
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला (Photo: IANS)
Lok Sabha Speaker: लोकसभा में विपक्ष के निशाने पर आए लोकसभाध्यक्ष ओम बिरला (Om Birla) ने पक्ष और विपक्ष के कई नेताओं को वैश्विक मंच पा ला कर कार्ड खेल लिया है। लोक सभा अध्यक्ष (Lok Sabha Speaker) ओम बिरला ने एक बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया है। उन्होंने वैश्विक कूटनीतिक संबंधों को नई धार देने के उद्देश्य से 60 से अधिक देशों के साथ 'संसदीय मैत्री समूहों' (Parliamentary Friendship Groups) का औपचारिक गठन किया है। इस पहल की सबसे खास बात यह है कि इसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष के कई दिग्गज नेताओं को एक साथ लाया गया है, लेकिन विपक्ष के नेता राहुल गांधी और कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को इसमें शामिल नहीं किया गया है।
भारत की संसदीय कूटनीति को नई ऊंचाई पर ले जाने के लिए इन समूहों की कमान बेहद अनुभवी चेहरों को सौंपी गई है। पी. चिदंबरम, शशि थरूर, रविशंकर प्रसाद, टी.आर. बालू, के.सी. वेणुगोपाल, अखिलेश यादव, असदुद्दीन ओवैसी, अभिषेक बनर्जी, सुप्रिया सुले और अनुराग ठाकुर जैसे कद्दावर नेता इन मैत्री समूहों का नेतृत्व करेंगे। इनके अलावा राम गोपाल यादव, गौरव गोगोई, कनिमोझी, मनीष तिवारी, डेरेक ओ’ब्रायन, राजीव प्रताप रूडी, संजय सिंह, बैजयंत पांडा, निशिकांत दुबे, भर्तृहरि महताब, डी. पुरंदेश्वरी, संजय कुमार झा, हेमा मालिनी और प्रफुल्ल पटेल जैसे नेताओं को भी विभिन्न महत्वपूर्ण देशों के साथ समन्वय की अहम जिम्मेदारी दी गई है।
हाल ही में हुए 'ऑपरेशन सिंदूर' के बाद प्रधानमंत्री की उस बहुदलीय सोच को आगे बढ़ाया गया है, जिसमें राष्ट्रीय हितों के लिए सभी राजनीतिक दलों को साथ लेकर चलने की बात कही गई थी। लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला ने उसी दृष्टिकोण को अपनाते हुए अब इन संसदीय मैत्री समूहों को औपचारिक स्वरूप प्रदान कर दिया है।
प्रथम चरण में जिन 60 से अधिक देशों के साथ मैत्री समूह बनाए गए हैं, उनमें दुनिया की तमाम महाशक्तियां और रणनीतिक साझेदार शामिल हैं। इनमें अमेरिका, रूस, यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, जर्मनी, जापान, इटली, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, स्विट्ज़रलैंड, दक्षिण अफ्रीका, सऊदी अरब, इज़राइल, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), श्रीलंका और यूरोपीय संसद जैसे महत्वपूर्ण देश शामिल हैं। आने वाले समय में इस सूची में और भी देशों को जोड़ा जाएगा।
राजनीतिक विश्लेषकों और विदेश नीति के जानकारों ने ओम बिरला की इस पहल का जोरदार स्वागत किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब वैश्विक मंचों पर भारत के सत्ताधारी और विपक्षी नेता एक साथ जाकर देश की बात रखेंगे, तो दुनिया के सामने भारत की साख और भी मजबूत होगी। विपक्षी दलों के नेताओं ने भी दलगत राजनीति से ऊपर उठकर की गई इस कूटनीतिक पहल को एक सकारात्मक कदम बताया है।
मैत्री समूहों के गठन के बाद अब जल्द ही संसदीय सचिवालय की ओर से इन समूहों की पहली रूपरेखा और बैठकों का दौर शुरू किया जाएगा। विदेश मंत्रालय के साथ समन्वय स्थापित करके इन प्रतिनिधिमंडलों के विदेशी दौरों और दूसरे देशों के संसदों के साथ संवाद के कार्यक्रम तय किए जाएंगे। दूसरे चरण में दुनिया के अन्य देशों को भी इसमें शामिल करने की योजना पर काम चल रहा है।
इस पूरी खबर का सबसे दिलचस्प और मजबूत 'साइड एंगल' यह है कि राष्ट्रीय हित के मुद्दे पर भारत एकजुट है। अखिलेश यादव, असदुद्दीन ओवैसी और संजय सिंह जैसे नेता जो घरेलू राजनीति में सरकार के मुखर आलोचक माने जाते हैं, वे भी अब विदेशी मंचों पर भारत के कूटनीतिक हितों की वकालत करते नजर आएंगे। यह दुनिया को एक साफ संदेश है कि आंतरिक राजनीति का शोर भारत की एकजुट विदेश नीति पर हावी नहीं हो सकता।
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Updated on:
23 Feb 2026 06:00 pm
Published on:
23 Feb 2026 05:49 pm
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