8 नवंबर 2026,

रविवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

NCERT Book Row: ‘बीमारी छिपाएंगे तो बढ़ेगी, किताब में कुछ गलत नहीं’

NCERT Book Row: न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की बात में कोई दम है या नहीं? बात उठने पर दबा देना सही है?
3 min read
Follow Patrika on Google News
Google source verification

नई दिल्ली

•

image

Vijay Kumar Jha

•

Updated: 16 Jul 2026, 6:40 PM IST

ncert judiciary corruption controversy, NCERT

दुष्यंत दवे ने बताया कि कई अप्रत्याशित फैसलों के खिलाफ उन्होंने जज को खत लिखा था, लेकिन कुछ नहीं हुआ।

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (National Council of Educational Research and Training - NCERT) ने आठवीं की अपनी किताब में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ शीर्षक से उसकी चुनौतियों के बारे में लिखा तो सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमा दर्ज कर तीखी टिप्पणी की और चैप्टर को हटाने का आदेश दिया। इस विवाद के बीच न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर बहस तेज हो गई है। वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे का कहना है कि किताब में कोई गलत बात नहीं लिखी गई थी। न्यायपालिका में भ्रष्टाचार एक बड़ी चुनौती है और न्यायपालिका को इसे स्वीकार करते हुए इससे निपटने के ठोस उपाय करने चाहिए। बीमारी छिपाने से बढ़ती ही है।

भ्रष्टाचार: न्यायपालिका कोई अपवाद नहीं

48 साल की वकालत के बाद जुलाई 2025 में ‘संन्यास’ ले चुके दवे ने वड़ोदरा से फोन पर बातचीत में इस मुद्दे से जुड़े कई पहलुओं पर बात की। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जहां भ्रष्टाचार नहीं हो। न्यायपालिका भी इसका अपवाद नहीं है। यह भी सच है कि ज़्यादातर जज ईमानदार हैं। बहुत थोड़े हैं जो भ्रष्टाचार करते होंगे। इसका सबूत नहीं मिल सकता है, पर सिस्टम में हर एक वकील, हर एक लिटिगेंट इसकी बात करता मिल जाएगा। भ्रष्टाचार केवल पैसे देना ही नहीं है। राजनीतिक दखलअंदाजी भी भ्रष्टाचार है।

मैंने खुला खत लिखा, कुछ नहीं हुआ

कई मामलों में मैंने देखा कि या तो किसी खास बेंच के सामने केस रखा गया, बड़े उद्योगपतियों, नेताओं के मामले में कोर्ट से जो फैसले आए वे हैरान करने वाले थे। वे ऐसे फैसले नहीं थे, जो आने चाहिए थे। बहुत बार मैंने इसका सामना भी किया है। मैंने इस बारे में जज को खुला खत भी लिखा, पर कुछ नहीं हुआ।

चीफ जस्टिस जरूरत से ज्यादा संवेदनशील हो गए

किताब के मामले में चीफ जस्टिस जरूरत से ज्यादा संवेदनशील हो गए। किताब में ऐसा कुछ नहीं लिखा है। जबकि, सालों से कई चीफ जस्टिस भी भ्रष्टाचार की बात मानते रहे हैं। चीफ जस्टिस भड़ूचा ने तो 2001-2002 में खुल कर इस बारे में बात की थी। हमें इसका सामना करना चाहिए। जैसा चीन करता है। अभी तो चीन ने एक बड़े जनरल पर एक्शन लिया। यह चीन का सार्वजनिक रूप से यह मानना है कि हमारे यहां भ्रष्टाचार है और हम उससे लड़ने के लिए तैयार हैं। अपने यहां हम भ्रष्टाचार को ढंकने की कोशिश करते हैं। इससे समस्या खत्म नहीं होगी।

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार रोकने का जो सिस्टम है, वह भी खामियों से पूरी तरह मुक्त और आसान नहीं है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जहां शिकायत का सामना करने वाले जज का कुछ नहीं हुआ। बार असोशिएशन या बार काउंसिल को भी इसके लिए खड़ा होना होगा।

PM नाराज, किस पर गिरेगी गाज?

बताते हैं, किताब पर उठे विवाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी काफी नाराज हुए। उनहोनने कैबिनेट की मीटिंग में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से पूछा कि एनसीईआरटी की किताबों पर नजर रखने की ज़िम्मेदारी किसकी है? प्रधान मोदी के सबसे भरोसेमंद मंत्रियों में से एक हैं, लेकिन हाल में उनके मंत्रालय से जुड़े दो विवाद लगातार सकरार की किरकिरी करा गए हैं।

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर बात हो

वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण की राय है कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर बात होनी चाहिए। वह इसके पीछे कुछ आंकड़े भी देते हैं। पढिए, उनके विचार।

मुस्लिम थे, इसलिए जज बना दिया, सिख जज की मांग आई तो खोजने पंजाब चले गए

कई विशेषज्ञ मानते हैं कि सही तरीके से सही जजों की नियुक्ति नहीं होना भी न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का ही एक रूप है। एक बार किसी नेता ने सिख जज की नियुक्ति का विचार रखा तो खोज कर सिख जज नियुक्त किया गया था। सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति के कुछ किस्से जानने हैं, तो यहां क्लिक कीजिए।

भ्रष्टाचार का एक मामला ऐसा भी

एक जज का ऐसा मामला सामने आया कि वह दिल्ली हाई कोर्ट में जज और मणिपुर हाई कोर्ट में चीज जस्टिस रहते हुए भी गैस एजेंसी चलाते रहे। इस बीच एजेंसी का लाइसेंस रीन्यू भी होता रहा। न सुप्रीम कोर्ट को भनक लगी कि उनका एक जज गैस एजेंसी चला रहा है और न कंपनी बीपीसीएल को पता चला कि उनका एजेंट जज है।