
Villagers taking debt from sahukar
Nabard New Survey: ग्रामीण क्षेत्रों में कर्ज लेने वाला हर छठा परिवार साहूकारों या निकट संबंधियों के ऋण के चंगुल (villagers are drowning in debt) में फंसा है। इनमें से ज्यादातर लोग खर्च पूरे करने के लिए कर्ज ले रहे हैं। नाबार्ड के सर्वेक्षण (Nabard Survey) में सामने आया है कि गांवों में कर्ज (Villagers taking debt from sahookars) लेने वाले परिवारों में से 17.7 फीसदी लोग गैर-संस्थागत तरीके यानी साहूकार और जानने वालों से कर्ज ले रहे हैं। इनमें से काफी लोगों से सालाना 50 प्रतिशत से भी अधिक दर से ब्याज वसूला जा रहा है। साहूकारों और लोन ऐप्स से कर्ज लेने वालों से 50 फीसदी की दर से ब्याज वसूला जा रहा है। हालांकि सितंबर 2024 के मुकाबले मार्च 2025 में गैर-संस्थागत माध्यम से कर्ज लेने वालों की संख्या घटी है।
नाबार्ड ने देश के 28 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के 600 गांवों में 6,000 लोगों के बीच फरवरी के अंतिम सप्ताह और मार्च के प्रथम सप्ताह में यह सर्वेक्षण किया। इसके बाद यह सर्वे रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट बताती है कि संस्थागत (बैंक, को-ऑपरेटिव बैंक और वित्ती संस्थाएं) तरीके से ऋण लेने वाले लोगों की संख्या तो बढ़ रही है लेकिन लोन को समय पर अदा करने की गति में गिरावट आई है। लोगों ने माना है कि उनकी बचत घट रही है और जरूरी खर्च तेजी से बढ़ रहे हैं।
काफी परिवारों को अपनी जरूरतों को देखते हुए दोहरा ऋण लेना पड़ रहा है। सर्वे के अनुसार, 32% से अधिक परिवार औपचारिक यानी बैंक-एनबीएफसी आदि के साथ गैर-औपचारिक माध्यम से ऋण ले रहे हैं। यानी ये परिवार अपने कामकाज करने के लिए बैंकों से भी ऋण ले रहे हैं लेकिन आवश्यकता अधिक होने पर साहूकारों, परिचित लोगों से भी कर्ज उठा रहे हैं। इस श्रेणी के परिवारों में दोहरा ऋण चल रहा है। इसकी वजह है कि भारतीय परिवार अपनी कुल आय का 13-16% ही बचत कर रहे हैं।
Updated on:
28 Mar 2025 08:15 am
Published on:
28 Mar 2025 08:02 am
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