
नेहरू और बीजू पटनायक
3 नवंबर को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के निर्देश पर अमेरिका सेना के डेल्टा फोर्सेज ने वेनेजुएला पर हमला बोला। डेल्टा फोर्सेज के जवानों ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को उठा लिया। मादुरो और उनकी पत्नी अमेरिका में है। जहां उन्हें अमेरिकी न्याय का सामना करना होगा। अमेरिका ने उन पर ड्रग कार्टेल चलाने का आरोप हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति भले ही ऐसा कह रहे हैं कि किसी देश ने इस तरह का ऑपरेशन नहीं किया है। अमेरिका सर्वश्रेष्ठ है, लेकिन भारत ने भी ऐसा कारनामा किया है। वो भी एक नहीं, बल्कि दो बार (इंडोनिया और नेपाल)। हालांकि, इस ऑपरेशन में वहां के प्रमुखों को उनकी मर्जी से रेस्क्यू करके भारत लाया गया था।
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद दुनिया नई व्यवस्था की ओर बढ़ रही थी। ब्रिटिश उपनिवेशवाद का सूरज अब अस्त होने लगा था। साल 1946 में ब्रिटिश हुकूमत ने भारत को आजाद करने का ऐलान कर दिया था। पंडित जवाहर लाल नेहरू अंतरिम सरकार के मुखिया थे। वह उपनिवेशवाद के विरोध में लगातार लिख और बोल भी रहे थे। उन्होंने खुलकर ब्रिटेन, फ्रांस, डच और पुर्तगाल पर औपनिवेशिक शासन छोड़ने का दवाब डाला। वहीं, भारत के पूर्व में एशिया के महत्वपूर्ण देश से उसके प्रधानमंत्री और उपराष्ट्रपति को जंग के बीच जंगलों से रेस्क्यू करने का प्लान बनाया।
दरअसल, द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान ने इंडोनेशिया पर कब्जा कर लिया था, लेकिन 1945 में जापान के आत्मसमर्पण के बाद सुकर्णो और मोहम्मद हत्ता ने स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। सुकर्णो राष्ट्रपति बने और सुतान शारिर पहले प्रधानमंत्री, लेकिन नीदरलैंड्स (डच) अपनी पुरानी कॉलोनी वापस चाहता था। बातचीत नाकाम रहने के बाद डच औपनिवेशिक शासन ने ऑपरेशन प्रोडक्ट को लॉन्च कर दिया। जल्द ही डच सेना ने राजधानी जकार्ता और अन्य प्रमुख शहरों पर कब्जा जमा लिया। शारिर जो उस प्रधानमंत्री थे, उन्हें नजरबंद कर दिया गया। वहीं, उप राष्ट्रपति हाता व अन्य नेता जंगलों में जा छिपे।
भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू जानते थे कि अगर इंडोनेशियाई नेताओं को वैश्विक मंच पर आवाज उठाने का मौका मिले तो डच पर प्रभाव पड़ेगा। उनका मानना था कि शारिर और हता को दिल्ली लाना इसलिए जरूरी है कि दोनों नेता संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक मंच पर इंडोनेशिया की स्थिति को बता सके। नेहरू का मानना था कि नवउदित राष्ट्रों को एकजुट होकर उपनिवेशवाद का विरोध करना चाहिए। जिसके बाद ही NAM (नॉन अलायंस मूवमेंट), जिसे गुटनिरपेक्ष संगठन बना। यह आज भी भारत की विदेश नीति का महत्वपूर्ण सिद्धांत है।
नेहरू ने दोनों इंडोनेशियाई नेताओं को रेस्क्यू करने के लिए ओडिशा के अनुभवी पायलट बीजू पटनायक को चुना। बीजू पटनायक रॉयल इंडियन एयर फोर्स में सेवा कर चुके थे और कालिंगा एयरलाइंस के मालिक भी थे। बीजू और उनकी पत्नी ग्याना पटनायक, जो खुद भी एक बेहतरीन पायलट थीं, उन्होंने 21-24 जुलाई के दौरान गुप्त तरीके से इंडोनेशिया के लिए अपने डकोटा DC-3 विमान से उड़ान भरी। डच ने चेतावनी दी कि इंडोनेशियाई एयरस्पेस में आने पर विमान गोली मार दी जाएगी, लेकिन बेहद शातिर तरीके से उन्होंने डच निगरानी को चकमा देकर जकार्ता के पास एक अस्थायी एयरस्ट्रिप पर लैंडिंग की। उन्होंने जापानी कब्जे के समय बचे ईंधन का इस्तेमाल किया और शारिर व हत्ता को लेकर सिंगापुर होते हुए भारत पहुंचे। वह 22 जुलाई को सिंगापुर और 24 जुलाई को दिल्ली पहुंचे। इस दौरान डच फाइटर प्लेन ने हमला किया, लेकिन बीजू सुरक्षित बच निकले।
इस मिशन से इंडोनेशिया की आजादी की लड़ाई को वैश्विक समर्थन मिला। जनवरी 1949 में नेहरू ने एशियाई देशों का सम्मेलन बुलाया, जहां डच औपनिवेशिक शासन की निंदा हुई। दिसंबर 1949 में इंडोनेशिया को पूर्ण स्वतंत्रता मिली। इंडोनेशिया ने बीजू पटनायक के इस योगदान के लिए उन्हें सर्वोच्च सम्मान भूमिपुत्र से नवाजा और देश की मानद नागरिकता भी दी। आज भी ओडिशा के भुवनेश्वर एयरपोर्ट पर बीजू पटनायक की डकोटा का मॉडल प्रदर्शित है। बीजू पटनायक बाद में राजनीति में आए और 1961-63 तथा 1990-95 में ओडिशा के मुख्यमंत्री बने। बादे में उनके बेटे नवीन पटनायक ने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया। वह साल 2000 से लेकर 2024 तक ओडिशा के सीएम रहे।
Updated on:
05 Jan 2026 12:06 pm
Published on:
05 Jan 2026 12:06 pm
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