
पीएन हक्सर, ब्रजेश मिश्रा जहां कद्दावर प्रिंसिपल सेक्रेटरी के रूप में जाने जाते हैं, वहीं कुछ पीएस ऐसे भी हुए जो फ़ाइल पर नोट लिखने से भी बचते थे। (प्रतिकात्मक फोटो सोर्स: एआई)
पीएमओ (प्रधानमंत्री कार्यालय या Prime Minister's Office) का प्रिंसिपल सेक्रेटरी, यानि नौकरशाहों का ‘असली’ शहंशाह। लेकिन इनकी बादशाहत कितनी चलेगी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि पीएमओ का मुखिया (प्रधानमंत्री) कितना कद्दावर है, उनसे इन्हें कितनी ताकत मिली हुई है और वे खुद उस ताकत का कितना इस्तेमाल करते हैं।
पीएन हक्सर (इंदिरा गांधी) और ब्रजेश मिश्रा (अटल बिहारी वाजपेयी) का नाम सबसे ताकतवर प्रिंसिपल सेक्रेटरीज में लिया जाता है। इन दोनों को पीएम ने लगभग असीमित अधिकार दे दिए थे। इन्हें पीएम के समानांतर, सत्ता का दूसरा प्रतीक समझा जाने लगा था। दूसरी ओर, मनमोहन सिंह के प्रिंसिपल सेक्रेटरी टीकेए नायर थे, जो फाइल पर नोट लिखने तक से परहेज करते थे।
मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू ने अपनी किताब 'The Accidental Prime Minister-The Making and Unmaking of Manmohan Singh' में नायर के काम करने के तरीके के बारे में बताया है। बारू लिखते हैं कि नायर किसी फ़ाइल पर साफ-सटीक और खुल कर टिप्पणी नहीं लिखते थे। ज़्यादातर मामलों में उनकी टिप्पणी होती थी 'प्लीज डिस्कस' (कृपया चर्चा करें)। वह अपने नीचे के अफसरों को मौखिक निर्देश देते थे और इन निर्देशों को उन्हीं से उनकी राय के रूप में फ़ाइल पर नोट करवाते थे। नायर प्रिंसिपल सेक्रेटरी थे, लेकिन अपने जूनियर पुलक चटर्जी (जॉयंट सेक्रेटरी) पर उनकी बड़ी निर्भरता थी। इसकी वजह यह थी कि चटर्जी का सोनिया गांधी से सीधा कनेक्शन था।
पीएमओ में रसूख के मामले में पीएन हक्सर और ब्रजेश मिश्रा की जो छवि बनी, वह कोई और अफसर आज तक नहीं बना सका है। वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी ने अपनी किताब 'How Prime Ministers Decide'में लिखा है कि इन दोनों को एक तरह से 'सरकार' ही माना जाता था।
मनमोहन सिंह के बारे में नीरजा लिखती हैं कि वह तो कैबिनेट की बैठकों में भी कम बोलते थे और मंत्रियों के समूहों के जरिए सरकार चलाते थे। इनमें से कई समूहों की अध्यक्षता प्रणव मुखर्जी को सौंप दी थी। बक़ौल नीरजा, मनमोहन सरकार के दौरान सत्ता का असली केंद्र सोनिया गांधी थीं, जो अपने राजनीतिक सचिव अहमद पटेल के जरिए काम करवाती थीं।
2014 में नरेंद्र मोदी पीएमओ में आए। वह अपने इस दफ्तर के जरिए पूरी सरकार पर नजर रखते हैं। नीरजा लिखती हैं कि पीएमओ ही मंत्रालयों के एजेंडे तय करता है, संबंधित मंत्री इस पर अमल करवाते हैं और इसकी रिपोर्ट पीएमओ को देते रहते हैं। अमित शाह को इससे छूट मिली हुई है। उच्च स्तर पर फैसले लेने में उनकी भागीदारी रहती है।
मोदी सरकार में पीएमओ संभालने वाले नृपेंद्र मिश्रा (2014-2019) और पीके मिश्रा लो प्रोफ़ाइल ही रहते हैं। उनके पास पीएन हक्सर या ब्रजेश मिश्रा जैसी ताकत भी नहीं है। मोदी के पीएमओ में एनएसए अजित डोवाल की ज्यादा अहमियत है और प्रधानमंत्री का उन पर पूरा भरोसा है।
नरेंद्र मोदी ने पीएमओ की कार्यशैली तो बदली ही, हाल ही में एक बड़ा बदलाव यह किया कि दफ्तर की जगह बदल दी। आजादी के बाद से ही पीएमओ 'साउथ ब्लॉक' में हुआ करता था। अब 'सेवा तीर्थ कॉम्प्लेक्स' में चला गया है।
पीएमओ को ताकतवर बनाने की कोशिश देश के पहले प्रधानमंत्री के समय भी हुई थी। पंडित जवाहर लाल नेहरू के प्रधानमंत्री सचिवालय (पीएमएस) का मुखिया जॉयंट सेक्रेटरी लेवल का एक अफसर हुआ करता था। यह ज़िम्मेदारी एमओ मथाई के पास थी। वह पंडित नेहरू के निजी सचिव (पीएस) भी हुआ करते थे। नेहरू ने पीएमएस को शक्तिशाली बनानाने के पहल की, लेकिन सरदार पटेल ऐसा नहीं चाहते थे।
नेहरू के बाद जब लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने अपने दफ्तर का जिम्मा सीनियर अफसर को सौंपा और आईसीएस अफसर एलके झा को पीएमएस का सेक्रेटरी बनाया। वह प्रधानमंत्री के हर काम काज का ख्याल रखते थे और इस तरह कैबिनेट सचिव से भी ज्यादा शक्तिशाली हो गए थे। भारत और पाकिस्तान के बीच 1965 की लड़ाई के बाद पीएम शास्त्री को ताशकंद जाने के लिए झा ने ही राजी किया था।
इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं तो उन्होंने पीएमएस को काफी ताकतवर बना दिया। उन्होंने सबसे पहले पीएमएस में राज्य मंत्री को एंट्री दी और पीएमएस में प्रिंसिपल सेक्रेटरी नियुक्त किया।
इंदिरा ने राज्य मंत्री दिनेश सिंह को पीएमएस का चार्ज दिया। 1967 में पीएन हक्सर को पीएमएस का सेक्रेटरी बनाया। 1971 में वह प्रिंसिपल सेक्रेटरी (प्रधान सचिव) बनाए गए।
| क्र. | प्रधान सचिव का नाम | कार्यकाल | प्रधानमंत्री |
| 1 | पी. एन. हक्सर (IFS) | 1971 - 1973 | इंदिरा गांधी |
| 2 | पी. एन. धर (IES) | 1973 - 1977 | इंदिरा गांधी |
| 3 | वी. शंकर (ICS) | 1977 - 1979 | मोरारजी देसाई |
| 4 | पी. सी. अलेक्जेंडर (IAS) | 1981 - 1985 | इंदिरा गांधी / राजीव गांधी |
| 5 | सरला ग्रेवाल (IAS) | 1985 - 1989 | राजीव गांधी |
| 6 | बी. जी. देशमुख (IAS) | 1989 - 1990 | राजीव गांधी / वी.पी. सिंह |
| 7 | एस. के. मिश्रा (IAS) | 1990 - 1991 | चंद्रशेखर |
| 8 | अमर नाथ वर्मा (IAS) | 1991 - 1996 | पी. वी. नरसिम्हा राव |
| 9 | टी. आर. सतीशचंद्रन (IAS) | 1996 - 1997 | एच. डी. देवेगौड़ा / आई. के. गुजराल |
| 10 | एन. एन. वोहरा (IAS) | 1997 - 1998 | आई. के. गुजराल |
| 11 | ब्रजेश मिश्रा (IFS) | 1998 - 2004 | अटल बिहारी वाजपेयी |
| 12 | टी. के. ए. नायर (IAS) | 2004 - 2011 | डॉ. मनमोहन सिंह |
| 13 | पुलक चटर्जी (IAS) | 2011 - 2014 | डॉ. मनमोहन सिंह |
| 14 | नृपेंद्र मिश्रा (IAS) | 2014 - 2019 | नरेंद्र मोदी |
| 15 | डॉ. पी. के. मिश्रा (IAS) | 2019 - वर्तमान | नरेंद्र मोदी |
| 16 | शक्तिकांत दास (IAS) | 2025 - वर्तमान | नरेंद्र मोदी (प्रधान सचिव-2) |
1973 में इस्तीफा देने से पहले हक्सर ने प्रधानमंत्री सचिवालय को 'पावर सेंटर' बना दिया था। इंदिरा के हर निर्णय पर उनकी छाप होती थी। मामला चाहे बैंकों के राष्ट्रीयकरण का हो या बांग्लादेश से युद्ध करने का।
जब मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने पीएमएस का नाम भी बदला और चरित्र भी। पीएमएस अब पीएमओ हो गया। साथ ही, पीएमओ में अफसर भी घटाए और इसकी ताकत भी कम की।
नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने पीएमओ में केवल एक अफसर पर निर्भर रहने की नीति नहीं अपनाई। वैसे तो अमरनाथ वर्मा उनके प्रिंसिपल सेक्रेटरी थे, लेकिन उन्होंने नरेश चंद्रा को भी आगे बढ़ाया। चंद्रा को 'अयोध्या सेल' के प्रमुख के तौर पर लाया गया, लेकिन उनसे और काम भी लिए जाने लगे। नीरजा चौधरी ने अपनी किताब में लिखा है कि राव ने 1995 में परमाणु परीक्षण के सिलसिले में वैज्ञानिकों से बातचीत का संपर्क सूत्र भी चंद्रा को ही बनाया था।
| क्र. | प्रधानमंत्री का नाम | कार्यकाल | याद रहे... |
| 1 | जवाहरलाल नेहरू | 15 अगस्त 1947 - 27 मई 1964 | भारत के पहले और सबसे लंबे समय तक रहने वाले पीएम। |
| 2 | गुलजारीलाल नंदा | 27 मई 1964 - 9 जून 1964 | पहले कार्यवाहक प्रधानमंत्री (13 दिन)। |
| 3 | लाल बहादुर शास्त्री | 9 जून 1964 - 11 जनवरी 1966 | जय जवान जय किसान' का नारा दिया। |
| 4 | गुलजारीलाल नंदा | 11 जनवरी 1966 - 24 जनवरी 1966 | दूसरी बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री। |
| 5 | इंदिरा गांधी | 24 जनवरी 1966 - 24 मार्च 1977 | भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री। |
| 6 | मोरारजी देसाई | 24 मार्च 1977 - 28 जुलाई 1979 | पहले गैर-कांग्रेसी पीएम और सबसे वृद्ध (81 वर्ष)। |
| 7 | चौधरी चरण सिंह | 28 जुलाई 1979 - 14 जनवरी 1980 | अकेले पीएम जिन्होंने कभी संसद का सामना नहीं किया। |
| 8 | इंदिरा गांधी | 14 जनवरी 1980 - 31 अक्टूबर 1984 | दूसरी बार प्रधानमंत्री बनीं। |
| 9 | राजीव गांधी | 31 अक्टूबर 1984 - 2 दिसंबर 1989 | भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्री (40 वर्ष)। |
| 10 | विश्वनाथ प्रताप सिंह | 2 दिसंबर 1989 - 10 नवंबर 1990 | अविश्वास प्रस्ताव के कारण पद छोड़ने वाले पहले पीएम। |
| 11 | चंद्रशेखर | 10 नवंबर 1990 - 21 जून 1991 | समाजवादी जनता पार्टी से संबंधित। |
| 12 | पी. वी. नरसिम्हा राव | 21 जून 1991 - 16 मई 1996 | दक्षिण भारत से पहले प्रधानमंत्री। |
| 13 | अटल बिहारी वाजपेयी | 16 मई 1996 - 1 जून 1996 | केवल 16 दिनों के लिए (सबसे छोटा कार्यकाल)। |
| 14 | एच. डी. देवेगौड़ा | 1 जून 1996 - 21 अप्रैल 1997 | जनता दल से संबंधित। |
| 15 | इंद्र कुमार गुजराल | 21 अप्रैल 1997 - 19 मार्च 1998 | गुजराल सिद्धांत' के लिए प्रसिद्ध। |
| 16 | अटल बिहारी वाजपेयी | 19 मार्च 1998 - 22 मई 2004 | पूर्ण कार्यकाल पूरा करने वाले पहले गैर-कांग्रेसी पीएम। |
| 17 | डॉ. मनमोहन सिंह | 22 मई 2004 - 26 मई 2014 | भारत के पहले सिख प्रधानमंत्री (लगातार दो कार्यकाल)। |
| 18 | नरेंद्र मोदी | 26 मई 2014 - वर्तमान | लगातार तीसरी बार निर्वाचित होने वाले दूसरे पीएम। |
| पद (Designation) | वर्तमान पदाधिकारी / विवरण |
| राजनैतिक प्रमुख | नरेंद्र मोदी (प्रधानमंत्री) |
| राज्य मंत्री (PMO) | डॉ. जितेंद्र सिंह |
| प्रधान सचिव-1 | डॉ. पी. के. मिश्रा (IAS) |
| प्रधान सचिव-2 | शक्तिकांत दास (IAS, पूर्व गवर्नर RBI) |
| राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार | अजित डोभाल (IPS, KC) |
| सलाहकार (Advisor) | तरुण कपूर, अमित खरे |
| विशेष सचिव | आतिश चंद्रा (IAS) |
Updated on:
17 Feb 2026 03:24 pm
Published on:
17 Feb 2026 12:29 pm
बड़ी खबरें
View Allराष्ट्रीय
ट्रेंडिंग
