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NCERT सिलेबस में ‘इमरजेंसी’ का चैप्टर शामिल होते ही सियासी संग्राम, नेताओं ने दिए तीखे बयान

Emergency political reactions: NCERT ने पहली बार कक्षा 9 की किताब में 1975-77 की इमरजेंसी को शामिल किया है। इस फैसले पर सियासी घमासान छिड़ गया है। जानिए संजय राउत, सचिन पायलट समेत कई नेताओं ने क्या कहा।
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NCERT syllabus Emergency chapter controversy.

कांग्रेस नेता सचिन पायलट और शिवसेना (UBT) सांसद संजय राउत। (Photo- IANS)

NCERT Introduces Section On Emergency: नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (NCERT) ने पहली बार कक्षा 9 की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में 1975-77 की इमरजेंसी को शामिल किया है। इसे ऐसे समय पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया गया है, जब इमरजेंसी के 50 वर्ष पूरे हो रहे हैं। NCERT के इस कदम के बाद इसे लेकर सियासी घमासान छिड़ गया है। विपक्षी दलों के नेताओं ने इस पर कड़ी प्रतिक्रियाएं दी हैं। आइए, जानते हैं कि इस मुद्दे पर किस नेता ने क्या कहा।

NCERT के क्लास 9 की किताब में इमरजेंसी पर एक सेक्शन शुरू करने पर शिवसेना (UBT) सांसद संजय राउत ने कहा, 'पिछले 12 सालों से इस देश के जो हालात हैं, उन पर भी बात होनी चाहिए। इंदिरा गांधी ने कोई पॉलिटिकल पार्टी नहीं तोड़ी थी और न ही संविधान खत्म किया था… इमरजेंसी सिर्फ पढ़ाई का सब्जेक्ट नहीं है, बल्कि संविधान में भी इसका इंतजाम है। संविधान प्रधानमंत्री को यह अधिकार देता है कि अगर देश में अराजकता फैलती है तो वह इमरजेंसी लगा सकते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि आपको इमरजेंसी नहीं लगानी चाहिए। मैं पूछना चाहता हूं कि डीमॉनेटाइजेशन क्यों लागू किया गया? ये सभी कदम संविधान और कानून के तहत मौजूद नियमों के आधार पर लागू किए गए थे।

छत्तीसगढ़ के रायपुर में कांग्रेस नेता जयवर्धन सिंह ने कहा, 'जैसा कि मैंने कहा कि BJP की एक ही पॉलिसी है, एक ही सोच है, लोगों के मन में कैसे कन्फ्यूजन पैदा किया जाए और उनका ध्यान कैसे भटकाया जाए। आज हर युवा देश के लिए काम करना चाहता है और अच्छी शिक्षा पाना चाहता है… लेकिन BJP एक ऐसी पार्टी है जो बच्चों की किताबों में भी बहुत छोटी सोच के साथ पॉलिटिक्स कर रही है। कांग्रेस ने कई दशकों तक राज किया है, लेकिन उसने कभी बच्चों के भविष्य के साथ पॉलिटिक्स नहीं की… यह देश के इतिहास में पहली सरकार है जो युवाओं के भविष्य के साथ खेल रही है, अन्याय कर रही है…''

कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने कहा, 'जब भी BJP सरकार किसी राज्य या केंद्र में सत्ता में होती है, तो वे इतिहास को अपने मनचाहे तरीके से पेश करने की कोशिश करते हैं… डेमोक्रेसी के सामने जो चुनौती है, वह आजाद भारत के इतिहास में पहले कभी नहीं देखी गई। जिस तरह से सोशल मीडिया, मीडिया, ज्यूडिशियरी, ब्यूरोक्रेसी, इलेक्शन कमीशन का इस्तेमाल करके आवाज़ों को दबाया जा रहा है। यह पहली बार है जब कोई सरकार ऐसे इंस्टीट्यूशन का गलत इस्तेमाल कर रही है।'

कर्नाटक में कांग्रेस नेता और पूर्व मंत्री मधु बंगारप्पा ने कहा, '… यह बहुत दुख की बात है कि BJP की मासूम बच्चों में एक आइडियोलॉजिकल सिस्टम डालने की बहुत क्रूर सोच है। यही वजह है कि जब हम सत्ता में आए, तो हमने टेक्स्टबुक में बदलाव किया। अब, उन्होंने जो किया है वह यह है कि आपको सिर्फ शाकाहारी खाना चाहिए… यह कल्चर है। और हमारे कल्चर का कोई ज़िक्र नहीं है… पूरा देश भाषा और कल्चर के हिसाब से एक फेडरल सिस्टम में बंटा हुआ है… मुझे लगता है कि BJP जो करने की कोशिश कर रही है, वह असल में आइडियोलॉजिकल सोच डालना और बहुत छोटे बच्चों में बड़े होने पर नफरत पैदा करना है… मुझे लगता है कि यह बहुत घटिया काम है; हमें इसकी बुराई करनी चाहिए… हमें यह देखना चाहिए कि सभी किताबें वापस ले ली जाएं और राज्य सरकार के साथ काम किया जाए… नहीं तो, एक दिन, BJP बताएगी, सिर्फ RSS, विश्व हिंदू परिषद के बारे में पढ़ो…'

JD(U) सांसद और पार्टी के नेशनल वर्किंग प्रेसिडेंट संजय कुमार झा कहते हैं, 'इमरजेंसी का समय भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला दिन था, जिसके दौरान विपक्षी नेताओं और पत्रकारों को जेल में डाल दिया गया था, और प्रेस की आज़ादी पर बहुत ज्यादा रोक लगा दी गई थी… जयप्रकाश नारायण ने JP आंदोलन चलाया था, और हमारे नेता नीतीश कुमार को भी 2 साल की जेल हुई थी… इसके बावजूद, कांग्रेस पार्टी ने इमरजेंसी के लिए कभी माफी नहीं मांगी, और वे उसी सोच में हैं। PM नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली मौजूदा सरकार संविधान के प्रति कमिटेड है…'

NCERT द्वारा क्लास IX की किताब में इमरजेंसी पर एक सेक्शन शुरू करने पर दिल्ली सरकार में मंत्री आशीष सूद ने कहा, 'बोलने की आज़ादी क्या है? बिना घोषणा वाली इमरजेंसी और घोषित इमरजेंसी में क्या फ़र्क है? नई पीढ़ी को यह सब पता होना चाहिए…'

वहीं इसको लेकर पटना में RJD सांसद सुधाकर सिंह ने कहा, 'सत्ता में रहने वाली सरकार अपने नजरिए से इतिहास पढ़ाएगी; इसमें कुछ भी अजीब नहीं है। जब हम सत्ता में आएंगे, तो हम इसे बदल भी देंगे; ऐसा ही होगा…'

देश में इमरजेंसी की अवधि

  • देश में 25 जून 1975 को इमरजेंसी लागू की गई।
  • यह 21 मार्च 1977 तक प्रभावी रहा।

इमरजेंसी के दौरान क्या हुआ

  • आपातकाल के दौरान कई मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
  • प्रेस पर सेंसरशिप लागू की गई। सरकार की आलोचना से जुड़ी खबरों के प्रकाशन पर निगरानी।
  • कई प्रमुख विपक्षी नेताओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया।
  • सरकार विरोधी गतिविधियों पर कड़ी कार्रवाई की गई।
  • इस दौरान परिवार नियोजन कार्यक्रम को बड़े पैमाने पर चलाया गया।
  • इमरजेंसी के दौरान 42वां संविधान संशोधन पारित किया गया।
  • केंद्र सरकार की शक्तियों का विस्तार किया गया, संविधान में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन।
  • इमरजेंसी भारतीय लोकतंत्र के सबसे विवादित अध्यायों में गिना जाता है।
  • इसके प्रभाव और निर्णयों को लेकर आज भी राजनीतिक बहस जारी।