
सुदर्शना कुमारी, साहिब सिंह विर्डी और हमीदा (बाएं से दाएं) ने भारत-पाकिस्तान बंटवारे के समय की अपनी जो आंखोंदेखी/आपबीती बयान की है, वह partitionmuseum.org पर 'oral histories' सेक्शन में सहेज कर रखा गया है।
1947 में भारत को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी मिली और साथ ही एक नए देश पाकिस्तान का भी जन्म हुआ। बंटवारे के इतिहास में भयंकर खून-खराबा और इंसानियत को शर्मसार कर देने वाली अनगिनत घटनाओं के काले पन्ने भी दर्ज हैं। इन पन्नों में पीड़ित लोगों की अनेक खौफनाक यादें भी हैं। ऐसी ही कुछ यादें हम यहां साझा कर रहे हैं।
ये यादें पाकिस्तान में रहने वालों की भी हैं और भारत में रहने वालों की भी। आठ साल की सुदर्शना कुमारी उस समय पाकिस्तान में ही रहती थीं, जब बंटवारे की आग में उनका परिवार झुलसा था। आतताइयों ने उनकी एक साल की बहन को पटक कर कुचल दिया था। चाचा-चाची, सब की जान ले ली थी।
सुदर्शना ने बंटवारे के वक्त जो खौफनाक मंजर देखा, वो उनके दिमाग में हमेशा के लिए दर्ज हो गया। उन दिनों की उनकी यादें उनकी ही जुबान में अब 'पार्टिशन म्यूज़ियम' के आर्काइव में हमेशा के लिए दर्ज हैं।
जिस शाम उन्हें और उनके परिवार को पाकिस्तान में अपना घर छोड़ना पड़ा, वह गर्मी की एक शाम थी। उनका घर लाहौर से 20-25 मील की दूरी पर शेखपुरा जिले के एक गांव में था। उनकी मां छत पर तंदूर में रात के लिए रोटियां पका रही थीं। तभी एक पड़ोसी भागता हुआ आया और बताया कि पास की टाल में आग लग गई है। आटा, रोटियां सब वहीं छोड़ कर पूरा परिवार भागा। एक के बाद एक दीवारें कूदते हुए वे काफी दूर निकल गए। वहां सरकारी क्वाटर्स थे। दो दिन बिना खाए-पीए सब भागते-छिपते रहे।
खौफनाक मंजर को याद करते हुए सुदर्शना ने बताया कि हथियारबंद गुंडे खुले आम लूटपाट और कत्ल कर रहे थे। उनकी चाची की गोद में उनकी एक साल की बच्ची थी। उसे गुंडों ने छीन कर जमीन पर पटक दिया और कुचल कर मार डाला। इसके बाद परिवार के बाकी लोगों को भी एक-एक कर मारते गए। सुदर्शना की चचेरी बहन मनोरमा घायल होने के बाद भी किसी तरह बच कर भाग निकलने में कामयाब रही।
बंटवारे के वक्त हुए दंगों में औरतों को शारीरिक हिंसा का भी खूब शिकार होना पड़ा। अमोल स्वानी का जो बयान partitionmuseum.org पर दर्ज है उसमें उन्होंने बताया है कि उनकी रिश्तेदार बहन ने अन्य लड़कियों के साथ एक अस्पताल में शरण ले रखी थी। वहां 15-20 मुसलमानों ने बुरी नीयत से उनका पीछा किया। हद तो तब हो गई, जब उनके पिता ने उनकी मां से कहा कि मुसलमान अगर हमला करें तो खुद को और बेटी को आग के हवाले कर लेना, उनकी गिरफ्त में नहीं पड़ना।
साहिब सिंह विर्डी के पिता पाकिस्तान से जत्था बना कर भागे थे। उनके पास बंदूक थी। वो उन्होंने साथ ले ली थी। जत्थे के बाकी सदस्यों के पास भी सूआ, टकुआ, फरसा जैसा कोई न कोई सामान या हथियार था। रास्ते में 10-12 हमलावरों ने उन्हें रोक लिया। पिता की गोली तब काम आई। उन्होंने जैसे गोली फायर की, बदमाश भाग गए। आगे बढ़े तो पुलिसवाले ने रोक लिया। सब-इंस्पेक्टर ने सारे शरणार्थियों को लाइन में खड़ा करवाया। वह सबको गोलियों से मरवा देना चाहता था, लेकिन साहिब के पिता वहां भी डट गए। अफसर करीब आया तो उसे पता चला कि अरे यह तो वही डॉक्टर साहब हैं जिन्होंने अब्बा-अम्मी की आंखों में मोतियाबिंद का ऑपरेशन किया था। तब अफसर बड़ा शर्मसार हुआ और जत्थे को जाने दिया। इसी तरह कई और मुसीबतों को झेलते हुए वे सब जम्मू-कश्मीर/पंजाब में दाखिल हुए।
आशा गुप्ता के दादा जी अपनी संपत्ति छोड़ कर पाकिस्तान से नहीं आना चाहते थे तो उन्होंने इसके लिए एक रास्ता निकाला। उन्होंने एक मुस्लिम दोस्त की मदद ली और मुसलमान बन कर रहने लगे। वह पांच-छह साल इसी तरह मुस्लिम वेश में करांची में रहे।
मालदा में जब दंगे हुए तब बंगाल की हमीदा को पता चला कि भारत और पाकिस्तान में बंटवारा हो गया है। मोगदेमपुर में उनकी ससुराल हुआ करती थी। दंगे भड़कने के बाद उन्हें लगा कि वे अब वहां नहीं रह सकते। जो पाकितान बना है, वहां जाना होगा। रात में उन लोगों ने एक हिंदू धोबी के यहां शरण ली। इसके बाद वे सभी फिरोजपुर के लिए रवाना हुए। तब हमीदा की दो बेटियां थीं। उन सब ने एक नर्सरी में शरण ली। वहां बकरीद आई तो सरकार की ओर से मांस, तेल, नमक, बर्तन आदि मुहैया कराया गया।
बता दें कि ऊपर बताई गईं सारी कहानियां partitionmuseum.org पर ऐतिहासिक दस्तावेज़ के रूप में दर्ज हैं।
Updated on:
14 Aug 2026 04:23 pm
Published on:
14 Aug 2026 04:14 pm
