
ऑपरेशन सिंदूर के एक साल बाद पुंछ के स्कूलों से पाकिस्तान को करारा जवाब (सोर्स-पत्रिका)
Operation Sindoor: भारतीय सेना ने ने पहलगाम के गुनहगारों को सजा देने के लिए पिछले साल 6-7 मई की रात 'ऑपरेशन सिंदूर' शुरू किया था। पाकिस्तान में आतंक के ठिकानों पर सटीक हमले ने आतंकी आकाओं के होश ऐसे उड़ाए कि एक साल के बाद भी पाक उस झटके से उबर नहीं पाया है। भारतीय सेना ने तीन घंटे में पाक के 11 एयरबेस व सैन्य इलाके तबाह कर दिए। भारतीय फौज ने तब धमाकों (दहाड़) से पाकिस्तान को परत किया था, आज वहीं स्कूलों में गूंजते बच्चों के पहाड़े उसे पस्त कर रहे हैं। ग्राउंड जीरो से पढ़िए उन बच्चों के हौसले की कहानी, जिसने सरहद की अजेय बना दिया है।
पुंछ (जम्मू-कश्मीर). सीमावर्ती जिले पुंछ में पिछले साल 7 मई को जब पाकिस्तान ने स्कूलों को निशाना बनाया, तो उसका नापाक मकसद सिर्फ दहशत फैलाना था। लेकिन एलओसी के इस पार नौनिहालों ने बस्ता उठाकर दुश्मन के इस मनोवैज्ञानिक युद्ध को दफन कर दिया है। आज जब ये बच्चे उन्हीं कक्षाओं में निडर होकर पढ़ रहे हैं, जहां तब पाकिस्तान ने मोर्टार बरसाए में, तो यह पाकिस्तान के खौफ वाले एजेंडे का सबसे करारा जवाब है।
क्राइस्ट स्कूल के शिक्षक गौरव कहते हैं, 'मौत के साए से निकलकर कक्षा में लौटे बच्चों की आंखें नई उम्मीद बयान कर रही हैं। जिन दीवारों पर कुछ समय पहले मोर्टार के निशान थे, आज उनके नीचे भारत का भविष्य गढ़ा जा रहा है। कक्षा की खिलखिलाहट ने दुश्मन के तोपों के शोर को हमेशा के लिए दबा दिया है।' ये बच्चे आज इसलिए, महफूज है क्योंकि ठीक एक साल पहले जवानों इस शांति कीमत दुश्मन से भारी व्याज के साथ वसूली थी। 7 मई की वो रात, जब भारतीय सेना ने बरूद की बह भाषा बोली थी, उसकी गूंज आज भी सीमा पार के आतंकी आकाओं को सोने नहीं देती।
मुस्लिम शिक्षा के केंद्र जामिया जिया-उल-उलूम के रिहायशी हॉस्टल पर युद्ध के दौरान दुश्मन को बम गिरा था। हमले में शिक्षक मोहम्मद इकबाल शहीद हुए और कई बच्चे घायल हुए। स्कूल के प्रिंसिपल वाहिद अहमद कहते हैं, 'पाकिस्तान की यह कायराना हरकत उसकी बौखलाहट का नतीजा थी। खुद को मुसलमानों का हमदर्द बताने वाला मुल्क क्या मदरसे पर हमला करते वक्त अपना ईमान भूल गया था?' वाहिद आगे कहते हैं कि हम सच्चे मुस्लिम होने के साथ-साथ गर्वित हिंदुस्तानी भी हैं।
केरल के रहने वाले फादर सिजो 15 साल से से पुंछ के क्राइस्ट स्कूल में सेवाएं दे रहे हैं। युद्ध की विभीषिका को याद कर वे भावुक हो जाते हैं। वह बताते हैं, 'विहान (9वीं), जुड़वा भाई-बहन जैन अली व जोया (5वीं) स्कूल के होनहार छात्र थे, जो बम धमाकों के भेंट चढ़ गए। इस घटना ने झकझोर दिया था। सबने मिलकर शिक्षा पर हुए इस हमले का सामना किया। फादर सिजो के मुताबिक, युद्ध के बाद सबसे बड़ी चुनौती बच्चों के भीतर से मौत का डर निकाल कर पुरानी ऊर्जा वापस लाना था।
Published on:
07 May 2026 11:26 am
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