
ओमप्रकाश राजेनिंबालकर अपने पिता पवन राजेनिंबालकर के साथ (फोटो सोर्स - इंस्टाग्राम/mpomrajenimbalkar)
Omprakash Rajenimbalkar: महाराष्ट्र की राजनीति में इन दिनों एक पुराना मामला फिर चर्चा में है। वजह है उद्धव ठाकरे गुट के सांसद ओमप्रकाश राजेनिंबालकर और उनके पिता पवन राजेनिंबालकर की 20 साल पुरानी हत्या का केस। यह कहानी सिर्फ एक हत्या की नहीं है, इसके पीछे चुनावी मुकाबले, राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता, लंबे कानूनी संघर्ष और एक बेटे के राजनीति में आने की कहानी भी है।
20 जून को इस चर्चित मामले में फैसला आने वाला है। ऐसे में एक बार फिर लोगों की नजर उस घटना पर टिक गई है जिसने एक परिवार की दिशा बदल दी थी।
साल 2004 के लोकसभा चुनाव में पवन राजेनिंबालकर ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा था। चुनाव में उन्हें केवल 484 वोटों से हार का सामना करना पड़ा था। उनके खिलाफ मैदान में पद्मसिंह पाटिल थे, जो बाद में इस हत्या मामले में आरोपी बनाए गए।
चुनाव खत्म हो गया, लेकिन राजनीतिक तनाव खत्म नहीं हुआ। इसके करीब दो साल बाद, 3 जून 2006 को मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे पर पवन राजेनिंबालकर और उनके ड्राइवर समद काजी की गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह घटना उस समय पूरे महाराष्ट्र में चर्चा का विषय बन गई थी।
इस मामले में कुल नौ आरोपी विशेष सीबीआई अदालत में मुकदमे का सामना कर रहे हैं। आरोपियों में पद्मसिंह पाटिल का नाम भी शामिल है। पद्मसिंह पाटिल महाराष्ट्र की उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार के भाई हैं।
सीबीआई का आरोप है कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के चलते हत्या की साजिश रची गई थी। जांच एजेंसियों का यह भी दावा है कि पवन राजेनिंबालकर द्वारा लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर भी विवाद था। हालांकि, मामले में अंतिम फैसला अभी आना बाकी है और अदालत 20 जून को अपना निर्णय सुनाने वाली है।
हत्या के बाद मामला कई साल तक जांच और अदालतों में चलता रहा। बाद में यह केस सीबीआई को सौंपा गया। इस दौरान 128 गवाहों के बयान दर्ज किए गए, जबकि 29 गवाह अपने बयान से मुकर गए।
मंगलवार को जब फैसला आने की उम्मीद थी तब अदालत ने निर्णय 20 जून तक के लिए टाल दिया क्योंकि विशेष सीबीआई अदालत के न्यायाधीश फैसला लिखने की प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाए थे।
अदालत में उस दिन ओमप्रकाश राजेनिंबालकर और उनके परिवार के सदस्य भी मौजूद थे। उन्होंने कहा कि उनका परिवार 20 साल और 13 दिनों से इस फैसले का इंतजार कर रहा है।
पवन राजेनिंबालकर की हत्या के तीन साल बाद ओमप्रकाश राजेनिंबालकर राजनीति में आए। उन्होंने खुद कहा है कि उनकी राजनीति में एंट्री इसी घटना से जुड़ी है। ओमप्रकाश राजेनिंबालकर के शब्दों में, उनका राजनीतिक जन्म यह साबित करने के लिए हुआ कि किसी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की हत्या से प्रतिद्वंद्विता खत्म नहीं होती, बल्कि एक नया उत्तराधिकारी पैदा होता है।
साल 2009 में वह राजनीति में सक्रिय हुए। पिता की हत्या के तीन साल बाद शिवसेना के टिकट पर चुनाव जीतकर विधायक बने और फिर 2019 तथा 2024 में लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचे।
ओमप्रकाश राजेनिंबालकर इस समय एक और वजह से चर्चा में हैं। राजेनिंबालकर उन छह बागी सांसदों की फेहरिस्त में शामिल हैं जिन्होंने गुरुवार को दिल्ली में संजय राउत द्वारा बुलाई गई पार्टी की अहम बैठक छोड़ दी थी। हालांकि उन्होंने कहा है कि वह 20 जून को अपने पिता के हत्या मामले में आने वाले फैसले के बाद ही अपने राजनीतिक रुख को स्पष्ट करेंगे।
Published on:
18 Jun 2026 07:52 pm
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