
पहलगाम (फाइल फोटो)
Pahalgam attack: संसद के मानसून सत्र के दौरान एक संसदीय समिति ने जम्मू-कश्मीर के प्रमुख पर्यटन स्थलों के लिए एक इंटीग्रेटेड सुरक्षा और निगरानी सिस्टम की सिफारिश की है। इसमें पूरे इलाके में सीसीटीवी कवरेज, सेंट्रलाइज्ड मॉनिटरिंग सुविधाएं और सुरक्षा कमियों की नियमित समय पर सुरक्षा ऑडित शामिल है।
गृह मामलों की विभागीय स्थायी समिति ने अपनी 260वीं रिपोर्ट में संसद को यह सुझाव भी दिया है कि टूरिस्ट सीजन शुरू होने से पहले अलग-अलग सुरक्षा एजेंसियां स्टेंडर्ड ऑपरेशन प्रोसिजर फॉलो करें। उनकी काम की समीक्षा हो, ताकि सुरक्षा से जुड़ी किसी भी घटना पर सही समय और तालमेल के साथ कार्रवाई की जा सके।
समिति ने यह भी कहा कि बेहतर कनेक्टिविटी, मजबूत सुरक्षा व्यवस्था, बेहतर टूरिस्ट इंफ्रास्ट्रक्चर और पर्यटकों में बढ़े भरोसे के कारण पर्यटन स्थलों पर आने वाले पर्यटकों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हुई है। समिति ने कहा कि इस संदर्भ में पर्यटन स्थलों पर सुरक्षा प्रबंधन बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि यह सीधे तौर पर सुरक्षा की धारणा, पर्यटकों के अनुभव की गुणवत्ता और पर्यटन क्षेत्र के लगातार विकास पर असर डालता है।
गौरतलब है कि संसद की इस समिति की सिफारिशें मई 2026 में पर्यटन स्थलों पर सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लेने के लिए पैनल के जम्मू-कश्मीर के दौरे के बाद आई हैं। यह दौरा पिछले साल पहलगाम में हुए हमले के बाद किया गया था। इस हमले में 26 पर्यटकों की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।
कश्मीर के पहलगाम के बैसरन घाटी में साल 2025 में हुए आतंकी हमले को लेकर NIA की जांच में बड़ा खुलासा हुआ है। NIA ने पहलगाम हमले के बाद मारे गए आतंकियों (फैसल जट्ट उर्फ सुलेमान, हबीब ताहिर उर्फ जिब्रान और हम्जा अफगानी) का डिजिटल रिकॉर्ड खंगाला। NIA की जांच में पता चला कि तीनों आतंकियों ने हमले की योजना घटना से हफ्ते भर पहले 15 अप्रैल के आसपास बनाई थी। 22 अप्रैल 2025 को नृशंस आतंकी हमले में 25 पर्यटक और एक स्थानीय पोनीवाला (घोड़े वाला) मारा गया था।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, 28 जुलाई 2025 को श्रीनगर इलाके में ऑपरेशन महादेव के दौरान मारे गए एक आतंकी के फोन से NIA को दो स्क्रीनशॉट मिले। जिन पर 15 व 16 अप्रैल की तारीख व समय दर्ज था। इन स्क्रीनशॉट में बैसरन घाटी का मैप था। NIA ने कहा कि स्क्रीनशॉट से पता चलता है कि पहलगाम हमले की साजिश हफ्ते भर पहले बुन ली गई थी। जांच एजेंसी ने कहा कि आतंकियों ने जिस जीपीएस आधारित मोबाइल ऐप का इस्तेमाल किया। वह आमतौर पर हाइकिंग और पहाड़ों पर जाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इन आतंकियों ने इसका इस्तेमाल कोऑर्डिनेट्स शेयर करने और ट्रैक करने के लिए किया।
Updated on:
08 Aug 2026 11:30 am
Published on:
08 Aug 2026 11:29 am
