22 जनवरी 2026,

गुरुवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

समलैंगिक संबंध को चुनौती देने वाली याचिका पर बोला सुप्रीम कोर्ट- इसे अपराध नहीं बोल सकते

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) में जबरन अप्राकृतिक यौन अपराधों दंडनीय नहीं बनाने के प्रावधान को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया।

2 min read
Google source verification
supreme court of India

Supreme Court of India

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) में जबरन अप्राकृतिक यौन अपराधों दंडनीय नहीं बनाने के प्रावधान को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर विचार करने से इनकार कर दिया। पूर्ववर्ती आईपीसी की धारा 377 के तहत इस अपराध में सजा का प्रावधान था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में दिए नवतेजसिंह के मामले में इसे खत्म कर दिया था। सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने पीआईएल खारिज करते हुए कहा कि अदालत यह निर्देश नहीं दे सकती कि किसी विशेष कृत्य को बीएनएस के तहत अपराध बनाया जाए। यह संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है। इसके लिए केंद्र सरकार को ज्ञापन दिया जा सकता है।

डीडी सिंधी चैनल शुरू करने की याचिका खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को वह याचिका खारिज कर दी जिसमें भाषाई अल्पसंख्यक सिंधी समुदाय की भाषा और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के लिए केंद्र सरकार और प्रसार भारती को 24 घंटे का सिंधी भाषा का दूरदर्शन टीवी चैनल चलाने का निर्देश देने की मांग की गई थी। सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच ने सिंधी संगत की ओर से दायर याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि कोई भी नागरिक संविधान के अनुच्छेद 29 के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकार के आधार पर यह दावा नहीं कर सकता कि सरकार को उनकी भाषा में एक अलग चैनल शुरू करना चाहिए।

यह भी पढ़ें- Public Holiday: फिर लगी छुट्टियों की झड़ी! इस सप्ताह 4 दिन बंद रहेंगे बैंक, स्कूल और ऑफिस

बीमार और अशक्त को मिल सकती है पीएमएलए में जमानत

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि धनशोधन कानून (पीएमएलए) में जमानत के बारे में कड़े प्रावधान होने के बावजूद बीमार और अशक्त व्यक्तियों को जमानत दी जा सकती है। सीजेआइ डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच ने यह टिप्पणी करते हुए पीएमएलए मामले में एक आरोपी को अंतरिम जमानत प्रदान दे दी। बेंच ने राहत देने से पहले याचिकाकर्ता की मेडिकल रिपोर्ट का अवलोकन किया। वरिष्ठ अधिवक्ता आत्माराम नादकर्णी ने यह कहते हुए जमानत का विरोध किया कि आरोपी पर सबूतों से छेड़छाड़ करने के लिए अन्य एफआइआर भी दर्ज है। इस पर सीजेआइ ने कहा कि पीएमएलए चाहे कितना भी सख्त क्यों न हो, कानून हमें बताता है कि जो व्यक्ति बीमार और अशक्त है, उसे जमानत दी जानी चाहिए।