो दशकों तक सत्ता पर काबिज रही। वह बंगाल से हमेशा के लिए विदा हो गई। आज पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का एक भी विधायक नहीं है।
1977 में कांग्रेस की सिद्धार्थ शंकर रे की सरकार गई और प्रदेश में वाममोर्चा का नेतृत्व ज्योति बसु ने संभाला। वह साल 2000 तक राज्य में सीएम रहे। उनके नेतृत्व में वाममोर्चा को पश्चिम बंगाल में अभूतपूर्व सफलता हासिल हुई। वह लगातार 4 बार सीएम चुने गए। साल 2000 में स्वास्थ्य कारणों की वजह से उन्होंने पद से इस्तीफा दिया और बुद्धदेव भट्टाचार्य को अपना उत्तराधिकारी बनाया। दिलचस्प बात यह है कि जब तक ज्योति बसु जीवित रहे तब तक बंगाल में वाममोर्चा का 'लाल किला' मजबूत रहा, उनके देहांत के बाद वाम मोर्चा पश्चिम बंगाल सहित देश भर में भर-भराकर गिर गया।
1990 में भारतीय लोकतंत्र एकबार फिर हिचकोले खा रही थी। वह गठबंधन की सरकार का दौर था। न तो कांग्रेस के पास पूर्ण बहुमत था, न ही बीजेपी सहयोगियों को कामयाब हो पाई। विभिन्न क्षेत्रीय दलों और वामपंथी दलों ने मिलकर संयुक्त मोर्चा (United Front) नामक एक गठबंधन बनाने का फैसला किया।
यूनाइटेड फ्रंट के नेता देश में स्थिरता लाने के लिए और सरकार बनाने के लिए पश्चिम बंगाल के तत्काली सीएम ज्योति बसु के पास पहुंचे। ज्योति बुस वाममोर्चा के सबसे अनुभवी नेता थे, लेकिन पार्टी की केंद्रीय कमेटी के नेताओं ने उन्हें प्रधानमंत्री पद स्वीकार करने से रोक दिया।
CPM के पोलित ब्यूरो का मानना था कि चूंकि उनके पास लोकसभा में केवल 32 सांसद थे (जो बहुमत से बहुत कम था)। इसलिए एक गठबंधन सरकार में शामिल होने से वे अपनी मार्क्सवादी नीतियों और सिद्धांतों को प्रभावी ढंग से लागू नहीं कर पाएंगे। उनका तर्क था कि इससे पार्टी की विश्वसनीयता प्रभावित होगी और वे समझौता करने के लिए मजबूर होंगे। आगे चलकर ज्योति बसु पार्टी के इस फैसले को ऐतिहासिक भूल करार दिया।
ज्योति बसु को लेकर भारत के पूर्व विदेश राज्य मंत्री और वरिष्ठ पत्रकार एमजे अकबर ने अपने एक कॉलम में लिखा कि बसु को पीएम पद से कोई लगाव नहीं था। उनके पास उस दौर में अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों की तुलना में ज्यादा ताकत थी। वाम मोर्चा के समर्थन के बिना कभी भी वीपी सिंह प्रधानमंत्री नहीं बन सकते थे, लेकिन बसु पीएम पद की ताकत और शक्तियों से वाकिफ थे।
एमजे अकबर ने आगे लिखा कि CPM ने इतिहास के अहम मोड़ पर गलत रास्ता चुन लिया था। जिसके बाद से वामपंथ का प्रभाव देश भर में सिमटता चला गया। ज्योति बसु ने साल 1997 में दौरान वह देख लिया था, जो उस समय CPM के अन्य नेता नहीं देख पाए थे। वामपंथ को एक प्रधानमंत्री की विशाल शक्ति के माध्यम से वंचितों और हाशिए पर पड़े लोगों को नेतृत्व प्रदान करके क्षेत्रीय क्षत्रपों से एक बड़ी छलांग लगाने की जरूरत थी।
एक प्रधानमंत्री की भाषा, शायद उनकी नीतियों से भी ज़्यादा, देश का एजेंडा तय करती है। बसु नेहरू के आदर्शवादी दौर से लेकर इंदिरा के वास्तविक राजनीति के दौर को देख चुके थे। उनमें वह लचीलापन था, जो किसी राजनेता के लिए जरूरी तत्व है। वह ऐसा जनाधार बनाने में भी सक्षम थे, जिसे 1950 के दशक में वाममोर्चा ने छोड़ दिया था।
बसु की सड़कों पर विश्वसनीयता थी, मगर सीपीएम ने हमेशा बिना जिम्मेदारी के प्रभाव चाहा। इस वजह से अपने पाखंडी रवैये के कारण CPM ने ऐतिहासिक भूल कर दी। अकबर ने लिखा कि अगर बसु पीएम बनते तो सोवियत संघ के पतन के सिर्फ़ आधे दशक बाद लोकतांत्रिक भारत के कम्युनिस्ट प्रधानमंत्री के तौर पर, बसु ने न सिर्फ़ अपने देश बल्कि दुनिया को भी प्रभावित किया होता।
Published on:
06 Feb 2026 12:31 pm
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