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कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के लिए परेशानी खड़ी कर सकते हैं हाल के कुछ फैसले

Congress Inside Story: कांग्रेस के कई नेता दबी जुबान से अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे पर अंगुली उठा रहे हैं। उनका मानना है कि पार्टी अध्यक्ष कई मामलों में निर्णय लेने में देर करते हैं और उनके कई फैसलों से ऐसा लगता है कि वह अपने लोगों को आगे बढ़ाने में लगे हैं।

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Congress President Mallikarjun Kharge

कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे (File Photo- IANS)

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे संभवतः चुनावी राजनीति की अंतिम पारी खेल रहे हैं। हाल ही में राज्य सभा के लिए निर्वाचित होने के बाद प्रमाण पत्र लेते वक्त उन्होंने इसके संकेत भी दिए थे। 83 साल के खरगे एक बार फिर छह साल के लिए राज्य सभा सांसद चुने गए हैं। वह कांग्रेस अध्यक्ष भी हैं।

खरगे 19 अक्तूबर, 2022 को चुनाव जीत कर (शशि थरूर से) कांग्रेस अध्यक्ष बने थे। इस पद पर उनका पांच साल का कार्यकाल अगले साल अक्तूबर में खत्म होगा। वैसे तो कांग्रेस में लगततार दोबारा अध्यक्ष बने रहना प्रतिबंधित नहीं है, लेकिन खरगे की उम्र को देखते हुए इस बात की बहुत कम संभावना है कि उन्हें बतौर अध्यक्ष दूसरा कार्यकाल दिया जाए। उनका कार्यकाल जैसे-जैसे खत्म होने के नजदीक आ रहा है, पार्टी में उनके खिलाफ कानाफूसी बढ़ती लग रही है। कई नेता 'ऑफ द रिकॉर्ड' उनके फैसलों पर दबी जुबान से अंगुली उठाते हैं।

मल्लिकार्जुन खरगे के अब तक के कार्यकाल में कांग्रेस का कोई कायाकल्प नहीं हुआ है। वह नेहरू-गांधी परिवार से बाहर के संभवतः पहले ऐसे अध्यक्ष हैं, जिन्हें गांधी परिवार के आदेश पर या पूरे दबाव में काम नहीं करना पड़ रहा है। इस बात के संकेत कई मौकों और फैसलों से भी मिलते हैं।

हाल के तमिलनाडु विधान सभा चुनाव में राहुल गांधी चाहते थे कि फिल्म स्टार सी जोसेफ विजय की पार्टी से चुनाव पूर्व समझौता किया जाए। लेकिन, खरगे डीएमके से नाता तोड़ने के पक्ष में नहीं थे। पी चिदम्बरम की राय भी यही थी। राहुल गांधी ने कोई दबाव नहीं डाला। डीएमके के साथ गठबंधन में कांग्रेस ने महज पांच सीटें जीतीं। दूसरी ओर, विजय की आंधी आई हुई थी। नतीजों के बाद कांग्रेस ने डीएमके से रिश्ता तोड़ने का फैसला लिया। ऐसे फैसलों को कांग्रेस के कुछ नेता सही नहीं मानते हैं और इस बारे में दबी जुबान में बातें भी करते हैं।

कई नेताओं को यह भी अखर रहा है कि खरगे एक व्यक्ति, एक पद का सिद्धांत नहीं मान रहे हैं। वह कांग्रेस अध्यक्ष होने के साथ-साथ राज्य सभा में नेता प्रतिपक्ष की भी ज़िम्मेदारी निभा रहे हैं।

कांग्रेस के कुछ नेताओं का यह भी मानना है कि अध्यक्ष खरगे पार्टी में अपने लोगों को आगे बढ़ा रहे हैं। हाल के कुछ घटनाक्रम के चलते ऐसे विचारों को मजबूती मिल रही है। राज्य सभा चुनाव में भी उन्होंने अपने करीबी प्रणव झा को झारखंड से उम्मीदवार बनवाया। झा लंबे समय से उनके सहायक हैं। इससे पहले उन्होंने अपने एक और करीबी, नीरज डांगी को राजस्थान से राज्य सभा भिजवाया था।

कर्नाटक में हाल ही में डीके शिवकुमार के नेतृत्व में बनी नई सरकार में उनके बेटे प्रियांक खरगे एक बार फिर मंत्री बनाए गए हैं। वैसे प्रियांक 2013 से ही विधायक हैं और पहले भी मंत्री रह चुके हैं।

मध्य प्रदेश में मीनाक्षी नटराजन का राज्य सभा चुनाव का नामांकन खारिज होने के मामले में भी माना जा रहा है कि तेलंगाना, मध्य प्रदेश और दिल्ली की बीच तालमेल का अभाव रहा। कुछेक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे ने एक 'आपात बैठक' में इसे लेकर बात की, लेकिन मामला बिगड़ जाने के बाद।

केरल का सीएम तय करने पर फैसले में हुई देरी

केरल विधान सभा चुनाव में हालिया जीत के बाद वीडी सतीशन को मुख्यमंत्री चुनने में भी काफी देर की गई। उनके पक्ष में कई बातें थीं, फिर भी। सतीशन की अगुआई में ही केरल में कांग्रेस की अगुआई वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ़) ने विधान सभा की 140 में से 102 सीटें जीती थीं। इसके बाद राज्य में उन्हें 'नायक' बताने वाले पोस्टर भी लगाए गए थे।

सतीशन परावुर सीट से 2001 से ही जीतते आ रहे हैं। पिछली विधान सभा में वह नेता प्रतिपक्ष रह चुके थे। नई विधान सभा में कांग्रेस के 63 में से 47 विधायकों के साथ-साथ उन्हें राहुल गांधी का समर्थन भी हासिल था। गठबंधन के साथी दल भी सतीशन को ही सीएम बनाए जाने के पक्ष में थे। इन सबके बावजूद बतौर सीएम उनका नाम घोषित होने में 10 दिन से ज्यादा लग गए थे। अनौपचारिक बातचीत में पार्टी के कुछ नेताओं का मानना है कि खरगे इस मामले में केसी वेणुगोपाल की महत्वाकांक्षा पर आसानी से लगाम लगा पाने में कामयाब नहीं हुए।

मल्लिकार्जुन खरगे की अध्यक्षता में कांग्रेस का चुनावी प्रदर्शन

चुनाव वर्षराज्य विधान सभा / लोक सभा चुनाव कांग्रेस की जीत हुई या हार)अहम बात
2022हिमाचल प्रदेशजीतखड़गे के अध्यक्ष बनने के तुरंत बाद पहली बड़ी जीत। कांग्रेस ने भाजपा को हराकर सरकार बनाई।
2022गुजरातहारकांग्रेस को राज्य के इतिहास में सबसे करारी हार का सामना करना पड़ा और सीटें घटकर केवल 17 रह गईं।
2023कर्नाटकजीतखड़गे के गृह राज्य में कांग्रेस की प्रचंड जीत। डी.के. शिवकुमार और सिद्धारमैया के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत की सरकार बनी।
2023तेलंगानाजीतदक्षिण भारत में एक और बड़ी सफलता। के. चंद्रशेखर राव (BRS) के 10 साल के शासन को खत्म कर रेवंत रेड्डी मुख्यमंत्री बने।
2023मध्य प्रदेशहारसत्ता में वापसी की भारी उम्मीदों के बावजूद कांग्रेस को करारी शिकस्त मिली और भाजपा ने बंपर बहुमत हासिल किया।
2023राजस्थानहारअशोक गहलोत सरकार विरोधी लहर (Anti-incumbency) को नहीं बदल पाई और सत्ता कांग्रेस के हाथ से निकल गई।
2023छत्तीसगढ़हारभूपेश बघेल सरकार की वापसी की उम्मीद थी, लेकिन यह परिणाम सबसे चौंकाने वाला रहा और कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई।
2023मिजोरमहारकांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा और क्षेत्रीय दल (ZPM) ने सरकार बनाई।
2024लोकसभा चुनाव (2024)हारखरगे के नेतृत्व में 'INDIA' गठबंधन ने भाजपा को अपने दम पर बहुमत लाने से रोक दिया। कांग्रेस की सीटें 52 (2019) से बढ़कर 99 हो गईं, जिससे पार्टी को संजीवनी मिली।
2024हरियाणाहारअनुकूल माहौल और किसान आंदोलन के असर के बावजूद कांग्रेस अंदरूनी गुटबाजी के कारण जीता हुआ चुनाव हार गई।
2024जम्मू और कश्मीरजीत (गठबंधन)नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा। गठबंधन को बहुमत मिला और उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने।
2024महाराष्ट्रहार (गठबंधन)महाविकास अघाड़ी (MVA) गठबंधन के तहत चुनाव लड़ा, लेकिन महायुति (भाजपा-शिवसेना-एनसीपी) के सामने करारी हार हुई।
2024झारखंडजीत (गठबंधन)झामुमो (JMM) के साथ गठबंधन में सत्ता बचाने में कामयाब रहे और हेमंत सोरेन फिर मुख्यमंत्री बने।
2025दिल्लीहारविधानसभा चुनाव में पार्टी कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ पाई। मुकाबला आप (AAP) और भाजपा के बीच ही रहा। जीत भाजपा की हुई।
2025बिहारहारराजद (RJD) और वामदलों के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा, लेकिन एनडीए (NDA) को बहुमत मिला।
2026पश्चिम बंगाल / असम / केरलकेरल में जीत, बाकी में हारकेरल में यूडीएफ (UDF) के जरिए वापसी की कोशिशें रहीं, जबकि असम में भाजपा का दबदबा कायम रहा। बंगाल में पहली बार भाजपा ने शानदार जीत दर्ज की।

21वीं सदी में गांधी परिवार से बाहर के पहले कांग्रेस अध्यक्ष हैं खरगे

अध्यक्ष का नामकार्यकालमहत्वपूर्ण तथ्य
जे. बी. कृपलानी1947आजादी के समय (15 अगस्त 1947) कांग्रेस के अध्यक्ष थे।
भोगराजू पट्टाभि सीतारमैया1948–1949आजादी के बाद जयपुर अधिवेशन में पहले निर्वाचित अध्यक्ष बने।
पुरुषोत्तम दास टंडन1950नेहरू के साथ वैचारिक मतभेदों के बाद इस्तीफा दे दिया था।
जवाहरलाल नेहरू1951–1954प्रधानमंत्री रहते हुए संगठन की कमान संभाली।
यू. एन. ढेबर1955–1959लगातार 5 साल तक अध्यक्ष रहने वाले गैर-नेहरू परिवार के नेता।
इन्दिरा गांधी1959, 1978–1984पहली बार 1959 में बनीं, फिर 1978 में कांग्रेस (I) का गठन कर कमान ली।
नीलम संजीव रेड्डी1960–1963बाद में देश के राष्ट्रपति बने।
के. कामराज1964–1967इन्हें भारतीय राजनीति का 'किंगमेकर' कहा जाता था।
एस. निजलिंगप्पा1968–1969इनके कार्यकाल में ही 1969 में कांग्रेस का ऐतिहासिक विभाजन हुआ।
जगजीवन राम1970–1971विभाजन के बाद इंदिरा गांधी के खेमे के अध्यक्ष बने।
शंकर दयाल शर्मा1972–1974बाद में भारत के राष्ट्रपति बने।
देवकांत बरुआ1975–1977आपातकाल (Emergency) के दौरान अध्यक्ष थे। इनका "इन्दिरा ही इंडिया है" नारा चर्चित रहा।
के. ब्रह्मानंद रेड्डी1977–1978आपातकाल के बाद पार्टी की कमान संभाली।
राजीव गांधी1985–1991प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता रहते हुए अध्यक्ष रहे; 1991 में हत्या हुई।
पी. वी. नरसिम्हा राव1992–1996प्रधानमंत्री पद के साथ-साथ अध्यक्ष पद भी संभाला।
सीताराम केसरी1996–1998गैर-गांधी परिवार के कद्दावर नेता, उनके कार्यकाल के बाद सोनिया गांधी की एंट्री हुई।
सोनिया गांधी1998–2017, 2019–2022कांग्रेस इतिहास में सबसे लंबे समय (कुल 22 वर्ष) तक रहने वाली अध्यक्ष।
राहुल गांधी2017–20192019 के लोकसभा चुनाव में हार की जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दिया।
मल्लिकार्जुन खरगे2022–वर्तमान24 साल बाद बने पहले गैर-गांधी अध्यक्ष। अक्टूबर 2022 में निर्वाचित हुए।