
ममता बनर्जी (फोटो- एएनआई)
Geopolitics : मिडिल ईस्ट में युद्ध (Middle East Crisis) के बादल गहराते जा रहे हैं, जिसे लेकर भारत सरकार पूरी तरह अलर्ट मोड ( India’s Foreign Policy) पर है। आज बुलाई गई महत्वपूर्ण उच्च स्तरीय बैठक (All-Party Meeting) में देश की सुरक्षा और विदेशी रणनीति पर मंथन होना था, लेकिन घरेलू राजनीति ने इसमें नया मोड़ ला दिया है। ईरान और अमेरिका के बीच जारी 'शर्तों के खेल' ने वैश्विक बाजार से लेकर कूटनीति (Diplomatic Stance) तक खलबली मचा दी है। भारत के लिए यह मुद्दा इसलिए भी संवेदनशील (Geopolitical Tension) है क्योंकि वहां लाखों भारतीय नागरिकों का भविष्य और देश की ऊर्जा जरूरतें दांव पर लगी हैं।
भारत सरकार ने इस संकट पर चर्चा के लिए सभी राजनीतिक दलों को आमंत्रित किया था, लेकिन तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने इस बैठक का बहिष्कार कर दिया है। विपक्षी खेमे का तर्क है कि सरकार महत्वपूर्ण मुद्दों पर केवल औपचारिकता निभाती है। कांग्रेस सहित अन्य दलों ने भी सरकार की विदेश नीति और संकट के समय लिए जा रहे फैसलों पर सवाल उठाए हैं। विपक्ष का मानना है कि इस संवेदनशील मुद्दे पर सरकार को और अधिक पारदर्शी होने की जरूरत है।
ईरान ने शांति बहाली के लिए अमेरिका के सामने 15 ऐसी शर्तें रखी हैं, जिन्हें मानना जो बाइडन या भविष्य के ट्रंप प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती है। इन शर्तों में सबसे प्रमुख है—ईरान पर लगे सभी आर्थिक प्रतिबंधों को तुरंत हटाना। इसके बदले में अमेरिका चाहता है कि ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम और मिसाइल परीक्षण पूरी तरह बंद करे। यह 'डेडलॉक' पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बना हुआ है क्योंकि दोनों में से कोई भी पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रहा।
पश्चिम एशिया में यदि संघर्ष और बढ़ता है, तो इसका सीधा असर भारत की रसोई और जेब पर पड़ेगा। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है। यदि हॉर्मुज की खाड़ी का रास्ता बाधित होता है, तो कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं। इसके अलावा, सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे देशों में रहने वाले भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा को लेकर सरकार पर भारी दबाव है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट किया है कि भारत हमेशा शांति और बातचीत के पक्ष में रहा है। भारत का प्रयास है कि वह इस संकट में एक मध्यस्थ या 'शांतिदूत' की भूमिका निभाए ताकि क्षेत्र में स्थिरता बनी रहे। हालांकि, घरेलू मोर्चे पर विपक्षी दलों को साथ न ले पाना सरकार के लिए एक कूटनीतिक सिरदर्द बन गया है। अब देखना यह होगा कि आज की बैठक के बाद सरकार क्या बड़ा कदम उठाती है।
Updated on:
25 Mar 2026 05:07 pm
Published on:
25 Mar 2026 05:03 pm
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